अयोध्या के राजा और लोग – श्लोक 8
संस्कृत श्लोक
कामी वा न कदर्यो वा नृशंसः पुरुषः क्वचित् । द्रष्टुं शक्यमयोध्यायां नाविद्वान् न च नास्तिकः ॥
हिंदी अनुवाद
अयोध्या में कहीं भी कोई पुरुष कामी, कृपण, क्रूर, अविद्वान् या नास्तिक देखने को नहीं मिलता था।
अर्थ / व्याख्या
इस श्लोक में अयोध्या के निवासियों के नैतिक और बौद्धिक स्तर का वर्णन है। वहाँ कोई कामी, कृपण, क्रूर, अविद्वान या नास्तिक नहीं था।
टिप्पणी
यह श्लोक बताता है कि अयोध्या की प्रजा न केवल आर्थिक रूप से सम्पन्न थी, बल्कि चारित्रिक और बौद्धिक रूप से भी उच्च कोटि की थी। दोषों का अभाव और गुणों की उपस्थिति।
॥ श्रीमद्वाल्मीकि रामायण – बालकाण्ड – सर्ग ६ – श्लोक ८ ॥
द्रष्टुं शक्यमयोध्यायां नाविद्वान् न च नास्तिकः ॥
draṣṭuṃ śakyamayodhyāyāṃ nāvidvān na ca nāstikaḥ ||
🔹 हिन्दी अनुवाद : अयोध्या में कहीं भी कोई पुरुष कामी, कृपण, क्रूर, अविद्वान् या नास्तिक देखने को नहीं मिलता था।
🔹 English Translation : In Ayodhya, nowhere could one see a man who was lustful, miserly, cruel, unlearned, or an atheist.
🔍 शब्दार्थ तालिका
| संस्कृत पद | व्याकरण | हिन्दी अर्थ |
|---|---|---|
| कामी | पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन | कामी, विषयासक्त |
| वा | अव्यय | या |
| न | अव्यय | नहीं |
| कदर्यः | पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन | कृपण, कंजूस |
| वा | अव्यय | या |
| नृशंसः | पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन | क्रूर, निर्दयी |
| पुरुषः | पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन | पुरुष, व्यक्ति |
| क्वचित् | अव्यय | कहीं, किसी स्थान पर |
| द्रष्टुम् | तुमुन् प्रत्यय (दृश् धातु) | देखने को |
| शक्यम् | नपुंसक, प्रथमा एकवचन (शक् धातु) | सम्भव है |
| अयोध्यायाम् | स्त्रीलिंग, सप्तमी एकवचन | अयोध्या में |
| न | अव्यय | नहीं |
| अविद्वान् | पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन | अविद्वान, मूर्ख |
| न | अव्यय | नहीं |
| च | अव्यय | और |
| नास्तिकः | पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन | नास्तिक, ईश्वर और परलोक को न मानने वाला |
📖 श्लोक की व्याख्या
इस श्लोक में पाँच दोषों का निषेध किया गया है – कामी (विषयी), कदर्य (कृपण), नृशंस (क्रूर), अविद्वान (मूर्ख), और नास्तिक।
कामी – कामुक व्यक्ति, जो इन्द्रियों के अधीन हो। ऐसे व्यक्ति की प्रवृत्तियाँ अनैतिक हो सकती हैं। अयोध्या में ऐसा कोई नहीं था।
कदर्यः – कंजूस, जो धन का सदुपयोग नहीं करता। कंजूस व्यक्ति समाज में दान और परोपकार नहीं करता। अयोध्या में सभी उदार थे।
नृशंसः – क्रूर, जो दूसरों पर अत्याचार करता है। ऐसे व्यक्ति का अभाव एक सभ्य समाज का लक्षण है।
अविद्वान् – मूर्ख, अज्ञानी। अयोध्या में सभी शिक्षित और विद्वान थे (जैसा पिछले श्लोक में 'बहुश्रुताः' कहा गया)।
नास्तिकः – जो आस्तिक नहीं, धर्म और परलोक में विश्वास नहीं रखता। आस्तिकता भारतीय संस्कृति का आधार है। अयोध्या में सभी आस्तिक थे।
यह श्लोक अयोध्या के निवासियों के उच्च चारित्रिक आदर्शों को उजागर करता है।
📚 सांस्कृतिक संदर्भ
भारतीय समाज में आस्तिकता और विद्वता को हमेशा महत्व दिया गया है। नास्तिक का अर्थ केवल ईश्वर को न मानने वाला नहीं, बल्कि वेद और धर्म का विरोधी भी होता है। ऐसे लोग समाज में कलह उत्पन्न कर सकते हैं।
काम, क्रोध, लोभ आदि विकारों से रहित समाज ही सुखी और शांत रह सकता है। अयोध्या ऐसा ही आदर्श नगर था।
इस प्रकार अयोध्या की जनता के सद्गुणों का वर्णन आगे भी जारी है।
॥ जय श्री राम ॥