अयोध्या के राजा और लोग – श्लोक 9

संस्कृत श्लोक

सर्वे नराश्च नार्यश्च धर्मशीलाः सुसंयताः । मुदिताः शीलवृत्ताभ्यां महर्षय इवामलाः ॥

हिंदी अनुवाद

सभी नर और नारियाँ धर्मशील, सुसंयत (अच्छी तरह संयमित), शील और आचरण से प्रसन्न और महर्षियों के समान निर्मल थे।

अर्थ / व्याख्या

यह श्लोक अयोध्या के सभी पुरुषों और स्त्रियों के धार्मिक आचरण, संयम, शील और पवित्रता का वर्णन करता है। वे महर्षियों के समान निर्मल थे।

टिप्पणी

यहाँ महर्षियों से तुलना करके नगरवासियों की उच्च नैतिक स्थिति को दर्शाया गया है। वे सभी आत्मसंयम और पवित्रता में ऋषियों के समान थे।

॥ श्रीमद्वाल्मीकि रामायण – बालकाण्ड – सर्ग ६ – श्लोक ९ ॥

सर्वे नराश्च नार्यश्च धर्मशीलाः सुसंयताः ।
मुदिताः शीलवृत्ताभ्यां महर्षय इवामलाः ॥
sarve narāśca nāryaśca dharmaśīlāḥ susaṃyatāḥ |
muditāḥ śīlavṛttābhyāṃ maharṣaya ivāmalāḥ ||

🔹 हिन्दी अनुवाद : सभी नर और नारियाँ धर्मशील, सुसंयत (अच्छी तरह संयमित), शील और आचरण से प्रसन्न और महर्षियों के समान निर्मल थे।

🔹 English Translation : All men and women were virtuous in conduct, well-controlled, delighted with (their) character and behavior, and pure like great sages.

🔍 शब्दार्थ तालिका

संस्कृत पदव्याकरणहिन्दी अर्थ
सर्वेविशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा बहुवचनसभी
नराःपुल्लिंग, प्रथमा बहुवचननर, पुरुष
अव्ययऔर
नार्यःस्त्रीलिंग, प्रथमा बहुवचननारियाँ, स्त्रियाँ
अव्ययऔर
धर्मशीलाःपुल्लिंग/स्त्रीलिंग, प्रथमा बहुवचन (बहुव्रीहि)धर्म ही जिनका शील (स्वभाव) है, धर्मशील
सुसंयताःपुल्लिंग/स्त्रीलिंग, प्रथमा बहुवचनसुंदर रूप से संयत, अच्छी तरह नियंत्रित
मुदिताःपुल्लिंग/स्त्रीलिंग, प्रथमा बहुवचनप्रसन्न, आनंदित
शीलवृत्ताभ्याम्नपुंसक, तृतीया द्विवचनशील (चरित्र) और वृत्त (आचरण) से
महर्षयःपुल्लिंग, प्रथमा बहुवचनमहर्षि (बड़े ऋषि)
इवअव्ययसमान
अमलाःपुल्लिंग/स्त्रीलिंग, प्रथमा बहुवचननिर्मल, पवित्र

📖 श्लोक की व्याख्या

यह श्लोक अयोध्या के सभी नर-नारियों के सद्गुणों का सार प्रस्तुत करता है।

धर्मशीलाः – उनका स्वभाव ही धर्ममय था। वे स्वाभाविक रूप से धर्म का पालन करते थे, न कि दिखावे के लिए।

सुसंयताः – वे अच्छी तरह से संयमित थे। उनकी इंद्रियाँ वश में थीं और वे मर्यादा में रहते थे।

मुदिताः शीलवृत्ताभ्याम् – वे अपने शील (चरित्र) और वृत्त (आचरण) से प्रसन्न रहते थे। उन्हें अपने सदाचार पर संतोष था, जिससे वे आनंदित रहते थे।

महर्षय इवामलाः – वे महर्षियों के समान निर्मल थे। महर्षि तपस्वी और ज्ञानी होते हैं, जिनके मन और शरीर पवित्र होते हैं। उसी प्रकार अयोध्या के निवासी भी पवित्र थे।

इस श्लोक में विशेष रूप से स्त्रियों का भी उल्लेख है, जो समान रूप से सद्गुणी थीं। यह लैंगिक समानता का सूचक है।

📚 सांस्कृतिक संदर्भ

महर्षियों के समान निर्मलता का अर्थ है कि वे राग-द्वेष, मोह-माया से परे थे। उनका जीवन सात्विक था। यह भारतीय आदर्श समाज का सपना है, जहाँ सभी लोग ऋषियों जैसे पवित्र हों।

'शील' और 'वृत्त' दोनों का साथ में उल्लेख महत्वपूर्ण है। शील आंतरिक स्वभाव है, वृत्त बाह्य आचरण। दोनों से प्रसन्न रहना आत्मसंतोष और आत्मिक उन्नति का लक्षण है।

✨ विशेष: 'मुदिताः शीलवृत्ताभ्याम्' यह बताता है कि उन्हें अपने सदाचार से ही आनंद मिलता था, न कि भौतिक सुखों से। यह उच्चकोटि की संस्कृति है।

इस श्लोक में अयोध्या की जनता के चरम उत्कर्ष का चित्रण है।

॥ जय श्री राम ॥