अयोध्या के राजा और लोग – श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
नाकुण्डली नामुकुटी नास्रग्वी नाल्पभोगवान् । नामृष्टो न नलिप्ताङ्गो नासुगन्धश्च विद्यते ॥
हिंदी अनुवाद
(वहाँ) कोई बिना कुण्डल का, बिना मुकुट का, बिना माला का, अल्पभोगी, बिना स्नान किया हुआ, लिप्त अंगों वाला (बिना उबटन लगाए), या सुगन्ध से रहित नहीं था।
अर्थ / व्याख्या
यह श्लोक अयोध्या के निवासियों के बाहरी ठाठ-बाठ, साज-श्रृंगार और भोग-विलास का वर्णन करता है। सभी आभूषण, वस्त्र, सुगंध आदि से सुसज्जित थे।
टिप्पणी
इस श्लोक में सात प्रकार के निषेध हैं, जिनका तात्पर्य है कि अयोध्या में सभी सुखी, सम्पन्न और सुसज्जित थे। यह राजा के उत्तम शासन का प्रत्यक्ष प्रमाण है।
॥ श्रीमद्वाल्मीकि रामायण – बालकाण्ड – सर्ग ६ – श्लोक १० ॥
नामृष्टो न नलिप्ताङ्गो नासुगन्धश्च विद्यते ॥
nāmṛṣṭo na naliptāṅgo nāsugandhaśca vidyate ||
🔹 हिन्दी अनुवाद : (वहाँ) कोई बिना कुण्डल का, बिना मुकुट का, बिना माला का, अल्पभोगी, बिना स्नान किया हुआ, लिप्त अंगों वाला (बिना उबटन लगाए), या सुगन्ध से रहित नहीं था।
🔹 English Translation : No one (there) was without earrings, without a crown (headgear), without a garland, with limited enjoyments, unbathed, with anointed limbs, or without fragrance.
🔍 शब्दार्थ तालिका
| संस्कृत पद | व्याकरण | हिन्दी अर्थ |
|---|---|---|
| न | अव्यय | नहीं |
| अकुण्डली | पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन | बिना कुण्डल का (जिसने कुण्डल न पहने हों) |
| न | अव्यय | नहीं |
| अमुकुटी | पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन | बिना मुकुट का (बिना सिर पर आभूषण के) |
| न | अव्यय | नहीं |
| अस्रग्वी | पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन | बिना माला का (जिसने माला न पहनी हो) |
| न | अव्यय | नहीं |
| अल्पभोगवान् | पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन | अल्प भोग वाला, जो कम सुख भोगता हो |
| न | अव्यय | नहीं |
| अमृष्टः | पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन | बिना स्नान किया हुआ (या बिना उबटन लगाया) |
| न | अव्यय | नहीं |
| नलिप्ताङ्गः | पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन | बिना लिप्त अंग वाला (जिसने शरीर पर उबटन न लगाया हो) |
| न | अव्यय | नहीं |
| असुगन्धः | पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन | सुगन्ध रहित, जिसने सुगन्धित पदार्थ न लगाया हो |
| च | अव्यय | और |
| विद्यते | क्रिया, प्रथमपुरुष एकवचन (विद् धातु, आत्मनेपद) | है, विद्यमान है |
📖 श्लोक की व्याख्या
यह श्लोक अयोध्या के निवासियों के वैभव और सुख-सुविधाओं का वर्णन करता है। यहाँ सात प्रकार के निषेधों के माध्यम से यह बताया गया है कि प्रत्येक व्यक्ति सुसज्जित और सम्पन्न था।
नाकुण्डली – कोई भी व्यक्ति बिना कुण्डल (कान के आभूषण) के नहीं था। कुण्डल पहनना सौन्दर्य और सम्पन्नता का प्रतीक है।
नामुकुटी – बिना मुकुट या सिर पर आभूषण धारण किए कोई नहीं था। मुकुट राजसी ठाठ का सूचक है। सामान्य जन भी सिर पर पगड़ी या आभूषण पहनते थे।
नास्रग्वी – बिना माला के कोई नहीं था। माला (फूलों या मोतियों की) पहनना शोभा और उत्सव का भाव दर्शाता है।
नाल्पभोगवान् – कोई अल्पभोगी (कम भोग करने वाला) नहीं था। सभी लोग पर्याप्त भोग-विलास में रत थे, अर्थात् उनके पास भोग्य वस्तुओं की कमी नहीं थी।
नामृष्टः – कोई बिना स्नान किए हुए नहीं था। स्नान प्रतिदिन की स्वच्छता और पवित्रता के लिए आवश्यक है। सभी नियमित स्नान करते थे।
न नलिप्ताङ्गः – कोई बिना उबटन लगाए नहीं था। उबटन (चन्दन, केसर आदि का लेप) शरीर पर लगाना सौन्दर्य और सुगन्ध के लिए था।
नासुगन्धः – कोई बिना सुगन्ध के नहीं था। सुगन्धित द्रव्य (इत्र, तेल आदि) का प्रयोग सभी करते थे।
इस प्रकार अयोध्या के निवासी भोग-विलास, सौन्दर्य और सुगन्ध से परिपूर्ण थे। यह राज्य की अपार समृद्धि का द्योतक है।
📚 सांस्कृतिक संदर्भ
प्राचीन भारत में आभूषण, वस्त्र, सुगन्ध आदि का विशेष महत्व था। ये न केवल सौन्दर्य के साधन थे, बल्कि सामाजिक प्रतिष्ठा के भी चिह्न थे। यहाँ बताया गया है कि अयोध्या में प्रत्येक व्यक्ति इनसे युक्त था, अर्थात् कोई भी अभावग्रस्त नहीं था।
'अमृष्ट' और 'नलिप्ताङ्ग' शब्द स्नान और उबटन की प्रथा को दर्शाते हैं। यह आयुर्वेद और स्वच्छता से भी जुड़ा है।
इस प्रकार अयोध्या के वैभव और जनता के सुख का वर्णन इस श्लोक में पराकाष्ठा पर पहुँचता है।
॥ इस प्रकार सर्ग ६ के प्रथम दस श्लोकों का वर्णन समाप्त हुआ ॥
जय श्री राम 🙏