अयोध्या के राजा और लोग – श्लोक 11

संस्कृत श्लोक

नामृष्टभोजी नादाता नाप्यनङ्गदनिष्कधृक् । नाहस्ताभरणो वापि दृश्यते नाप्यनात्मवान् ॥

हिंदी अनुवाद

अयोध्या में कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं देखा जाता था जो बिना हाथ-मुँह धोए भोजन करता हो, जो दान न देता हो, जो आभूषण (अंगद और निष्क) धारण न करता हो, जो हाथों में अंगूठी न पहनता हो, या जो आत्मसंयम से रहित हो।

अर्थ / व्याख्या

यह श्लोक अयोध्या के निवासियों के उच्च चरित्र और संस्कार को दर्शाता है। प्रत्येक नागरिक शारीरिक स्वच्छता, दानशीलता, श्रृंगार और आत्मसंयम में संपन्न था।

टिप्पणी

इस श्लोक में अयोध्या के लोगों के सात्विक गुणों का उल्लेख है। "अमृष्टभोजी" का अर्थ है बिना हाथ-मुँह धोए भोजन न करना – यह स्वच्छता का प्रतीक है। "अदाता" दान न देने वाला – अयोध्या में कोई कंजूस नहीं था। "अनङ्गदनिष्कधृक्" आभूषण धारण करने वाला – यह समृद्धि और सौंदर्यबोध दर्शाता है। "अहस्ताभरण" बिना हाथों के आभूषण – सभी सजे-धजे रहते थे। "अनात्मवान्" आत्मसंयम रहित – प्रत्येक व्यक्ति इंद्रियों पर नियंत्रण रखता था। यह श्लोक एक आदर्श समाज का चित्र प्रस्तुत करता है।

॥ श्री रामायण बालकाण्ड सर्ग ६ श्लोक ११ ॥

नामृष्टभोजी नादाता नाप्यनङ्गदनिष्कधृक् ।
नाहस्ताभरणो वापि दृश्यते नाप्यनात्मवान् ॥
nāmṛṣṭabhojī nādātā nāpyanagadaniṣkadhṛk |
nāhastābharaṇo vāpi dṛśyate nāpyanātmavān ||

🔹 हिन्दी अनुवाद : अयोध्या में कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं देखा जाता था जो बिना हाथ-मुँह धोए भोजन करता हो, जो दान न देता हो, जो आभूषण (अंगद और निष्क) धारण न करता हो, जो हाथों में अंगूठी न पहनता हो, या जो आत्मसंयम से रहित हो।

🔹 English Translation : In Ayodhya, no one was seen who ate without washing, who did not donate, who did not wear ornaments (like armlets and necklaces), who had no rings on his fingers, or who was devoid of self-control.

🔍 शब्दार्थ (Word by Word Meaning)

संस्कृतव्याकरणहिन्दी अर्थ
निपातनहीं
अमृष्टभोजीविशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचनबिना हाथ-मुंह धोए भोजन करने वाला
निपातनहीं
अदाताविशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचनदान न देने वाला
निपातनहीं
अपिअव्ययभी
अनङ्गदनिष्कधृक्विशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन (अनङ्गद + निष्क + धृक्)अंगद (बाजूबंद) और निष्क (गले का आभूषण) धारण करने वाला
निपातनहीं
अहस्ताभरणःविशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचनहाथों में आभूषण रहित
वाअव्ययया
अपिअव्ययभी
दृश्यतेक्रिया, कर्मणि प्रयोग, प्रथमपुरुष एकवचन (दृश् धातु)देखा जाता है
निपातनहीं
अपिअव्ययभी
अनात्मवान्विशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचनआत्मसंयम रहित

📜 श्लोक का ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक महत्व

यह श्लोक रामायण के उस आदर्श राज्य अयोध्या के वैभव को दर्शाता है जहाँ प्रजा सभी सद्गुणों से संपन्न थी। महर्षि वाल्मीकि ने यहाँ निषेधात्मक शैली (न...न...) में अयोध्यावासियों के सकारात्मक गुणों का वर्णन किया है। "अमृष्टभोजी" शब्द स्वच्छता के महत्व को बताता है जो भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग है। "अदाता" दानशीलता का अभाव दर्शाता है – अयोध्या में कोई कंजूस न था। "अनङ्गदनिष्कधृक्" से पता चलता है कि लोग समृद्ध और सौंदर्यप्रिय थे। "अहस्ताभरण" अलंकरण की परंपरा को दर्शाता है। अंत में "अनात्मवान्" आत्मसंयम की अनुपस्थिति बताता है – सभी इंद्रियनिग्रही थे। यह श्लोक बताता है कि एक आदर्श राज्य में भौतिक समृद्धि और आध्यात्मिक उन्नति दोनों आवश्यक हैं।

✨ विशेष तथ्य: इस श्लोक में सात निषेधों के माध्यम से सात गुणों का बोध कराया गया है – स्वच्छता, दान, आभूषण धारण, हस्तालंकार, आत्मसंयम, तथा अदृश्य रूप से समृद्धि एवं सौंदर्य। यह अयोध्या के नागरिकों के सर्वांगीण विकास को प्रदर्शित करता है।

📖 व्याकरणिक एवं साहित्यिक विश्लेषण

यह श्लोक अनुष्टुप् छंद में है। यहाँ बहुव्रीहि समास का प्रयोग हुआ है – अमृष्टभोजी (अमृष्टं भोजनं यस्य सः), अदाता (न दाता), अनङ्गदनिष्कधृक् (अनङ्गदं च निष्कं च धारयति), अहस्ताभरणः (हस्ते आभरणं नास्य), अनात्मवान् (आत्मा नास्य)। क्रिया "दृश्यते" कर्मणि प्रयोग में है जो व्यापकता को दर्शाती है – कोई भी ऐसा व्यक्ति देखने में नहीं आता। यह शैली प्रभावशाली है क्योंकि यह अप्रत्यक्ष रूप से सकारात्मक गुणों की पुष्टि करती है।

🕉️ आध्यात्मिक संदेश

यह श्लोक बताता है कि मानव जीवन का लक्ष्य केवल भौतिक सुख नहीं, बल्कि आत्मसंयम और सद्गुणों का विकास है। अयोध्या के नागरिक बाहरी स्वच्छता और आभूषणों के साथ-साथ आंतरिक शुद्धि और संयम में भी रत थे। यही आदर्श समाज की पहचान है।

📚 पाठ की विधि एवं लाभ

इस श्लोक का पाठ मनुष्य में स्वच्छता, दानशीलता और आत्मसंयम के भाव जाग्रत करता है। नियमित पाठ से व्यक्ति अपने जीवन में इन गुणों को धारण करने की प्रेरणा ले सकता है।

॥ जय श्री राम ॥