अयोध्या का प्रशासन – श्लोक 31

संस्कृत श्लोक

पुत्रकामो नरपतिः पुत्रीयामिष्टिमैजयत्। ऋत्विग्भिर्ब्रह्मविद्भिश्च यथावद्भिरलङ्कृतः॥

हिंदी अनुवाद

पुत्र की कामना वाले राजा ने पुत्रीया नामक इष्टि (यज्ञ) का अनुष्ठान कराया, जो यथाविधि ब्रह्मवेत्ता ऋत्विजों से सुसज्जित था।

अर्थ / व्याख्या

यह श्लोक राजा दशरथ द्वारा पुत्र प्राप्ति के लिए किए गए पुत्रीया यज्ञ का वर्णन करता है। इसमें यज्ञ की वैदिक परम्परा और ऋत्विजों के महत्व को दर्शाया गया है।

टिप्पणी

इस श्लोक में राजा दशरथ की पुत्रेष्टि की पृष्ठभूमि रखी गई है। यह यज्ञ आगे चलकर पुत्र प्राप्ति का कारण बनता है।

॥ श्री रामायण – बालकाण्ड, सर्ग ७, श्लोक ३१ ॥

पुत्रकामो नरपतिः पुत्रीयामिष्टिमैजयत्।
ऋत्विग्भिर्ब्रह्मविद्भिश्च यथावद्भिरलङ्कृतः॥
putrakāmo narapatiḥ putrīyāmiṣṭim aijayat |
ṛtvigbhir brahmavidbhiśca yathāvadbhir alaṅkṛtaḥ ||

🔹 हिन्दी अनुवाद : पुत्र की कामना वाले राजा ने पुत्रीया नामक इष्टि (यज्ञ) का अनुष्ठान कराया, जो यथाविधि ब्रह्मवेत्ता ऋत्विजों से सुसज्जित था।

🔹 English Translation : The king, desiring sons, performed the Putriya sacrifice, which was duly adorned with Ritvijas (priests) who were knowers of Brahman.

🔍 शब्दार्थ (Word by Word Meaning)

संस्कृतव्याकरणहिन्दी अर्थ
पुत्रकामःविशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचनपुत्र की इच्छा वाला
नरपतिःपुल्लिंग, प्रथमा एकवचनराजा
पुत्रीयाम्विशेषण, स्त्रीलिंग, द्वितीया एकवचनपुत्रीया नामक (यज्ञ)
इष्टिम्स्त्रीलिंग, द्वितीया एकवचनयज्ञ, इष्टि
ऐजयत्क्रिया, लङ्लकार, प्रथमपुरुष एकवचन (इज् धातु, णिजन्त)कराया, अनुष्ठान कराया
ऋत्विग्भिःपुल्लिंग, तृतीया बहुवचनऋत्विजों (यज्ञ कराने वाले पुरोहितों) द्वारा
ब्रह्मविद्भिःविशेषण, पुल्लिंग, तृतीया बहुवचनब्रह्मवेत्ताओं, वेदज्ञों द्वारा
अव्ययऔर
यथावद्भिःअव्यय (यथा + वत्) से तृतीया बहुवचनयथाविधि, उचित रीति से युक्त
अलंकृतःविशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचनसुसज्जित, अलंकृत

📜 श्लोक का ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक महत्व

यह श्लोक अयोध्या के राजा दशरथ द्वारा पुत्र प्राप्ति के लिए किए गए "पुत्रीया यज्ञ" का उल्लेख करता है। पुत्रीया यज्ञ एक वैदिक कर्मकाण्ड है जो संतान की प्राप्ति के लिए किया जाता था। राजा दशरथ ने इस यज्ञ का आयोजन महर्षि ऋष्यशृंग की देखरेख में करवाया था, जिसका विस्तृत वर्णन आगे के श्लोकों में मिलता है। इस यज्ञ के फलस्वरूप उन्हें चार पुत्र – राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न – प्राप्त हुए।

यहाँ "पुत्रकामः" विशेषण राजा की मनःस्थिति को दर्शाता है – वे पुत्र की अभिलाषा से व्याकुल थे। "पुत्रीयाम्" शब्द "पुत्र" से व्युत्पन्न है, जिसका अर्थ है "पुत्र से संबंधित"। यह यज्ञ विशेष रूप से पुत्र प्राप्ति के उद्देश्य से रचा गया था। "ऋत्विग्भिः" का तात्पर्य उन याज्ञिक पुरोहितों से है जो वैदिक मन्त्रों के ज्ञाता और यज्ञ के कुशल संचालक होते हैं। उन्हें "ब्रह्मविद्भिः" कहकर उनके उच्च ज्ञान की प्रशंसा की गई है।

📖 व्याकरणिक एवं साहित्यिक विश्लेषण

यह श्लोक अनुष्टुप् छंद में है। प्रथम पाद "पुत्रकामो नरपतिः पुत्रीयामिष्टिमैजयत्" में ८ अक्षर हैं, द्वितीय पाद "ऋत्विग्भिर्ब्रह्मविद्भिश्च यथावद्भिरलङ्कृतः" में भी ८ अक्षर। "ऐजयत्" क्रिया णिजन्त (प्रेरणार्थक) रूप है, जो दर्शाता है कि राजा ने स्वयं यज्ञ नहीं किया बल्कि ऋत्विजों द्वारा करवाया। "अलंकृतः" विशेषण राजा के लिए है, जो यज्ञ की व्यवस्था और ऋत्विजों की योग्यता से सुशोभित है।

श्लोक में समासों का प्रयोग सार्थक है – "पुत्रकामः" (बहुव्रीहि समास), "ब्रह्मविद्भिः" (उपपद समास), "यथावद्भिः" (अव्ययीभाव समास)। इससे भाषा की संक्षिप्तता और अर्थ की गहरता बढ़ी है।

🕉️ आध्यात्मिक संदेश

इस श्लोक से हमें यह सीख मिलती है कि सच्ची अभिलाषा को पूरा करने के लिए धार्मिक एवं वैदिक मार्ग अपनाना चाहिए। राजा दशरथ ने पुत्र प्राप्ति के लिए यज्ञ का सहारा लिया, जो उस काल में सर्वोत्तम साधन माना जाता था। यह भी संकेत है कि मनोरथों की सिद्धि के लिए योग्य विद्वानों (ऋत्विजों) का मार्गदर्शन आवश्यक है। यज्ञ केवल बाह्य कर्म नहीं, बल्कि आंतरिक शुद्धि और ईश्वराराधना का माध्यम है।

॥ पुत्रकामो नरपतिः – धर्म एवं संतान की कामना ॥

जय श्री राम 🙏