अयोध्या का प्रशासन – श्लोक 30
संस्कृत श्लोक
एवं गुणगणैर्युक्तो राजा दशरथः प्रियः। बभूव सर्वभूतानां प्रजानां च हिते रतः॥
हिंदी अनुवाद
इस प्रकार गुणसमूह से युक्त राजा दशरथ सब प्राणियों और प्रजा के हित में लगे रहने के कारण प्रिय हुए।
अर्थ / व्याख्या
इस प्रकार गुणों से युक्त राजा दशरथ सभी प्राणियों और प्रजा के हित में लगे रहने के कारण सबको प्रिय थे।
टिप्पणी
यह श्लोक सर्ग का समापन श्लोक है, जो दशरथ की लोकप्रियता और उनके हितकारी स्वभाव का सार प्रस्तुत करता है।
श्लोक ३०: दशरथ की लोकप्रियता एवं हितकारिता
बभूव सर्वभूतानां प्रजानां च हिते रतः॥
🔹 हिन्दी अनुवाद : इस प्रकार गुणसमूह से युक्त राजा दशरथ सब प्राणियों और प्रजा के हित में लगे रहने के कारण प्रिय हुए।
🔹 English Translation : Thus endowed with multitude of virtues, King Dasharatha became dear to all beings and was devoted to the welfare of his subjects.
🔍 शब्दार्थ (Word by Word Meaning)
| संस्कृत | व्याकरण | हिन्दी अर्थ |
|---|---|---|
| एवम् | अव्यय | इस प्रकार |
| गुणगणैः | पुल्लिंग, तृतीया बहुवचन | गुणों के समूह से |
| युक्तः | विशेषण, प्रथमा एकवचन | युक्त |
| राजा | प्रथमा एकवचन | राजा |
| दशरथः | प्रथमा एकवचन | दशरथ |
| प्रियः | विशेषण, प्रथमा एकवचन | प्रिय, प्यारा |
| बभूव | लिट्लकार, प्रथमपुरुष एकवचन | हुआ |
| सर्वभूतानाम् | षष्ठी बहुवचन | सब प्राणियों के |
| प्रजानाम् | स्त्रीलिंग, षष्ठी बहुवचन | प्रजा के |
| च | अव्यय | और |
| हिते | नपुंसकलिंग, सप्तमी एकवचन | हित में, भलाई में |
| रतः | विशेषण, प्रथमा एकवचन | लगा हुआ, तत्पर, आसक्त |
📜 व्याख्या एवं महत्त्व
यह श्लोक सर्ग ७ का अन्तिम श्लोक है, जो दशरथ के चरित्र का सार प्रस्तुत करता है। वे सभी गुणों से सम्पन्न थे, जिनका वर्णन पूर्व श्लोकों में किया गया – तेज, बल, उदारता, धर्मपरायणता, प्रजापालन आदि। इन गुणों के कारण वे सर्वभूतानाम् (सभी प्राणियों) और प्रजानाम् (प्रजा) के प्रिय बन गए। उनकी प्रियता का कारण उनका हिते रतः होना था – वे सदैव सबके हित में लगे रहते थे।
एक आदर्श राजा वही है जो अपने सुख से अधिक प्रजा के हित की चिन्ता करता है। दशरथ ऐसे ही राजा थे। इसलिए वे सबके प्रिय थे। यह श्लोक पूरे सर्ग का निचोड़ है।
🕉️ आध्यात्मिक संदेश
यह श्लोक सिखाता है कि सच्ची लोकप्रियता और प्रियता दूसरों के हित में लगे रहने से प्राप्त होती है। जो व्यक्ति अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर दूसरों की भलाई करता है, वह सबका प्रिय हो जाता है। यही मानव जीवन का परम धर्म है।
॥ बभूव सर्वभूतानां प्रजानां च हिते रतः ॥
जय श्री राम 🙏