अयोध्या का प्रशासन – श्लोक 32
संस्कृत श्लोक
स यज्ञः सुमहानासीत्तस्य राज्ञो महात्मनः। पुत्रीयो नाम विप्रेन्द्रैस्तत्र पूर्वैः कृतः क्रतुः॥
हिंदी अनुवाद
वह यज्ञ उस महात्मा राजा का अत्यंत महान था। 'पुत्रीय' नामक वह यज्ञ पूर्व काल में महर्षियों द्वारा किया गया था।
अर्थ / व्याख्या
यह श्लोक पुत्रीया यज्ञ की प्राचीनता और महत्ता को स्थापित करता है, जिसे पूर्वकाल में महर्षियों ने भी किया था।
टिप्पणी
यहाँ यज्ञ की महिमा का गुणगान किया गया है। इससे यह सिद्ध होता है कि दशरथ का यज्ञ प्राचीन परंपरा का अनुसरण करते हुए किया गया था।
॥ श्री रामायण – बालकाण्ड, सर्ग ७, श्लोक ३२ ॥
पुत्रीयो नाम विप्रेन्द्रैस्तत्र पूर्वैः कृतः क्रतुः॥
🔹 हिन्दी अनुवाद : वह यज्ञ उस महात्मा राजा का अत्यंत महान था। 'पुत्रीय' नामक वह यज्ञ पूर्व काल में महर्षियों द्वारा किया गया था।
🔹 English Translation : That sacrifice of the great-souled king was very grand. That Putriya sacrifice had been performed by great sages in ancient times.
🔍 शब्दार्थ (Word by Word Meaning)
| संस्कृत | व्याकरण | हिन्दी अर्थ |
|---|---|---|
| स | सर्वनाम, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन | वह |
| यज्ञः | पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन | यज्ञ |
| सुमहान् | विशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन | अत्यंत महान |
| आसीत् | क्रिया, लङ्लकार, प्रथमपुरुष एकवचन (अस् धातु) | था |
| तस्य | सर्वनाम, पुल्लिंग, षष्ठी एकवचन | उसका |
| राज्ञः | पुल्लिंग, षष्ठी एकवचन | राजा का |
| महात्मनः | विशेषण, पुल्लिंग, षष्ठी एकवचन | महान आत्मा वाले |
| पुत्रीयः | विशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन | पुत्रीय नामक |
| नाम | अव्यय | नाम से |
| विप्रेन्द्रैः | पुल्लिंग, तृतीया बहुवचन | श्रेष्ठ ब्राह्मणों (महर्षियों) द्वारा |
| तत्र | अव्यय | वहाँ |
| पूर्वैः | विशेषण, पुल्लिंग, तृतीया बहुवचन | पूर्व कालीन |
| कृतः | क्रिया, क्त प्रत्यय, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन | किया गया |
| क्रतुः | पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन | यज्ञ |
यह श्लोक पुत्रीया यज्ञ की प्राचीनता और महत्ता को स्थापित करता है। 'सुमहान्' कहकर यज्ञ की भव्यता व्यक्त की गई है। 'महात्मनः' राजा की महानता को दर्शाता है। 'विप्रेन्द्रैः पूर्वैः' से यह सिद्ध होता है कि यह यज्ञ ऋषियों की परंपरा से चला आ रहा था।
आध्यात्मिक दृष्टि से, यज्ञ केवल भौतिक फल के लिए नहीं, बल्कि धर्म की रक्षा और वंश परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए किया गया। यही कारण है कि दशरथ का यज्ञ सफल हुआ और उन्हें श्रीराम जैसे पुत्र की प्राप्ति हुई।