अयोध्या का प्रशासन – श्लोक 33
संस्कृत श्लोक
तस्मिन्यज्ञे समाप्ते तु राजा दशरथः स्वयम्। ऋत्विग्भ्यो दक्षिणां दिव्यां ददौ रत्नमयीं शुभाम्॥
हिंदी अनुवाद
उस यज्ञ के समाप्त होने पर राजा दशरथ ने स्वयं ऋत्विजों को दिव्य, रत्नमयी एवं शुभ दक्षिणा दी।
अर्थ / व्याख्या
यह श्लोक राजा की उदारता और यज्ञ की पूर्णता को दर्शाता है। दक्षिणा यज्ञ का अनिवार्य अंग है।
टिप्पणी
यज्ञ के बाद दक्षिणा देना वैदिक परंपरा है। यहाँ दक्षिणा को 'दिव्याम्' और 'रत्नमयीम्' कहकर उसकी महत्ता बढ़ाई गई है। राजा ने स्वयं (स्वयम्) दक्षिणा दी, जो उनके साक्षात् भाग लेने का प्रतीक है।
॥ श्री रामायण – बालकाण्ड, सर्ग ७, श्लोक ३३ ॥
ऋत्विग्भ्यो दक्षिणां दिव्यां ददौ रत्नमयीं शुभाम्॥
🔹 हिन्दी अनुवाद : उस यज्ञ के समाप्त होने पर राजा दशरथ ने स्वयं ऋत्विजों को दिव्य, रत्नमयी एवं शुभ दक्षिणा दी।
🔹 English Translation : Upon completion of that sacrifice, King Dasharatha himself gave to the Ritvijas a divine, gem-studded, and auspicious fee.
🔍 शब्दार्थ (Word by Word Meaning)
| संस्कृत | व्याकरण | हिन्दी अर्थ |
|---|---|---|
| तस्मिन् | सर्वनाम, पुल्लिंग, सप्तमी एकवचन | उस (यज्ञ) में |
| यज्ञे | पुल्लिंग, सप्तमी एकवचन | यज्ञ में |
| समाप्ते | विशेषण, पुल्लिंग, सप्तमी एकवचन | समाप्त होने पर |
| तु | अव्यय | पुनः, तत्पश्चात् |
| राजा | पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन | राजा |
| दशरथः | पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन | दशरथ |
| स्वयम् | अव्यय | स्वयं |
| ऋत्विग्भ्यः | पुल्लिंग, चतुर्थी बहुवचन | ऋत्विजों को |
| दक्षिणाम् | स्त्रीलिंग, द्वितीया एकवचन | दक्षिणा |
| दिव्याम् | विशेषण, स्त्रीलिंग, द्वितीया एकवचन | दिव्य, अलौकिक |
| ददौ | क्रिया, लिट्लकार, प्रथमपुरुष एकवचन (दा धातु) | दी |
| रत्नमयीम् | विशेषण, स्त्रीलिंग, द्वितीया एकवचन | रत्नों से युक्त |
| शुभाम् | विशेषण, स्त्रीलिंग, द्वितीया एकवचन | शुभ, मंगलकारी |
यह श्लोक यज्ञ के पूर्ण होने पर दी जाने वाली दक्षिणा के महत्व को रेखांकित करता है। राजा दशरथ की उदारता और ऋत्विजों के प्रति कृतज्ञता यहाँ प्रकट होती है। 'दिव्याम्' और 'रत्नमयीम्' विशेषण यह बताते हैं कि दक्षिणा साधारण नहीं, बल्कि बहुमूल्य रत्नों से परिपूर्ण और अलौकिक थी। यह राजा के ऐश्वर्य और भक्ति को दर्शाता है।