अयोध्या के राजा और लोग – श्लोक 19

संस्कृत श्लोक

क्षत्रं ब्रह्ममुखं चासीद् वैश्याः क्षत्रमनुव्रताः । शूद्राः स्वधर्मनिरतास्त्रीन् वर्णानुपचारिणः ॥

हिंदी अनुवाद

क्षत्रिय ब्राह्मणों के मुख से निर्देशित होते थे, वैश्य क्षत्रियों के अनुवर्ती थे, और शूद्र अपने धर्म में निरत रहकर तीनों वर्णों की सेवा करते थे।

अर्थ / व्याख्या

यह श्लोक चारों वर्णों के पारस्परिक संबंधों और कर्तव्यों का वर्णन करता है।

टिप्पणी

इस श्लोक में वर्णों के बीच सहयोग और उनके कर्तव्यों का वर्णन है। "क्षत्रं ब्रह्ममुखम्" – क्षत्रिय ब्राह्मणों के मुख से निर्देशित होते थे, अर्थात ब्राह्मणों के परामर्श और आशीर्वाद से राज्य चलता था। "वैश्याः क्षत्रमनुव्रताः" – वैश्य क्षत्रियों के अनुशासन में रहते थे, उनके संरक्षण में व्यापार-वाणिज्य करते थे। "शूद्राः स्वधर्मनिरतास्त्रीन् वर्णानुपचारिणः" – शूद्र अपने धर्म (सेवा) में निरत होकर तीनों वर्णों की सेवा करते थे। यह एक आदर्श वर्णाश्रम व्यवस्था का चित्र है जहाँ सभी अपने-अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए परस्पर सहयोग से रहते हैं।

॥ श्री रामायण बालकाण्ड सर्ग ६ श्लोक १९ ॥

क्षत्रं ब्रह्ममुखं चासीद् वैश्याः क्षत्रमनुव्रताः ।
शूद्राः स्वधर्मनिरतास्त्रीन् वर्णानुपचारिणः ॥
kṣatraṃ brahmamukhaṃ cāsīd vaiśyāḥ kṣatramanuvratāḥ |
śūdrāḥ svadharmaniratās trīn varṇān upacāriṇaḥ ||

🔹 हिन्दी अनुवाद : क्षत्रिय ब्राह्मणों के मुख से निर्देशित होते थे, वैश्य क्षत्रियों के अनुवर्ती थे, और शूद्र अपने धर्म में निरत रहकर तीनों वर्णों की सेवा करते थे।

🔹 English Translation : The Kshatriyas were guided by the Brahmins, the Vaishyas followed the Kshatriyas, and the Shudras, devoted to their own duty, served the three varnas.

🔍 शब्दार्थ (Word by Word Meaning)

संस्कृतव्याकरणहिन्दी अर्थ
क्षत्रम्संज्ञा, नपुंसकलिंग, प्रथमा एकवचनक्षत्रिय वर्ण
ब्रह्ममुखम्विशेषण, नपुंसकलिंग, प्रथमा एकवचन (ब्रह्म + मुख)ब्राह्मणों के मुख से निर्देशित
अव्ययऔर
आसीत्क्रिया, अनद्यतन भूतकाल, प्रथमपुरुष एकवचन (अस् धातु)था
वैश्याःसंज्ञा, पुल्लिंग, प्रथमा बहुवचनवैश्य
क्षत्रम्संज्ञा, नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचनक्षत्रियों के
अनुव्रताःविशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा बहुवचनअनुवर्ती, पीछे चलने वाले
शूद्राःसंज्ञा, पुल्लिंग, प्रथमा बहुवचनशूद्र
स्वधर्मनिरताःविशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा बहुवचनअपने धर्म में लगे हुए
त्रीन्संख्या, पुल्लिंग, द्वितीया बहुवचनतीन
वर्णान्संज्ञा, पुल्लिंग, द्वितीया बहुवचनवर्णों की
उपचारिणःविशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा बहुवचनसेवा करने वाले

📜 श्लोक का ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक महत्व

यह श्लोक वैदिक वर्णाश्रम व्यवस्था का आदर्श रूप प्रस्तुत करता है। "ब्रह्ममुखम्" – ब्राह्मणों को मुख (शीर्ष) कहा गया है, जो समाज के पथ-प्रदर्शक हैं। क्षत्रिय उनके अनुसार राज्य चलाते हैं। वैश्य क्षत्रियों के अनुवर्ती होते हैं, अर्थात उनके संरक्षण में आर्थिक गतिविधियाँ संचालित करते हैं। शूद्र तीनों वर्णों की सेवा करते हैं। यह एक सुव्यवस्थित समाज का चित्र है जहाँ प्रत्येक वर्ण अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए समाज की उन्नति में योगदान देता है। अयोध्या में यह व्यवस्था सुचारु रूप से कार्यरत थी।

✨ विशेष तथ्य: "ब्रह्ममुखम्" का शाब्दिक अर्थ है "जिसका मुख ब्राह्मण है"। यह पुरुषसूक्त (ऋग्वेद 10.90) के वर्ण-व्यवस्था के वर्णन से मेल खाता है।

📖 व्याकरणिक एवं साहित्यिक विश्लेषण

यहाँ "ब्रह्ममुखम्" बहुव्रीहि समास (ब्रह्म मुखं यस्य तत्)। "अनुव्रताः" – अनु + व्रत, अर्थात व्रत का अनुसरण करने वाले। "स्वधर्मनिरताः" – स्वधर्मे निरताः, सप्तमी तत्पुरुष। "उपचारिणः" – उप + चर् + णिनि, सेवा करने वाले।

🕉️ आध्यात्मिक संदेश

यह श्लोक सिखाता है कि समाज के सुचारु संचालन के लिए प्रत्येक वर्ण को अपने निर्धारित कर्तव्यों का पालन करना चाहिए और अन्य वर्णों के साथ सहयोग करना चाहिए। यही व्यवस्था समृद्धि लाती है।

📚 पाठ की विधि एवं लाभ

इस श्लोक के पाठ से व्यक्ति में अपने कर्तव्यों के प्रति निष्ठा और समाज के प्रति सम्मान का भाव जाग्रत होता है।

॥ जय श्री राम ॥