अयोध्या के राजा और लोग – श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
दीर्घायुषो नराः सर्वे धर्मं सत्यं च संश्रिताः । सहिताः पुत्रपौत्रैश्च नित्यं स्त्रीभिः पुरोत्तमे ॥
हिंदी अनुवाद
उस उत्तम नगर (अयोध्या) में सभी पुरुष दीर्घायु थे, धर्म और सत्य का आश्रय लिए हुए थे, तथा पुत्र-पौत्रों और स्त्रियों के साथ सदा सहित (युक्त) थे।
अर्थ / व्याख्या
इस श्लोक में अयोध्या के पुरुषों की दीर्घायु, धर्म-सत्य में आस्था और पारिवारिक सुख का वर्णन है।
टिप्पणी
यह श्लोक अयोध्या के नागरिकों के जीवन की चार विशेषताएँ बताता है: 1. दीर्घायुषः – सभी दीर्घायु थे, जो स्वास्थ्य और संतोष का सूचक है। 2. धर्मं सत्यं च संश्रिताः – धर्म और सत्य का आश्रय लेना, अर्थात सन्मार्ग पर चलना। 3. पुत्रपौत्रैः सहिताः – पुत्र-पौत्रों से युक्त, यह वंशवृद्धि और पारिवारिक सुख को दर्शाता है। 4. नित्यं स्त्रीभिः – सदा पत्नियों के साथ, यह दांपत्य सुख का प्रतीक है। इस प्रकार अयोध्या के नागरिक शारीरिक, नैतिक, पारिवारिक और सामाजिक रूप से संपन्न थे।
॥ श्री रामायण बालकाण्ड सर्ग ६ श्लोक १८ ॥
सहिताः पुत्रपौत्रैश्च नित्यं स्त्रीभिः पुरोत्तमे ॥
sahitāḥ putrapautraiśca nityaṃ strībhiḥ purottame ||
🔹 हिन्दी अनुवाद : उस उत्तम नगर (अयोध्या) में सभी पुरुष दीर्घायु थे, धर्म और सत्य का आश्रय लिए हुए थे, तथा पुत्र-पौत्रों और स्त्रियों के साथ सदा सहित (युक्त) थे।
🔹 English Translation : In that excellent city (Ayodhya), all men were long-lived, devoted to dharma and truth, and always accompanied by sons, grandsons, and women.
🔍 शब्दार्थ (Word by Word Meaning)
| संस्कृत | व्याकरण | हिन्दी अर्थ |
|---|---|---|
| दीर्घायुषः | विशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा बहुवचन | दीर्घ आयु वाले |
| नराः | संज्ञा, पुल्लिंग, प्रथमा बहुवचन | पुरुष |
| सर्वे | सर्वनाम, पुल्लिंग, प्रथमा बहुवचन | सभी |
| धर्मम् | संज्ञा, पुल्लिंग, द्वितीया एकवचन | धर्म को |
| सत्यम् | संज्ञा, नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचन | सत्य को |
| च | अव्यय | और |
| संश्रिताः | विशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा बहुवचन | आश्रित, आश्रय लिए हुए |
| सहिताः | विशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा बहुवचन | सहित, युक्त |
| पुत्रपौत्रैः | संज्ञा, पुल्लिंग, तृतीया बहुवचन | पुत्रों और पौत्रों के साथ |
| च | अव्यय | और |
| नित्यम् | अव्यय | सदा |
| स्त्रीभिः | संज्ञा, स्त्रीलिंग, तृतीया बहुवचन | स्त्रियों के साथ |
| पुरोत्तमे | संज्ञा, नपुंसकलिंग, सप्तमी एकवचन (पुर + उत्तम) | पुरों में उत्तम (अयोध्या) में |
📜 श्लोक का ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक महत्व
यह श्लोक अयोध्या के नागरिकों के सुखी और संतुलित जीवन का चित्रण करता है। "दीर्घायुषः" – दीर्घायु होना अच्छे स्वास्थ्य और पुण्य का फल माना जाता था। "धर्मं सत्यं च संश्रिताः" – धर्म और सत्य का आश्रय लेना व्यक्ति के नैतिक उत्कर्ष को दर्शाता है। "सहिताः पुत्रपौत्रैः" – संयुक्त परिवार की परंपरा का सूचक, जो भारतीय संस्कृति की विशेषता है। "नित्यं स्त्रीभिः" – पत्नियों के साथ सदा सहवास, दांपत्य सुख और सम्मान को दर्शाता है। इस प्रकार अयोध्या में जीवन के सभी आयाम सुखद थे।
📖 व्याकरणिक एवं साहित्यिक विश्लेषण
यहाँ "दीर्घायुषः" – दीर्घ + आयुस्, तद्धित प्रत्यय। "धर्मं सत्यं च संश्रिताः" – द्वितीया में कर्म। "सहिताः" के साथ तृतीया विभक्ति (पुत्रपौत्रैः, स्त्रीभिः) का प्रयोग। "पुरोत्तमे" सप्तमी एकवचन।
🕉️ आध्यात्मिक संदेश
यह श्लोक बताता है कि धर्म और सत्य का पालन करने से मनुष्य दीर्घायु होता है और परिवार सहित सुखी रहता है। यही आदर्श जीवन है।
📚 पाठ की विधि एवं लाभ
इस श्लोक के पाठ से व्यक्ति को धर्म, सत्य और परिवार के प्रति प्रेम बढ़ता है तथा दीर्घायु की कामना पूरी होती है।
॥ जय श्री राम ॥