अयोध्या के राजा और लोग – श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
वर्णेष्वग्र्यचतुर्थेषु देवतातिथिपूजकाः । कृतज्ञाश्च वदान्याश्च शूरा विक्रमसंयुताः ॥
हिंदी अनुवाद
अग्र्य (श्रेष्ठ) और चतुर्थ (अंतिम) वर्णों (ब्राह्मण और शूद्र) सहित सभी वर्णों के लोग देवता और अतिथियों की पूजा करने वाले, कृतज्ञ, दानी, और पराक्रम से युक्त वीर थे।
अर्थ / व्याख्या
यह श्लोक सभी वर्णों के लोगों के सार्वभौम सद्गुणों का वर्णन करता है।
टिप्पणी
इस श्लोक में वाल्मीकि ने अयोध्या के सभी वर्णों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र) के समान गुणों का उल्लेख किया है। "अग्र्यचतुर्थेषु" का अर्थ है प्रथम (ब्राह्मण) और चतुर्थ (शूद्र) सहित, अर्थात सभी वर्ण। उनमें सामान्य गुण थे: 1. देवता और अतिथियों की पूजा करना, 2. कृतज्ञता, 3. दानशीलता, 4. वीरता और पराक्रम। यह बताता है कि अयोध्या में वर्ण-व्यवस्था के बावजूद सभी में सद्गुण विद्यमान थे और वे परस्पर सहयोग से रहते थे।
॥ श्री रामायण बालकाण्ड सर्ग ६ श्लोक १७ ॥
कृतज्ञाश्च वदान्याश्च शूरा विक्रमसंयुताः ॥
kṛtajñāśca vadānyāśca śūrā vikramasaṃyutāḥ ||
🔹 हिन्दी अनुवाद : अग्र्य (श्रेष्ठ) और चतुर्थ (अंतिम) वर्णों (ब्राह्मण और शूद्र) सहित सभी वर्णों के लोग देवता और अतिथियों की पूजा करने वाले, कृतज्ञ, दानी, और पराक्रम से युक्त वीर थे।
🔹 English Translation : People of all varnas, including the foremost (Brahmins) and the fourth (Shudras), were worshippers of gods and guests, grateful, charitable, and heroic with valor.
🔍 शब्दार्थ (Word by Word Meaning)
| संस्कृत | व्याकरण | हिन्दी अर्थ |
|---|---|---|
| वर्णेषु | संज्ञा, पुल्लिंग, सप्तमी बहुवचन | वर्णों में |
| अग्र्यचतुर्थेषु | विशेषण, पुल्लिंग, सप्तमी बहुवचन | अग्र्य (प्रथम) और चतुर्थ (चौथे) वर्णों सहित |
| देवतातिथिपूजकाः | विशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा बहुवचन | देवताओं और अतिथियों की पूजा करने वाले |
| कृतज्ञाः | विशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा बहुवचन | कृतज्ञ |
| च | अव्यय | और |
| वदान्याः | विशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा बहुवचन | दानी |
| च | अव्यय | और |
| शूराः | विशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा बहुवचन | वीर |
| विक्रमसंयुताः | विशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा बहुवचन | पराक्रम से युक्त |
📜 श्लोक का ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक महत्व
यह श्लोक वैदिक वर्णाश्रम व्यवस्था में भी समान नैतिक मूल्यों की स्थापना करता है। "देवतातिथिपूजकाः" – सभी वर्ण देवता और अतिथि की पूजा करते थे, यह धार्मिक एकता का सूचक है। "कृतज्ञाः" – उपकार मानने वाले, जो सभी में आवश्यक गुण है। "वदान्याः" – दानशीलता, जो केवल ब्राह्मणों तक सीमित नहीं थी। "शूराः विक्रमसंयुताः" – वीरता और पराक्रम केवल क्षत्रियों में ही नहीं, बल्कि सभी में थी। यह बताता है कि अयोध्या में सभी वर्ण अपने-अपने धर्म का पालन करते हुए भी सार्वभौम सद्गुणों से संपन्न थे।
📖 व्याकरणिक एवं साहित्यिक विश्लेषण
यहाँ "वर्णेषु" सप्तमी बहुवचन, "अग्र्यचतुर्थेषु" विशेषण। "देवतातिथिपूजकाः" में देवता और अतिथि दोनों के साथ पूजक का समास। "कृतज्ञाः" (कृत + ज्ञा) – किए हुए को जानने वाला। "वदान्याः" = दानी। "शूराः" = वीर। "विक्रमसंयुताः" तृतीया तत्पुरुष समास (विक्रमेण संयुताः)।
🕉️ आध्यात्मिक संदेश
यह श्लोक बताता है कि वर्ण-व्यवस्था के बावजूद सभी मनुष्यों में समान नैतिक गुण होने चाहिए। देव-अतिथि पूजा, कृतज्ञता, दान और वीरता मानव मात्र के आदर्श हैं।
📚 पाठ की विधि एवं लाभ
इस श्लोक का पाठ सामाजिक समरसता और सद्गुणों के विकास में सहायक है।
॥ जय श्री राम ॥