अयोध्या के राजा और लोग – श्लोक 16

संस्कृत श्लोक

कश्चिन्नरो वा नारी वा नाश्रीमान् नाप्यरूपवान् । द्रष्टुं शक्यमयोध्यायां नापि राजन्यभक्तिमान् ॥

हिंदी अनुवाद

अयोध्या में कोई भी पुरुष या स्त्री ऐसा नहीं देखा जा सकता था जो श्रीहीन (धनहीन) हो, रूपहीन हो, या राजा के प्रति भक्तिहीन हो।

अर्थ / व्याख्या

इस श्लोक में अयोध्या के नर-नारियों की संपन्नता, सौंदर्य और राजभक्ति का वर्णन है।

टिप्पणी

यह श्लोक अयोध्या के निवासियों की भौतिक और मानसिक समृद्धि को रेखांकित करता है। "अश्रीमान्" का अर्थ है जिसमें श्री (लक्ष्मी, संपत्ति, तेज) न हो; अयोध्या में ऐसा कोई न था। "अरूपवान्" – रूपहीन; सभी रूपवान थे। "राजन्यभक्तिमान्" – राजा के प्रति भक्ति रखने वाला; यहाँ निषेध का अर्थ है कि कोई राजभक्तिहीन न था। यह वर्णन अयोध्या के आदर्श समाज की पूर्णता को दर्शाता है जहाँ प्रत्येक व्यक्ति त्रिविध संपन्नता – धन, रूप, और राजभक्ति – से युक्त था।

॥ श्री रामायण बालकाण्ड सर्ग ६ श्लोक १६ ॥

कश्चिन्नरो वा नारी वा नाश्रीमान् नाप्यरूपवान् ।
द्रष्टुं शक्यमयोध्यायां नापि राजन्यभक्तिमान् ॥
kaścin naro vā nārī vā nāśrīmān nāpy arūpavān |
draṣṭuṃ śakyam ayodhyāyāṃ nāpi rājanyabhaktimān ||

🔹 हिन्दी अनुवाद : अयोध्या में कोई भी पुरुष या स्त्री ऐसा नहीं देखा जा सकता था जो श्रीहीन (धनहीन) हो, रूपहीन हो, या राजा के प्रति भक्तिहीन हो।

🔹 English Translation : In Ayodhya, no man or woman could be seen who was without prosperity, without beauty, or without devotion to the king.

🔍 शब्दार्थ (Word by Word Meaning)

संस्कृतव्याकरणहिन्दी अर्थ
कश्चित्सर्वनाम, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचनकोई
नरःसंज्ञा, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचनपुरुष
वाअव्ययया
नारीसंज्ञा, स्त्रीलिंग, प्रथमा एकवचनस्त्री
वाअव्ययया
निपातनहीं
अश्रीमान्विशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचनश्रीहीन (धन-संपदा रहित)
निपातनहीं
अपिअव्ययभी
अरूपवान्विशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचनरूपहीन
द्रष्टुम्क्रिया, तुमुन् प्रत्यय (दृश् धातु)देखने के लिए
शक्यम्विशेषण, नपुंसकलिंग, प्रथमा एकवचनसम्भव, सकने योग्य
अयोध्यायाम्संज्ञा, स्त्रीलिंग, सप्तमी एकवचनअयोध्या में
निपातनहीं
अपिअव्ययभी
राजन्यभक्तिमान्विशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन (राजन्य + भक्ति + मतुप्)राजा के प्रति भक्ति रखने वाला (यहाँ अभाव अर्थ में निषेध)

📜 श्लोक का ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक महत्व

यह श्लोक अयोध्या के निवासियों के तीन प्रमुख गुणों – समृद्धि, सौंदर्य और राजभक्ति – का वर्णन करता है। "श्री" का अर्थ केवल धन ही नहीं, बल्कि ऐश्वर्य, तेज और समृद्धि भी है। अयोध्या में प्रत्येक व्यक्ति इससे संपन्न था। "रूपवान्" का अर्थ है सुंदर आकृति वाला; यह बताता है कि अयोध्यावासी स्वस्थ और आकर्षक थे। "राजन्यभक्तिमान्" राजा के प्रति अनन्य भक्ति को दर्शाता है। यहाँ राजा दशरथ हैं, जो प्रजा के पालक हैं। प्रजा की राजभक्ति आदर्श राज्य का लक्षण है।

✨ विशेष तथ्य: "श्री" शब्द का प्रयोग लक्ष्मी, सुंदरता और कांति तीनों के लिए होता है। इसलिए "अश्रीमान्" से इन तीनों का अभाव दर्शाया गया है।

📖 व्याकरणिक एवं साहित्यिक विश्लेषण

यहाँ "नरो वा नारी वा" पुल्लिंग और स्त्रीलिंग दोनों का समावेश करता है। "द्रष्टुं शक्यम्" – तुमुन् प्रत्यय के साथ शक्य विशेषण, जिसका अर्थ है "देखना संभव है"। यह अभिधान शैली है। "राजन्यभक्तिमान्" में राजन्य (क्षत्रिय, राजा) के प्रति भक्ति।

🕉️ आध्यात्मिक संदेश

यह श्लोक बताता है कि आदर्श समाज में प्रत्येक नागरिक भौतिक रूप से संपन्न, शारीरिक रूप से सुंदर और नैतिक रूप से राजा (सरकार) के प्रति वफादार होता है। यह त्रिविध सद्गुण समाज को सुदृढ़ बनाते हैं।

📚 पाठ की विधि एवं लाभ

इस श्लोक के पाठ से व्यक्ति में आत्म-सम्मान, सौंदर्य-बोध और राष्ट्रभक्ति का भाव जाग्रत होता है।

॥ जय श्री राम ॥