अयोध्या के राजा और लोग – श्लोक 15

संस्कृत श्लोक

नाषडङ्गविदत्रास्ति नाव्रतो नासहस्रदः । न दीनः क्षिप्तचित्तो वा व्यथितो वापि कश्चन ॥

हिंदी अनुवाद

यहाँ (अयोध्या में) कोई भी षडंग (वेद के छः अंग) न जानने वाला, व्रतहीन, सहस्र (बहुत) दान न देने वाला, दीन, व्यग्रचित्त या पीड़ित नहीं था।

अर्थ / व्याख्या

यह श्लोक अयोध्यावासियों की वैदिक शिक्षा, व्रतपरायणता, दानशीलता और मानसिक शांति को दर्शाता है।

टिप्पणी

इस श्लोक में अयोध्या के नागरिकों की वैदिक विद्या, धार्मिक अनुष्ठान, दान और मानसिक स्थिति का वर्णन है। "षडङ्गवित्" – वेद के छः अंगों (शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छंद, ज्योतिष) का ज्ञाता। अयोध्या में प्रत्येक व्यक्ति इनमें पारंगत था। "अव्रतः" – व्रत न करने वाला; सभी व्रतपरायण थे। "असहस्रदः" – हजारों का दान न देने वाला; अर्थात सभी बहुत दान देते थे। "दीनः" – दीन, गरीब; अयोध्या में कोई दरिद्र न था। "क्षिप्तचित्तः" – व्यग्र मन वाला; सभी का मन शांत था। "व्यथितः" – पीड़ित; कोई दुःखी न था। यह आदर्श समाज का चित्रण है।

॥ श्री रामायण बालकाण्ड सर्ग ६ श्लोक १५ ॥

नाषडङ्गविदत्रास्ति नाव्रतो नासहस्रदः ।
न दीनः क्षिप्तचित्तो वा व्यथितो वापि कश्चन ॥
nāṣaḍaṅgavid atrāsti nāvrato nāsahasradaḥ |
na dīnaḥ kṣiptacitto vā vyathito vāpi kaścana ||

🔹 हिन्दी अनुवाद : यहाँ (अयोध्या में) कोई भी षडंग (वेद के छः अंग) न जानने वाला, व्रतहीन, सहस्र (बहुत) दान न देने वाला, दीन, व्यग्रचित्त या पीड़ित नहीं था।

🔹 English Translation : Here (in Ayodhya), there was no one ignorant of the six limbs of the Vedas, no one without vows, no one who did not give thousands in charity, no one poor, no one with agitated mind, and no one afflicted with sorrow.

🔍 शब्दार्थ (Word by Word Meaning)

संस्कृतव्याकरणहिन्दी अर्थ
निपातनहीं
षडङ्गवित्विशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन (षडङ्ग + विद्)षडंग जानने वाला
अत्रअव्यययहाँ
अस्तिक्रिया, प्रथमपुरुष एकवचन (अस् धातु)है
निपातनहीं
अव्रतःविशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचनव्रतहीन
निपातनहीं
असहस्रदःविशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचनसहस्र दान न देने वाला
निपातनहीं
दीनःविशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचनदीन, गरीब
क्षिप्तचित्तःविशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचनव्यग्रचित्त, उद्विग्न मन वाला
वाअव्ययया
व्यथितःविशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचनपीड़ित
वाअव्ययया
अपिअव्ययभी
कश्चनसर्वनाम, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचनकोई

📜 श्लोक का ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक महत्व

यह श्लोक अयोध्या के नागरिकों की विद्वत्ता और समृद्धि का वर्णन करता है। "षडङ्गवित्" होना उस काल में उच्च शिक्षा का प्रतीक था। वेदों के छः अंगों का ज्ञान धार्मिक अनुष्ठानों और जीवन के सभी पक्षों के लिए आवश्यक माना जाता था। "अव्रतः" का अभाव बताता है कि सभी धार्मिक व्रतों का पालन करते थे। "असहस्रदः" – हजारों का दान न करने वाला, अर्थात सभी अत्यंत दानी थे। "दीनः" का न होना आर्थिक समानता और समृद्धि का सूचक है। "क्षिप्तचित्तः" और "व्यथितः" का न होना मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को दर्शाता है। इस प्रकार अयोध्या एक सुखी, समृद्ध और शिक्षित नगर था।

✨ विशेष तथ्य: षडंग – शिक्षा (स्वर-उच्चारण), कल्प (श्रौत-सूत्र), व्याकरण, निरुक्त (व्युत्पत्ति), छंद (छंदशास्त्र), ज्योतिष (काल-गणना) – ये वेद के अध्ययन के लिए अनिवार्य थे।

📖 व्याकरणिक एवं साहित्यिक विश्लेषण

यहाँ "षडङ्गवित्" में विद् धातु से क्विप् प्रत्यय, तत्पुरुष समास। "अव्रतः", "असहस्रदः" में नञ् समास। "क्षिप्तचित्तः" बहुव्रीहि समास (क्षिप्तं चित्तं यस्य)। "व्यथितः" क्त प्रत्यय। क्रिया "अस्ति" वर्तमान काल। "कश्चन" = कश्चित् + चन।

🕉️ आध्यात्मिक संदेश

यह श्लोक बताता है कि जिस समाज में लोग वैदिक ज्ञान से युक्त, व्रतपरायण, दानी, और मानसिक रूप से शांत होते हैं, वहाँ दुःख और गरीबी का नाम नहीं होता।

📚 पाठ की विधि एवं लाभ

इस श्लोक का पाठ व्यक्ति को विद्यार्जन, व्रत, दान और मानसिक शांति के लिए प्रेरित करता है।

॥ जय श्री राम ॥