अयोध्या के राजा और लोग – श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
नास्तिको नानृती वापि न कश्चिदबहुश्रुतः । नासूयको न चाशक्तो नाविद्वान् विद्यते क्वचित् ॥
हिंदी अनुवाद
अयोध्या में कहीं भी कोई नास्तिक, झूठ बोलने वाला, अल्पश्रुत (कम पढ़ा-लिखा), ईर्ष्यालु, असमर्थ या अज्ञानी नहीं था।
अर्थ / व्याख्या
यह श्लोक अयोध्या के नागरिकों के ज्ञान, सामर्थ्य और सद्गुणों की पराकाष्ठा दर्शाता है।
टिप्पणी
इस श्लोक में अयोध्यावासियों के छः दोषों का अभाव बताया गया है: 1. नास्तिक (आस्तिकता का अभाव), 2. अनृती (झूठ न बोलने वाला), 3. अबहुश्रुत (बहुश्रुत न होना, अर्थात सभी बहुश्रुत थे), 4. असूयक (ईर्ष्या न करने वाला), 5. अशक्त (असमर्थ नहीं, सभी समर्थ), 6. अविद्वान् (विद्वान न होना, अर्थात सभी विद्वान)। यह वर्णन अयोध्या के नागरिकों की उच्चतम शिक्षा, नैतिकता और योग्यता को उजागर करता है।
॥ श्री रामायण बालकाण्ड सर्ग ६ श्लोक १४ ॥
नासूयको न चाशक्तो नाविद्वान् विद्यते क्वचित् ॥
nāsūyako na cāśakto nāvidvān vidyate kvacit ||
🔹 हिन्दी अनुवाद : अयोध्या में कहीं भी कोई नास्तिक, झूठ बोलने वाला, अल्पश्रुत (कम पढ़ा-लिखा), ईर्ष्यालु, असमर्थ या अज्ञानी नहीं था।
🔹 English Translation : In Ayodhya, nowhere was there any atheist, liar, ill-learned, envious, incapable, or ignorant person.
🔍 शब्दार्थ (Word by Word Meaning)
| संस्कृत | व्याकरण | हिन्दी अर्थ |
|---|---|---|
| न | निपात | नहीं |
| आस्तिकः | विशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन | आस्तिक (यहाँ नास्तिकः = आस्तिक नहीं) |
| न | निपात | नहीं |
| अनृती | विशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन | झूठ बोलने वाला |
| वा | अव्यय | या |
| अपि | अव्यय | भी |
| न | निपात | नहीं |
| कश्चित् | सर्वनाम, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन | कोई |
| अबहुश्रुतः | विशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन | अल्पश्रुत, कम सुना हुआ (अज्ञानी) |
| न | निपात | नहीं |
| असूयकः | विशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन | ईर्ष्यालु |
| न | निपात | नहीं |
| च | अव्यय | और |
| अशक्तः | विशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन | असमर्थ |
| न | निपात | नहीं |
| अविद्वान् | विशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन | अज्ञानी |
| विद्यते | क्रिया, प्रथमपुरुष एकवचन (विद् धातु) | विद्यमान है |
| क्वचित् | अव्यय | कहीं |
📜 श्लोक का ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक महत्व
यह श्लोक अयोध्या के नागरिकों के बौद्धिक एवं नैतिक स्तर को दर्शाता है। "नास्तिक" का अर्थ है जो वेदों और परलोक में विश्वास नहीं रखता – अयोध्या में ऐसा कोई नहीं था। "अनृती" झूठा – सभी सत्यवादी। "अबहुश्रुत" – जिसने बहुत न सुना हो, अर्थात अशिक्षित; यहाँ सभी शिक्षित थे। "असूयक" ईर्ष्यालु; सभी निर्द्वन्द्व। "अशक्त" असमर्थ; सभी सक्षम। "अविद्वान्" अज्ञानी; सभी विद्वान। यह वर्णन बताता है कि अयोध्या में शिक्षा, धर्म और सामर्थ्य का अद्भुत समन्वय था।
📖 व्याकरणिक एवं साहित्यिक विश्लेषण
यहाँ सभी विशेषण नञ् समास से बने हैं – नास्तिक (न + आस्तिक), अनृती (न + ऋती), अबहुश्रुत (न + बहुश्रुत), असूयक (न + सूयक), अशक्त (न + शक्त), अविद्वान् (न + विद्वान्)। क्रिया "विद्यते" वर्तमान काल में है। "क्वचित्" सर्वनाम।
🕉️ आध्यात्मिक संदेश
यह श्लोक बताता है कि आदर्श समाज वही है जहाँ प्रत्येक व्यक्ति आस्तिक, सत्यवादी, शिक्षित, ईर्ष्यारहित, समर्थ और विद्वान हो। ऐसे समाज में ही राम जैसे आदर्श पुरुष जन्म लेते हैं।
📚 पाठ की विधि एवं लाभ
इस श्लोक के पाठ से व्यक्ति में इन गुणों को धारण करने की प्रेरणा मिलती है और समाज के प्रति दायित्व का बोध होता है।
॥ जय श्री राम ॥