अयोध्या के राजा और लोग – श्लोक 13

संस्कृत श्लोक

स्वकर्मनिरता नित्यं ब्राह्मणा विजितेन्द्रियाः । दानाध्ययनशीलाश्च संयताश्च प्रतिग्रहे ॥

हिंदी अनुवाद

ब्राह्मण सदा अपने-अपने कर्मों में लगे रहते थे, इंद्रियों पर विजय प्राप्त किए हुए थे, दान और अध्ययन में तत्पर थे, और प्रतिग्रह (दान लेने) में संयम रखते थे।

अर्थ / व्याख्या

यह श्लोक अयोध्या के ब्राह्मणों के आदर्श चरित्र का वर्णन करता है। वे स्वधर्मपरायण, जितेन्द्रिय, दानशील, अध्ययनशील और प्रतिग्रह में संयमी थे।

टिप्पणी

इस श्लोक में ब्राह्मणों के चार प्रमुख गुण बताए गए हैं: 1. स्वकर्मनिरता – अपने वैदिक कर्तव्यों (यजन, याजन, अध्यापन, अध्ययन, दान, प्रतिग्रह) का पालन। 2. विजितेन्द्रियाः – इंद्रियों पर नियंत्रण, जो ब्राह्मण के लिए अनिवार्य है। 3. दानाध्ययनशीलाः – वे दान देना और वेदों का अध्ययन-अध्यापन करना अपना स्वभाव बनाए हुए थे। 4. प्रतिग्रहे संयताः – दान लेते समय वे अत्यंत संयम बरतते थे, अर्थात अनुचित या अधिक दान नहीं लेते थे। यह ब्राह्मणों की उच्च कोटि की सात्विकता को दर्शाता है।

॥ श्री रामायण बालकाण्ड सर्ग ६ श्लोक १३ ॥

स्वकर्मनिरता नित्यं ब्राह्मणा विजितेन्द्रियाः ।
दानाध्ययनशीलाश्च संयताश्च प्रतिग्रहे ॥
svakarmaniratā nityaṃ brāhmaṇā vijitendriyāḥ |
dānādhyayanaśīlāśca saṃyatāśca pratigrahe ||

🔹 हिन्दी अनुवाद : ब्राह्मण सदा अपने-अपने कर्मों में लगे रहते थे, इंद्रियों पर विजय प्राप्त किए हुए थे, दान और अध्ययन में तत्पर थे, और प्रतिग्रह (दान लेने) में संयम रखते थे।

🔹 English Translation : The Brahmins were always engaged in their own duties, had conquered their senses, were devoted to charity and study, and were restrained in accepting gifts.

🔍 शब्दार्थ (Word by Word Meaning)

संस्कृतव्याकरणहिन्दी अर्थ
स्वकर्मनिरताःविशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा बहुवचनअपने-अपने कर्मों में लगे हुए
नित्यम्अव्ययसदा
ब्राह्मणाःसंज्ञा, पुल्लिंग, प्रथमा बहुवचनब्राह्मण
विजितेन्द्रियाःविशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा बहुवचनजितेन्द्रिय, इंद्रियों पर विजय पाने वाले
दानाध्ययनशीलाःविशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा बहुवचन (दान + अध्ययन + शील)दान और अध्ययन में तत्पर
अव्ययऔर
संयताःविशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा बहुवचनसंयमी
अव्ययऔर
प्रतिग्रहेसंज्ञा, पुल्लिंग, सप्तमी एकवचनदान ग्रहण करने में

📜 श्लोक का ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक महत्व

यह श्लोक अयोध्या के ब्राह्मणों के आदर्श जीवन का चित्रण है। वैदिक काल में ब्राह्मणों के छह कर्म बताए गए हैं – यजन, याजन, अध्यापन, अध्ययन, दान, प्रतिग्रह। यहाँ "स्वकर्मनिरताः" से तात्पर्य इन्हीं कर्तव्यों के पालन से है। "विजितेन्द्रियाः" ब्राह्मण के लिए आवश्यक है क्योंकि इंद्रिय दमन के बिना वेदाध्ययन संभव नहीं। "दानाध्ययनशीलाः" में दो कर्मों का विशेष उल्लेख है – देना और पढ़ना। "प्रतिग्रहे संयताः" अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि प्रतिग्रह (दान लेना) ब्राह्मण के लिए कठिन व्रत है – उसे अधिक या अयोग्य से ग्रहण नहीं करना चाहिए। इस प्रकार अयोध्या के ब्राह्मण सभी मानदंडों पर खरे उतरते थे।

✨ विशेष तथ्य: मनुस्मृति में ब्राह्मणों के लिए प्रतिग्रह में संयम का विधान है। अयोध्या के ब्राह्मण इसका पालन करते थे, जो उनकी उच्च नैतिकता को दर्शाता है।

📖 व्याकरणिक एवं साहित्यिक विश्लेषण

यहाँ बहुव्रीहि समास है – विजितेन्द्रियाः (विजितानि इन्द्रियाणि यैः), दानाध्ययनशीलाः (दाने अध्ययने च शीलं येषाम्), संयताः (संयम युक्ताः)। "प्रतिग्रहे" सप्तमी का प्रयोग अधिकरण कारक में है। श्लोक सरल अनुष्टुप् में है।

🕉️ आध्यात्मिक संदेश

यह श्लोक बताता है कि ज्ञान-परंपरा के धारक ब्राह्मणों को केवल पढ़ना-पढ़ाना ही नहीं, बल्कि दान और संयम में भी आदर्श होना चाहिए। अयोध्या के ब्राह्मण इन सबमें सिद्ध थे।

📚 पाठ की विधि एवं लाभ

इस श्लोक का पाठ ब्राह्मणों एवं अन्य वर्णों को अपने कर्तव्यपालन और इंद्रिय-निग्रह की प्रेरणा देता है।

॥ जय श्री राम ॥