अयोध्या के राजा और लोग – श्लोक 20

संस्कृत श्लोक

सा तेनेक्ष्वाकुनाथेन पुरी सुपरिरक्षिता । यथा पुरस्तान्मनुना मानवेन्द्रेण धीमता ॥

हिंदी अनुवाद

उस नगरी (अयोध्या) की रक्षा इक्ष्वाकुवंशी राजा (दशरथ) ने उसी प्रकार की थी, जैसे पूर्वकाल में धीमान् मनु (प्रजापति) ने की थी।

अर्थ / व्याख्या

यह श्लोक राजा दशरथ की प्रशंसा करता है कि उन्होंने अयोध्या की वैसे ही रक्षा की जैसे मनु ने की थी।

टिप्पणी

इस श्लोक में अयोध्या के राजा दशरथ की तुलना प्रथम राजा मनु से की गई है। "इक्ष्वाकुनाथेन" – इक्ष्वाकुवंश के स्वामी दशरथ। "सुपरिरक्षिता" – अच्छी तरह से रक्षित। "यथा पुरस्तान्मनुना" – जैसे पूर्वकाल में मनु ने। मनु को मानवेन्द्र (मनुष्यों के इंद्र) और धीमान् (बुद्धिमान) कहा गया है। इस प्रकार दशरथ ने अयोध्या की उत्कृष्ट रक्षा की, जिससे वह पूर्ववत् समृद्ध और सुरक्षित रही। यह श्लोक अयोध्या के वर्णन का समापन करता है।

॥ श्री रामायण बालकाण्ड सर्ग ६ श्लोक २० ॥

सा तेनेक्ष्वाकुनाथेन पुरी सुपरिरक्षिता ।
यथा पुरस्तान्मनुना मानवेन्द्रेण धीमता ॥
sā tenekṣvākunāthena purī suparirakṣitā |
yathā purastān manunā mānavendreṇa dhīmatā ||

🔹 हिन्दी अनुवाद : उस नगरी (अयोध्या) की रक्षा इक्ष्वाकुवंशी राजा (दशरथ) ने उसी प्रकार की थी, जैसे पूर्वकाल में धीमान् मनु (प्रजापति) ने की थी।

🔹 English Translation : That city was well protected by that lord of the Ikshvaku dynasty (Dasharatha), just as it was protected in ancient times by the wise Manu, the lord of men.

🔍 शब्दार्थ (Word by Word Meaning)

संस्कृतव्याकरणहिन्दी अर्थ
सासर्वनाम, स्त्रीलिंग, प्रथमा एकवचनवह
तेनसर्वनाम, पुल्लिंग, तृतीया एकवचनउसके द्वारा
इक्ष्वाकुनाथेनसंज्ञा, पुल्लिंग, तृतीया एकवचन (इक्ष्वाकु + नाथ)इक्ष्वाकुवंश के स्वामी (दशरथ) द्वारा
पुरीसंज्ञा, स्त्रीलिंग, प्रथमा एकवचननगरी
सुपरिरक्षिताविशेषण, स्त्रीलिंग, प्रथमा एकवचनसुंदर रूप से रक्षित
यथाअव्ययजैसे
पुरस्तात्अव्ययपहले, प्राचीन काल में
मनुनासंज्ञा, पुल्लिंग, तृतीया एकवचनमनु द्वारा
मानवेन्द्रेणसंज्ञा, पुल्लिंग, तृतीया एकवचन (मानव + इन्द्र)मनुष्यों के इंद्र (राजा) द्वारा
धीमताविशेषण, पुल्लिंग, तृतीया एकवचन (धी + मतुप्)बुद्धिमान द्वारा

📜 श्लोक का ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक महत्व

यह श्लोक अयोध्या के राजा दशरथ की प्रशंसा में है। इक्ष्वाकुवंश सूर्यवंश के नाम से विख्यात है, जिसके प्रथम राजा मनु थे। मनु को मानवेन्द्र (मनुष्यों के राजा) और धीमान् (बुद्धिमान) कहा गया है। दशरथ ने उसी परंपरा का निर्वाह करते हुए अयोध्या की सुरक्षा की। "सुपरिरक्षिता" का अर्थ है सभी प्रकार से रक्षित – आंतरिक एवं बाह्य शत्रुओं से, तथा प्रजा के कल्याण के लिए। यह श्लोक बताता है कि राजा के कर्तव्यों का पालन और प्रजापालन ही सच्ची रक्षा है।

✨ विशेष तथ्य: मनु को वैवस्वत मनु कहा जाता है, जो वर्तमान कल्प के सप्तम मनु हैं। वे इक्ष्वाकु के पिता थे। अतः दशरथ उनकी परंपरा में थे।

📖 व्याकरणिक एवं साहित्यिक विश्लेषण

यहाँ "तेनेक्ष्वाकुनाथेन" में सन्धि है (तेन + इक्ष्वाकुनाथेन)। "सुपरिरक्षिता" में सु + परि + रक्षित। "यथा...तथा" का भाव है, किन्तु यहाँ "यथा" के साथ तृतीया विभक्ति का प्रयोग हुआ है (मनुना)। "मानवेन्द्रेण" में मानव + इन्द्र, तत्पुरुष समास।

🕉️ आध्यात्मिक संदेश

यह श्लोक राजा के कर्तव्य का बोध कराता है – प्रजा की रक्षा करना। राजा को अपने पूर्वजों के आदर्शों का पालन करना चाहिए। दशरथ ने मनु के समान ही अयोध्या की रक्षा की, जो एक आदर्श राजा का लक्षण है।

📚 पाठ की विधि एवं लाभ

इस श्लोक के पाठ से राजा (शासक) को प्रजापालन और कर्तव्यनिष्ठा की प्रेरणा मिलती है। प्रजाजनों को अपने राजा के प्रति गौरव का अनुभव होता है।

॥ जय श्री राम ॥