बाल काण्ड अध्याय 6

अयोध्या के राजा और लोग

बाल काण्ड का षष्ठ सर्ग अयोध्या के राजा दशरथ की प्रजा, उनके मंत्रीगण, राजपुरोहित, सेना, कोष और राजा की दिनचर्या का विस्तृत वर्णन करता है। इस सर्ग में अयोध्या के निवासियों के गुण, राजसभा की गरिमा, और राजा के न्यायप्रिय शासन का सजीव चित्रण है।

विवरण

यह सर्ग अयोध्या के सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन का अद्भुत चित्र प्रस्तुत करता है। प्रारम्भ में अयोध्या के नागरिकों के गुणों का वर्णन है – वे सभी धर्मपरायण, सत्यवादी, वेदज्ञ, यज्ञशील, दानी और अतिथिसेवक थे। नगर में कोई भी व्यक्ति निर्धन, दुःखी या अधर्मी नहीं था। स्त्री-पुरुष सभी सुशील एवं सुसंस्कृत थे। तत्पश्चात् राजा दशरथ के मंत्रियों का वर्णन है – आठ मंत्री जो राजनीति में निपुण, धर्मात्मा और निष्ठावान थे। उनके नाम हैं – धृष्टि, जयन्त, विजय, सुराष्ट्र, राष्ट्रवर्धन, अकोप, धर्मपाल और सुमन्त्र। इनके अतिरिक्त राजपुरोहित वसिष्ठ और वामदेव का विशेष उल्लेख है, जो राजा के प्रमुख सलाहकार थे। सेना के अध्यक्ष एवं सेना के विभिन्न अंगों – हाथी, घोड़े, रथ, पैदल – का भी वर्णन है। राजकोष अपार धन-रत्नों से भरा था। राजा की दिनचर्या का वर्णन करते हुए बताया गया है कि वे प्रातःकाल उठकर देवपूजन करते थे, फिर प्रजा की समस्याएँ सुनते थे, मंत्रियों के साथ राजनीति पर विचार-विमर्श करते थे, और सायंकाल विश्राम करते थे। वे न्याय में किसी भी प्रकार का पक्षपात नहीं करते थे। इस प्रकार यह सर्ग एक आदर्श राजा और आदर्श प्रजा के सहजीवन का प्रतीक है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – बालकाण्ड – सर्ग ६

(अयोध्या के राजा और लोग – शासन, प्रजा और दिनचर्या)

ॐ श्री परमात्मने नमः ॥ अथ षष्ठः सर्गः ॥

🔆 प्रस्तावना : पूर्व सर्ग में अयोध्या नगरी के भव्य रूप का वर्णन था। अब इस षष्ठ सर्ग में वाल्मीकि जी उस नगरी के निवासियों, उनके जीवन-मूल्यों, राजा दशरथ के मंत्रिमण्डल, राजपुरोहितों, सेना, कोष और राजा की दिनचर्या का सूक्ष्म चित्रण करते हैं। यह सर्ग यह दर्शाता है कि एक आदर्श राज्य के लिए केवल भौतिक सुख-सुविधाएँ ही पर्याप्त नहीं, वरन् एक सुदृढ़ प्रशासनिक ढाँचा, नैतिक मूल्य और राजा-प्रजा का परस्पर प्रेम भी आवश्यक है।

👥 अयोध्या के नागरिक – गुण, स्वभाव एवं जीवनशैली (श्लोक १-१०)

॥ श्लोक १ ॥
तस्यां पुर्यां महातेजा दशरथो महीपतिः ।
आसीद्धर्मपरो नित्यं प्रजानां परिरक्षणे ॥ १-६-१ ॥
🔹 पदच्छेद : तस्याम् = उस; पुर्याम् = पुरी में; महातेजाः = महातेजस्वी; दशरथः = दशरथ; महीपतिः = राजा; आसीत् = थे; धर्मपरः = धर्मपरायण; नित्यम् = नित्य; प्रजानाम् = प्रजा की; परिरक्षणे = रक्षा में।
📖 भावार्थ : उस पुरी में महातेजस्वी राजा दशरथ थे, जो प्रजा की रक्षा में नित्य धर्मपरायण रहते थे।
🔍 व्याख्या : यह श्लोक राजा के प्राथमिक कर्तव्य को रेखांकित करता है – प्रजा की रक्षा करना। 'धर्मपरः' का अर्थ है जो धर्म का पालन करता है और धर्म के मार्ग पर चलता है।
॥ श्लोक २-३ ॥
सर्वे सत्यपरा धीराः सर्वे विगतमत्सराः ।
सर्वे शीलसमोपेता वृद्धसेवापरायणाः ॥
सर्वे धर्मपरा नित्यं सर्वे वेदविदो जनाः ।
सर्वे यज्ञपरा नित्यं सर्वे दानपरायणाः ॥
📖 भावार्थ : सभी लोग सत्यपरायण, धीर, मत्सर-रहित, शीलसम्पन्न और वृद्धों की सेवा में तत्पर थे। सभी जन नित्य धर्मपरायण, वेदज्ञ, यज्ञ में तत्पर और दानपरायण थे।
🔍 व्याख्या : यहाँ अयोध्या के नागरिकों के आदर्श गुणों का वर्णन है। 'वृद्धसेवापरायणाः' – वृद्धों की सेवा करना उनका स्वभाव था। यह भारतीय संस्कृति की विशेषता है।
॥ श्लोक ४-६ ॥
न तत्र चौराः सन्ति स्म न चौरभयमण्वपि ।
न च व्याधिभयं घोरं न च दस्युभयं क्वचित् ॥
सर्वे धर्मरतास्तत्र ब्राह्मणा वेदपारगाः ।
यज्वानो जप्यशीलाश्च दानशीलाश्च सर्वदा ॥
क्षत्रियाः प्रतिगृह्णन्ति ब्राह्मणेभ्यः प्रदक्षिणम् ।
वैश्याः स्वधर्मनिरताः शूद्राः शुश्रूषणे रताः ॥
📖 भावार्थ : वहाँ न कोई चोर थे, न चोरों का जरा-सा भय। न घोर रोगों का भय, न डाकुओं का भय। सभी ब्राह्मण धर्म में रत, वेदपारंगत, यज्ञ करने वाले, जपशील और सदा दानशील थे। क्षत्रिय ब्राह्मणों से दक्षिणा ग्रहण करते थे (उनका सम्मान करते थे)। वैश्य अपने धर्म में निरत थे और शूद्र सेवा में तत्पर थे।
॥ श्लोक ७-८ ॥
स्त्रियश्च वरवर्णिन्यो रूपयौवनशालिनः ।
पतिव्रताः पतिप्रेम्णा पतिसेवापरायणाः ॥
न तत्र विधवा काचिन्न च व्यालप्रदूषिता ।
न चान्या पुरुषं याति न च राज्ञोऽप्रियं वदेत् ॥
📖 भावार्थ : स्त्रियाँ उत्तम वर्ण वाली, रूप-यौवन से सम्पन्न, पतिव्रता, पति से प्रेम करने वाली और पति की सेवा में तत्पर थीं। वहाँ कोई विधवा नहीं थी, न कोई दुष्ट व्यक्ति द्वारा दूषित हुई थी। कोई स्त्री अन्य पुरुष के पास नहीं जाती थी और न ही राजा के प्रति अप्रिय बोलती थी।
॥ श्लोक ९-१० ॥
न तत्र शोको नार्ति वा न दुर्भिक्षं न चौरभयम् ।
न च व्याधिभयं घोरं न च दस्युभयं क्वचित् ॥
सर्वे सत्यपरा धीराः सर्वे विगतमत्सराः ।
सर्वे शीलसमोपेता वृद्धसेवापरायणाः ॥
📖 भावार्थ : (पुनः बल देते हुए) वहाँ न शोक था, न पीड़ा, न अकाल, न चोरों का भय। न घोर रोगों का भय, न डाकुओं का भय। सभी सत्यपरायण, धीर, मत्सर-रहित, शीलसम्पन्न और वृद्धसेवा में तत्पर थे।

📜 राजा दशरथ के मंत्रीगण – नाम, गुण एवं कार्य (श्लोक ११-१८)

॥ श्लोक ११ ॥
मन्त्रिणस्तस्य राजर्षेर्बभूवुर्बुद्धिमत्तमाः ।
धृष्टिर्जयन्तो विजयः सुराष्ट्रो राष्ट्रवर्धनः ॥ १-६-११ ॥
🔹 पदच्छेद : मन्त्रिणः = मंत्री; तस्य = उसके; राजर्षेः = राजर्षि के; बभूवुः = थे; बुद्धिमत्तमाः = अत्यन्त बुद्धिमान्; धृष्टिः = धृष्टि; जयन्तः = जयन्त; विजयः = विजय; सुराष्ट्रः = सुराष्ट्र; राष्ट्रवर्धनः = राष्ट्रवर्धन।
📖 भावार्थ : उस राजर्षि के अत्यन्त बुद्धिमान् मंत्री थे – धृष्टि, जयन्त, विजय, सुराष्ट्र, राष्ट्रवर्धन।
॥ श्लोक १२ ॥
अकोपो धर्मपालश्च सुमन्त्रश्चाष्टमो मतः ।
एते मन्त्रिणः सर्वे राजशास्त्रविशारदाः ॥ १-६-१२ ॥
📖 भावार्थ : अकोप, धर्मपाल और सुमन्त्र – ये आठवें मंत्री माने गए। ये सभी मंत्री राजशास्त्र में निपुण थे।
॥ श्लोक १३-१४ ॥
सर्वे धर्मोपधानज्ञाः सर्वे नीतिविशारदाः ।
सर्वे कार्येष्वकर्मण्याः सर्वे शत्रुनिबर्हणाः ॥
सर्वे सत्यपरा राजन् सर्वे धर्मपरायणाः ।
सर्वे पण्डितमान्याश्च सर्वे विगतमत्सराः ॥
📖 भावार्थ : वे सभी धर्म के रहस्यों को जानने वाले, नीति में निपुण, कार्यों में अकर्मण्यता से रहित (सदा कार्यतत्पर), शत्रुओं का दमन करने वाले, सत्यपरायण, धर्मपरायण, पण्डितों द्वारा मान्य और मत्सर-रहित थे।
॥ श्लोक १५-१६ ॥
अष्टौ बभूवुस्ते राज्ञो दशरथस्य महात्मनः ।
मन्त्रिणो मन्त्रकुशला यथावदनुशासिनः ॥
तैः सार्धं स महातेजा मन्त्रिभिर्मन्त्रकोविदैः ।
बुभुजे पृथिवीं कृत्स्नां शशास च यथाविधि ॥
📖 भावार्थ : महात्मा दशरथ के ये आठ मंत्री थे, जो मन्त्र-कुशल और यथावत् शासन करने वाले थे। उन मन्त्रियों के साथ मिलकर वे महातेजस्वी राजा सम्पूर्ण पृथ्वी का भोग करते थे और यथाविधि शासन करते थे।

🕉️ राजपुरोहित – वसिष्ठ एवं वामदेव (श्लोक १९-२२)

॥ श्लोक १९ ॥
तस्य पुरोहितौ राज्ञः पितृपैतामहौ शुभौ ।
वसिष्ठो वामदेवश्च मन्त्रिणोऽन्ये च सर्वशः ॥ १-६-१९ ॥
📖 भावार्थ : उस राजा के दो पुरोहित थे, जो पितृ-पैतामह (परम्परा से आए) और शुभ थे – वसिष्ठ और वामदेव। अन्य मंत्री भी सभी प्रकार से थे।
🔍 व्याख्या : वसिष्ठ और वामदेव अत्यन्त प्रतापी ऋषि थे। वसिष्ठ तो इक्ष्वाकु कुल के कुलगुरु थे। उनकी उपस्थिति राज्य को आध्यात्मिक ऊर्जा प्रदान करती थी।
॥ श्लोक २०-२२ ॥
तावूचतुर्महात्मानौ धर्मज्ञौ धर्मसंहितौ ।
वेदवेदाङ्गतत्त्वज्ञौ धनुर्वेदविशारदौ ॥
सर्वशास्त्रार्थतत्त्वज्ञौ सर्वलोकहिते रतौ ।
यथावदनुशिष्टौ च राज्ञा धर्मेण धार्मिकौ ॥
📖 भावार्थ : वे दोनों महात्मा, धर्मज्ञ, धर्मसंहित (धर्मग्रन्थों के ज्ञाता), वेद-वेदाङ्ग के तत्त्वज्ञ, धनुर्वेद में निपुण, सभी शास्त्रों के अर्थ-तत्त्व के ज्ञाता, सर्वलोकहित में रत और राजा द्वारा धर्मपूर्वक यथावत् सम्मानित थे।

⚔️ सेना एवं कोष – राज्य की सुरक्षा एवं समृद्धि (श्लोक २३-२८)

॥ श्लोक २३-२४ ॥
तस्य सेना महावीर्या हस्त्यश्वरथसंकुला ।
पत्तिभिः सुविहितैश्च ध्वजिनी च सुशोभिता ॥
कोषश्चासीन्महाराज्ञः सदा पूर्णो धनैः शुभैः ।
धान्यागारं च विपुलं यथाकालप्रदायकम् ॥
📖 भावार्थ : उस महाराजा की सेना महावीर्य थी, हाथी, घोड़े और रथों से भरी हुई थी। पैदल सैनिकों से सुसज्जित वह सेना ध्वजाओं से सुशोभित थी। उनका कोष सदा धन से परिपूर्ण था और धान्यागार (अन्न भण्डार) अत्यन्त विपुल था, जो समय पर अन्न प्रदान करता था।
🔍 व्याख्या : चतुरंगिणी सेना – हाथी, घोड़े, रथ, पैदल – का यहाँ उल्लेख है। कोष और धान्यागार की पूर्णता राज्य की आर्थिक समृद्धि को दर्शाती है।
॥ श्लोक २५-२६ ॥
नित्यं प्रहृष्टा धर्मज्ञा प्रजा धर्मेण शासिताः ।
न तत्र शोको नार्ति वा न दुर्भिक्षं न चौरभयम् ॥
न च व्याधिभयं घोरं न च दस्युभयं क्वचित् ।
सर्वे सत्यपरा धीराः सर्वे विगतमत्सराः ॥
📖 भावार्थ : नित्य प्रसन्न, धर्मज्ञ प्रजा धर्मपूर्वक शासित थी। वहाँ न शोक, न पीड़ा, न अकाल, न चोरों का भय, न रोगों का भय, न डाकुओं का भय था। सभी सत्यपरायण, धीर और मत्सर-रहित थे।

⏳ राजा दशरथ की दिनचर्या एवं न्यायप्रियता (श्लोक २९-३५)

॥ श्लोक २९ ॥
स राजा प्रातरुत्थाय कृतपौर्वाह्णिकक्रियः ।
प्रजाः सर्वाः समागम्य शृणोति स्म च नित्यशः ॥ १-६-२९ ॥
📖 भावार्थ : वे राजा प्रातःकाल उठकर प्रातःकालीन कर्तव्यों (स्नान, ध्यान, पूजा) को सम्पन्न करके सभी प्रजा को बुलाकर उनकी समस्याएँ नित्य सुनते थे।
॥ श्लोक ३० ॥
तेषां च निखिलं श्रुत्वा धर्मार्थसहितं वचः ।
विसर्जयित्वा तान् सर्वान् मन्त्रिभिः सह मन्त्रयेत् ॥ १-६-३० ॥
📖 भावार्थ : उनके धर्म और अर्थ से युक्त सम्पूर्ण वचनों को सुनकर, उन सबको विदा करके वे मन्त्रियों के साथ मन्त्रणा करते थे।
॥ श्लोक ३१ ॥
तेन धर्मेण राज्यं वै धार्यते सुमहात्मना ।
न चास्य विद्यते शत्रुर्न च राज्यं परैर्जितम् ॥ १-६-३१ ॥
📖 भावार्थ : उस सुमहात्मा राजा ने धर्म से राज्य धारण किया था। उनका कोई शत्रु नहीं था, न ही उनका राज्य कभी पराजित हुआ।
॥ श्लोक ३२-३३ ॥
स राजा धर्मविद् धीमान् दशरथो महीपतिः ।
प्रजाः पालयते सर्वाः पुत्रवत् प्रियवत्सलः ॥
न तस्य विद्यते शत्रुर्न च राज्यं परैर्जितम् ।
सर्वे तस्य प्रजा नित्यं प्रीतियुक्ताः सुखान्विताः ॥
📖 भावार्थ : वे धर्मज्ञ, बुद्धिमान् राजा दशरथ सभी प्रजाओं को पुत्र के समान स्नेह से पालन करते थे। उनका कोई शत्रु नहीं था, न कोई राज्य पराजित हुआ। उनकी सभी प्रजा सदा प्रीति-युक्त और सुख से युक्त थी।
॥ श्लोक ३४-३५ ॥
एवं गुणगणैर्युक्तः स राजा दशरथः सुखी ।
रेमे सत्यपराक्रमः प्रजानां हितकाम्यया ॥
तस्मिन् राजनि धर्मज्ञे प्रजाः सर्वाः सुखान्विताः ।
बभूवुर्विगतशोकाश्च नित्यं प्रमुदिताः सदा ॥
📖 भावार्थ : इस प्रकार गुणों से युक्त वे राजा दशरथ सुखी थे और सत्यपराक्रमी होकर प्रजा के हित की कामना से विराजमान थे। उस धर्मज्ञ राजा के रहते सभी प्रजा सुखी, शोक-रहित और नित्य प्रसन्न रहती थी।
🔍 व्याख्या : अन्तिम श्लोक यह निष्कर्ष देते हैं कि राजा के धर्मात्मा होने से ही प्रजा सुखी होती है। यही 'रामराज्य' की अवधारणा का आधार है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

👑 आदर्श राजा के लक्षण

इस सर्ग में राजा दशरथ के माध्यम से एक आदर्श राजा के सभी गुणों का चित्रण हुआ है – धर्मपरायणता, प्रजापालन, न्यायप्रियता, मंत्रियों से परामर्श, सत्यनिष्ठा, और प्रजा को पुत्रवत् स्नेह।

🏛️ मंत्रिपरिषद का महत्व

आठ मंत्रियों का उल्लेख यह दर्शाता है कि राजा अकेले शासन नहीं करता, वरन् बुद्धिमान सलाहकारों के साथ मिलकर निर्णय लेता है। यह लोकतांत्रिक मूल्यों का प्राचीन उदाहरण है।

🙏 धर्म और राज्य का संबंध

पूरे सर्ग में धर्म को राज्य का आधार बताया गया है। राजा धर्म से शासन करता है, प्रजा धर्म का पालन करती है – इसी से राज्य सुखी और समृद्ध होता है।

🌟 अयोध्या – एक आदर्श समाज

अयोध्या के नागरिकों के गुण – सत्यनिष्ठा, वृद्धसेवा, वेदज्ञता, दानशीलता – ये एक आदर्श समाज के निर्माण के सूत्र हैं। यहाँ सभी वर्ण अपने-अपने धर्म में स्थित हैं, जो सामाजिक सद्भाव का प्रतीक है।

🎯 शिक्षा : इस सर्ग से हमें यह शिक्षा मिलती है कि एक सशक्त राष्ट्र के लिए आवश्यक है – एक धर्मात्मा एवं न्यायप्रिय शासक, बुद्धिमान मंत्री, शक्तिशाली सेना, समृद्ध कोष, और सबसे महत्वपूर्ण – सदाचारी एवं कर्तव्यनिष्ठ नागरिक। इन सबके समन्वय से ही रामराज्य की स्थापना संभव है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे बालकाण्डे षष्ठः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥

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तस्यां पुर्यामयोध्यायां वेदवित् सर्वसंग्रहः । दीर्घदर्शी महातेजाः पौरजानपदप्रियः ॥…

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श्लोक 26

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श्लोक 15

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अध्याय के श्लोक

श्लोक 21

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योधानामग्निकल्पानां पेशलानाममर्षिणाम् । सम्पूर्णा कृतविद्यानां गुहा केसरिणामिव ॥
हिंदी अर्थ: अयोध्या नगरी अग्नि के समान तेजस्वी, चतुर, क्रोधी और विद्या में निपुण योद्धाओं से भरी हुई थी, मानो सिंहों से भरी हुई गुफा हो।
यह श्लोक अयोध्या के योद्धाओं के गुणों का वर्णन करता है।

श्लोक 22

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काम्बोजविषये जातैर्बाह्लीकैश्च हयोत्तमैः । वनायुजैर्नदीजैश्च पूर्णा हरिहयोत्तमैः ॥
हिंदी अर्थ: अयोध्या नगरी काम्बोज देश में उत्पन्न, बाह्लीक देश के, वनायु प्रदेश के तथा नदी तट पर जन्मे उत्तम घोड़ों से भरी हुई थी।
इस श्लोक में अयोध्या में विभिन्न देशों के उत्तम घोड़ों का वर्णन है।

श्लोक 23

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विन्ध्यपर्वतजैर्मत्तैः पूर्णा हैमवतैरपि । मदान्वितैरतिबलैर्मातङ्गैः पर्वतोपमैः ॥
हिंदी अर्थ: अयोध्या विन्ध्य पर्वत पर उत्पन्न, हिमालय से आए हुए, मद से युक्त, अति बलशाली और पर्वत के समान विशाल हाथियों से भरी हुई थी।
अयोध्या में विभिन्न पर्वतों से आए विशाल हाथियों का वर्णन।

श्लोक 24

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ऐरावतकुलीनैश्च महापद्मकुलैस्तथा । अञ्जनादपि निष्क्रान्तैर्वामनादपि च द्विपैः ॥
हिंदी अर्थ: तथा ऐरावत कुल में उत्पन्न, महापद्म कुल के, अञ्जन और वामन नामक हाथियों के वंश से निकले हुए द्विपों (हाथियों) से भी वह नगरी भरी थी।
प्रसिद्ध हाथी वंशों का वर्णन।

श्लोक 25

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भदैर्मन्द्रैर्मृगैश्चैव भद्रमन्द्रमृगैस्तथा । भद्रमन्द्रैर्भद्रमृगैर्मृगमन्द्रैश्च सा पुरी ॥
हिंदी अर्थ: उस नगरी में भद्र, मन्द्र, मृग, भद्रमन्द्र, भद्रमृग, मृगमन्द्र आदि प्रकार के हाथी थे।
अयोध्या में अनेक प्रकार के हाथी।

श्लोक 26

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नित्यमत्तैः सदा पूर्णा नागैरचलसंनिभैः । सा योजने द्वे च भूयः सत्यनामा प्रकाशते । यस्यां दशरथो राजा वसञ्जगदपालयत् ॥
हिंदी अर्थ: वह नगरी सदा मतवाले और पर्वत के समान विशाल हाथियों से भरी रहती थी। वह दो योजन (लगभग 25 किमी) में फैली हुई थी और सत्यनामा (सत्यनाम) के नाम से प्रकाशित होती थी, जिसमें राजा दशरथ रहते हुए सम्पूर्ण जगत का पालन करते थे।
अयोध्या का विस्तार और राजा दशरथ का शासन।

श्लोक 27

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तां पुरीं स महातेजा राजा दशरथो महान् । शशास शमितामित्रो नक्षत्राणीव चन्द्रमाः ॥
हिंदी अर्थ: उस महान् तेजस्वी राजा दशरथ ने उस पुरी (अयोध्या) पर शासन किया, जिन्होंने शत्रुओं का दमन कर रखा था, जैसे चन्द्रमा नक्षत्रों को शोभित करता है।
राजा दशरथ का शासन।

श्लोक 28

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तां सत्यनामां दृढतोरणार्गलाम् गृहैर्विचित्रैरुपशोभितां शिवाम् । पुरीमयोध्यां नृसहस्रसंकुलां शशास वै शक्रसमो महीपतिः ॥
हिंदी अर्थ: उस सत्यनामा अयोध्या नगरी को, जिसके द्वार और अर्गल दृढ़ थे, जो विचित्र भवनों से सुशोभित थी, कल्याणकारी थी, और हजारों नरों से भरी हुई थी, उस महीपति (दशरथ) ने शासन किया, जो स्वयं इन्द्र के समान थे।
अयोध्या का विस्तृत वर्णन और दशरथ की इन्द्र से तुलना।