अयोध्या के राजा और लोग – श्लोक 28

संस्कृत श्लोक

तां सत्यनामां दृढतोरणार्गलाम् गृहैर्विचित्रैरुपशोभितां शिवाम् । पुरीमयोध्यां नृसहस्रसंकुलां शशास वै शक्रसमो महीपतिः ॥

हिंदी अनुवाद

उस सत्यनामा अयोध्या नगरी को, जिसके द्वार और अर्गल दृढ़ थे, जो विचित्र भवनों से सुशोभित थी, कल्याणकारी थी, और हजारों नरों से भरी हुई थी, उस महीपति (दशरथ) ने शासन किया, जो स्वयं इन्द्र के समान थे।

अर्थ / व्याख्या

अयोध्या का विस्तृत वर्णन और दशरथ की इन्द्र से तुलना।

टिप्पणी

यह श्लोक अयोध्या के स्वरूप का सार प्रस्तुत करता है। यह दृढ़ किलेबंद, सुन्दर भवनों से युक्त, कल्याणकारी और जनाकीर्ण थी। दशरथ ने इस पर इन्द्र के समान शासन किया।

॥ श्री रामायण बालकाण्ड सर्ग ६ श्लोक २८ ॥

तां सत्यनामां दृढतोरणार्गलाम् गृहैर्विचित्रैरुपशोभितां शिवाम् । पुरीमयोध्यां नृसहस्रसंकुलां शशास वै शक्रसमो महीपतिः ॥
tāṃ satyanāmāṃ dṛḍhatoraṇārgalām gṛhairvicitrairupaśobhitāṃ śivām | purīmayodhyāṃ nṛsahasrasaṃkulāṃ śaśāsai śakrasamo mahīpatiḥ ||

🔹 हिन्दी अनुवाद : उस सत्यनामा अयोध्या नगरी को, जिसके द्वार और अर्गल दृढ़ थे, जो विचित्र भवनों से सुशोभित थी, कल्याणकारी थी, और हजारों नरों से भरी हुई थी, उस महीपति (दशरथ) ने शासन किया, जो स्वयं इन्द्र के समान थे।

🔹 English Translation : That king, equal to Indra, ruled that city named Satyanāmā (Ayodhya), which had strong gates and bars, was adorned with various houses, was auspicious, and crowded with thousands of men.

🔍 शब्दार्थ

संस्कृतव्याकरणहिन्दी अर्थ
ताम्सर्वनाम, स्त्रीलिंग, द्वितीया एकवचनउस
सत्यनामाम्विशेषण, स्त्रीलिंग, द्वितीया एकवचनसत्यनामा को
दृढतोरणार्गलाम्विशेषण, स्त्रीलिंग, द्वितीया एकवचनदृढ़ तोरण और अर्गल वाली
गृहैःपुल्लिंग, तृतीया बहुवचनभवनों से
विचित्रैःविशेषण, पुल्लिंग, तृतीया बहुवचनविचित्र
उपशोभिताम्विशेषण, स्त्रीलिंग, द्वितीया एकवचनसुशोभित
शिवाम्विशेषण, स्त्रीलिंग, द्वितीया एकवचनकल्याणकारी
पुरीम्स्त्रीलिंग, द्वितीया एकवचननगरी को
अयोध्याम्स्त्रीलिंग, द्वितीया एकवचनअयोध्या
नृसहस्रसंकुलाम्विशेषण, स्त्रीलिंग, द्वितीया एकवचनहजारों मनुष्यों से भरी
शशासलिट्लकार, प्रथमपुरुष एकवचनशासन किया
वैअव्ययनिश्चय ही
शक्रसमःविशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचनइन्द्र के समान
महीपतिःपुल्लिंग, प्रथमा एकवचनराजा

📜 विश्लेषण

यह श्लोक अयोध्या के वर्णन का समापन करता है। यहाँ अयोध्या के चार प्रमुख गुण बताए गए हैं: १. दृढ़ किलेबंदी (तोरण और अर्गल), २. सुन्दर भवन, ३. कल्याणकारी वातावरण, ४. जनसंख्या से परिपूर्ण। राजा दशरथ की तुलना इन्द्र से की गई है, जो उनकी दिव्यता और शक्ति को दर्शाता है। यह श्लोक अयोध्या को एक आदर्श नगरी के रूप में प्रस्तुत करता है।