राम की कहानी – श्लोक 7
संस्कृत श्लोक
तत् सर्वं तत्त्वतो दृष्ट्वा धर्मेण स महामतिः । अभिरामस्य रामस्य तत् सर्वं कर्तुमुद्यतः ॥
हिंदी अनुवाद
उस महामति (वाल्मीकि) ने धर्मपूर्वक उस सबको तत्त्वतः देखकर, उस अभिराम (सुन्दर) राम के सम्पूर्ण चरित्र को रचने के लिए उद्यत हो गए।
अर्थ / व्याख्या
इस श्लोक में वाल्मीकि के रामायण रचना के लिए उद्यत होने का वर्णन है। वे राम के सम्पूर्ण चरित्र का यथार्थ दर्शन कर चुके हैं और अब उसे काव्यबद्ध करने के लिए तैयार हैं।
टिप्पणी
सातवाँ श्लोक संकल्प का है। वाल्मीकि ने सम्पूर्ण रामकथा का यथार्थ दर्शन कर लिया है और अब वे उसे काव्य के रूप में प्रस्तुत करने के लिए उद्यत हैं। "अभिरामस्य रामस्य" – राम अभिराम हैं, अर्थात् अत्यन्त सुन्दर और मनोहर। उनके इस मनोहर चरित्र को वाल्मीकि काव्य में उतारना चाहते हैं।
॥ श्रीमद्वाल्मीकियरामायणे बालकाण्डे तृतीयः सर्गः श्लोक ७ ॥
अभिरामस्य रामस्य तत् सर्वं कर्तुमुद्यतः ॥
abhirāmasya rāmasya tat sarvaṃ kartumudyataḥ ||
🔹 हिन्दी अनुवाद : उस महामति (वाल्मीकि) ने धर्मपूर्वक उस सबको तत्त्वतः देखकर, उस अभिराम (सुन्दर) राम के सम्पूर्ण चरित्र को रचने के लिए उद्यत हो गए।
🔹 English Translation : Having seen all that in truth through righteousness, that great-minded Valmiki became prepared to compose the entire life of the beautiful Rama.
🔍 शब्दार्थ (Word by Word Meaning)
| संस्कृत | व्याकरण | हिन्दी अर्थ |
|---|---|---|
| तत् | सर्वनाम, नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचन | उस सबको |
| सर्वम् | विशेषण, नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचन | सम्पूर्ण |
| तत्त्वतः | अव्यय | तत्त्व से, यथार्थ रूप में |
| दृष्ट्वा | क्रिया (ल्यबन्त) | देखकर |
| धर्मेण | पुल्लिंग, तृतीया एकवचन | धर्मपूर्वक |
| सः | सर्वनाम, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन | वह |
| महामतिः | विशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन | महामति, महान बुद्धि वाले (वाल्मीकि) |
| अभिरामस्य | विशेषण, पुल्लिंग, षष्ठी एकवचन | अभिराम (अत्यन्त सुन्दर) के |
| रामस्य | पुल्लिंग, षष्ठी एकवचन | राम के |
| तत् | सर्वनाम, नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचन | उस (चरित्र) को |
| सर्वम् | विशेषण, नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचन | सम्पूर्ण |
| कर्तुम् | क्रिया (तुमुन्नन्त) | करने के लिए |
| उद्यतः | विशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन | उद्यत, तत्पर, तैयार |
📜 श्लोक का सन्दर्भ एवं व्याख्या
इस श्लोक में रामायण के रचना-प्रक्रिया का निर्णायक क्षण है। वाल्मीकि ने योगबल से सम्पूर्ण रामकथा का साक्षात्कार कर लिया है और अब उस "अभिराम" (मनोहर) चरित्र को काव्यरूप देने के लिए वे कटिबद्ध हैं। "धर्मेण" का प्रयोग यहाँ यह बताता है कि उनका यह कार्य भी धर्म के अनुरूप है। राम के चरित्र का गायन स्वयं एक धार्मिक अनुष्ठान है।
"अभिरामस्य रामस्य" – राम का नाम ही अभिराम है। वे साक्षात् सौन्दर्य और आनन्द के स्रोत हैं। उनके चरित्र को काव्य में उतारना वाल्मीकि के लिए परम आनन्द का विषय है। इस प्रकार वे रामायण रचना के लिए पूर्ण रूप से तैयार हो जाते हैं।
📖 आध्यात्मिक संदेश
इस श्लोक से हमें यह प्रेरणा मिलती है कि जब हम किसी कार्य को करने से पूर्व उसका पूर्ण ज्ञान और साक्षात्कार कर लेते हैं, तब हम उसे सफलतापूर्वक कर सकते हैं। वाल्मीकि ने पहले रामकथा का दर्शन किया, फिर उसे लिखा। यह हमें सिखाता है कि किसी भी रचना या कार्य के लिए गहन चिन्तन और साक्षात्कार आवश्यक है।
॥ दृष्ट्वा कर्तुम् उद्यतः ॥
जय श्री राम 🙏