राम की कहानी – श्लोक 8

संस्कृत श्लोक

कामार्थगुणसंयुक्तं धर्मार्थगुणविस्तरम् । समुद्रमिव रत्नाढ्यं सर्वश्रुतिमनोहरम् ॥

हिंदी अनुवाद

(वह रामायण) काम, अर्थ और गुणों से युक्त, धर्म, अर्थ और गुणों का विस्तार करने वाली, रत्नों से भरे समुद्र के समान तथा सभी श्रोताओं के मन को हरने वाली है।

अर्थ / व्याख्या

इस श्लोक में रामायण की विशेषताओं का वर्णन है – यह चार पुरुषार्थों (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) से युक्त, रत्नाकर समुद्र के समान अमूल्य तथा सबको मनोहर है।

टिप्पणी

आठवाँ श्लोक रामायण की महिमा का गान है। यह काव्य काम, अर्थ और गुणों से संयुक्त है, अर्थात् इसमें मानव जीवन के सभी पहलुओं का समावेश है। साथ ही यह धर्म, अर्थ और गुणों का विस्तार करता है। इसे सुनने से सभी को आनन्द प्राप्त होता है। इसे रत्नों से भरे समुद्र की उपमा दी गई है – जैसे समुद्र में असंख्य रत्न होते हैं, वैसे ही रामायण में ज्ञान, भक्ति, नीति आदि के असंख्य रत्न भरे हैं।

॥ श्रीमद्वाल्मीकियरामायणे बालकाण्डे तृतीयः सर्गः श्लोक ८ ॥

कामार्थगुणसंयुक्तं धर्मार्थगुणविस्तरम् ।
समुद्रमिव रत्नाढ्यं सर्वश्रुतिमनोहरम् ॥
kāmārthaguṇasaṃyuktaṃ dharmārthaguṇavistaram |
samudramiva ratnāḍhyaṃ sarvaśrutimanoharam ||

🔹 हिन्दी अनुवाद : (वह रामायण) काम, अर्थ और गुणों से युक्त, धर्म, अर्थ और गुणों का विस्तार करने वाली, रत्नों से भरे समुद्र के समान तथा सभी श्रोताओं के मन को हरने वाली है।

🔹 English Translation : (That Ramayana) is endowed with desire, wealth, and virtues; it elaborates dharma, wealth, and virtues; it is like an ocean full of gems, and captivates the minds of all listeners.

🔍 शब्दार्थ (Word by Word Meaning)

संस्कृतव्याकरणहिन्दी अर्थ
कामार्थगुणसंयुक्तम्विशेषण, नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचन (काम+अर्थ+गुण+संयुक्त)काम, अर्थ और गुणों से युक्त
धर्मार्थगुणविस्तरम्विशेषण, नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचन (धर्म+अर्थ+गुण+विस्तर)धर्म, अर्थ और गुणों का विस्तार करने वाली
समुद्रमिवउपमा (समुद्र + इव)समुद्र के समान
रत्नाढ्यम्विशेषण, नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचनरत्नों से भरपूर
सर्वश्रुतिमनोहरम्विशेषण, नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचन (सर्व+श्रुति+मनोहर)सभी श्रोताओं के मन को हरने वाली

📜 श्लोक का सन्दर्भ एवं व्याख्या

यह श्लोक रामायण की विशेषताओं का बखान करता है। "कामार्थगुणसंयुक्तम्" – काम का अर्थ है इच्छा, अर्थ का अर्थ है धन, और गुण का अर्थ है सद्गुण। रामायण में मानव जीवन के ये तीनों लक्ष्य समाहित हैं। साथ ही यह धर्म, अर्थ और गुणों का विस्तार करती है – अर्थात् इसे सुनने से धर्म की वृद्धि होती है, अर्थ की प्राप्ति के उपाय मिलते हैं, और सद्गुणों का विकास होता है।

"समुद्रमिव रत्नाढ्यम्" – जिस प्रकार समुद्र में अनेक प्रकार के रत्न (मोती, मूंगा, वैदूर्य आदि) छिपे होते हैं, उसी प्रकार रामायण में ज्ञान, भक्ति, वैराग्य, नीति, मोक्ष आदि के अनमोल रत्न भरे हैं। "सर्वश्रुतिमनोहरम्" – यह काव्य इतना मधुर है कि सुनने वाले सभी का मन मोह लेता है, चाहे वे किसी भी वर्ग के हों।

✨ विशेष तथ्य: इस श्लोक में त्रिवर्ग (धर्म, अर्थ, काम) का उल्लेख है। रामायण इन तीनों के समन्वय का आदर्श ग्रन्थ है। चौथा पुरुषार्थ मोक्ष भी इसके अन्तर्गत आ जाता है, क्योंकि धर्म, अर्थ और काम के सम्यक् पालन से ही मोक्ष की प्राप्ति होती है।

📖 आध्यात्मिक संदेश

रामायण केवल एक काव्य नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला सिखाने वाला ग्रन्थ है। इसमें मनुष्य के सभी लक्ष्यों (पुरुषार्थों) का समावेश है। यह श्लोक हमें बताता है कि रामायण का अध्ययन-श्रवण हमें धर्म, अर्थ और काम के सही स्वरूप को समझने में सहायता करता है, और अन्ततः मोक्ष की ओर ले जाता है।

॥ रामायणं रत्नाकरः ॥

जय श्री राम 🙏