राम की कहानी – श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
जन्म रामस्य सुमहद्वीर्यं सर्वानुकूलताम् । लोकस्य प्रियतां क्षान्तिं सौम्यतां सत्यशीलताम् ॥
हिंदी अनुवाद
राम का जन्म, महान वीरता, सबके अनुकूल होना, लोक में प्रियता, क्षमा, सौम्यता और सत्यशीलता (इन सबका वर्णन किया)।
अर्थ / व्याख्या
दसवाँ श्लोक उन विषयों का उल्लेख करता है जिनका वर्णन रामायण में किया जाएगा – राम का जन्म, वीरता, सर्वानुकूलता, प्रियता, क्षमा, सौम्यता और सत्यशीलता।
टिप्पणी
दसवाँ श्लोक उन गुणों की सूची देता है जो राम में थे और जिनका वर्णन रामायण में किया जाएगा। यह श्लोक अगले सर्गों के लिए भूमिका का कार्य करता है। राम के चरित्र के ये गुण ही उन्हें मर्यादापुरुषोत्तम बनाते हैं।
॥ श्रीमद्वाल्मीकियरामायणे बालकाण्डे तृतीयः सर्गः श्लोक १० ॥
लोकस्य प्रियतां क्षान्तिं सौम्यतां सत्यशीलताम् ॥
lokasya priyatāṃ kṣāntiṃ saumyatāṃ satyaśīlatām ||
🔹 हिन्दी अनुवाद : राम का जन्म, महान वीरता, सबके अनुकूल होना, लोक में प्रियता, क्षमा, सौम्यता और सत्यशीलता (इन सबका वर्णन किया)।
🔹 English Translation : The birth of Rama, his great valor, being favorable to all, popularity among people, forgiveness, gentleness, and truthfulness (are described).
🔍 शब्दार्थ (Word by Word Meaning)
| संस्कृत | व्याकरण | हिन्दी अर्थ |
|---|---|---|
| जन्म | नपुंसकलिंग, प्रथमा एकवचन | जन्म |
| रामस्य | पुल्लिंग, षष्ठी एकवचन | राम का |
| सुमहत् | विशेषण, नपुंसकलिंग, प्रथमा एकवचन | महान |
| वीर्यम् | नपुंसकलिंग, प्रथमा एकवचन | वीरता, पराक्रम |
| सर्वानुकूलताम् | स्त्रीलिंग, द्वितीया एकवचन | सबके अनुकूल होना |
| लोकस्य | पुल्लिंग, षष्ठी एकवचन | लोक की |
| प्रियताम् | स्त्रीलिंग, द्वितीया एकवचन | प्रियता |
| क्षान्तिम् | स्त्रीलिंग, द्वितीया एकवचन | क्षमा, सहनशीलता |
| सौम्यताम् | स्त्रीलिंग, द्वितीया एकवचन | सौम्यता, कोमलता |
| सत्यशीलताम् | स्त्रीलिंग, द्वितीया एकवचन | सत्यशीलता, सत्यपरायणता |
📜 श्लोक का सन्दर्भ एवं व्याख्या
यह श्लोक उन गुणों को इंगित करता है जो राम के चरित्र की विशेषता हैं और जिनका विस्तारपूर्वक वर्णन रामायण में किया जाएगा। राम का जन्म (अयोध्या में, राजा दशरथ के पुत्र के रूप में), उनका असाधारण वीर्य (बल, पराक्रम), सर्वानुकूलता (सबके साथ मिलजुल कर रहना), लोकप्रियता (जनता द्वारा प्रेम), क्षान्ति (अपराधियों को भी क्षमा करना), सौम्यता (मधुर स्वभाव) और सत्यशीलता (सत्य के प्रति अटल निष्ठा) – ये सभी गुण राम को एक आदर्श मनुष्य और मर्यादापुरुषोत्तम बनाते हैं।
इस प्रकार तृतीय सर्ग का समापन होता है, जिसमें वाल्मीकि की योगसाधना, रामकथा के दर्शन और उसे काव्यरूप देने के संकल्प का वर्णन है। अब आगे के सर्गों में राम के चरित्र का विस्तृत वर्णन प्रारम्भ होगा।
📖 आध्यात्मिक संदेश
इस श्लोक से हमें यह सीख मिलती है कि एक आदर्श जीवन के लिए इन गुणों का होना आवश्यक है – जन्म से कोई महान नहीं होता, बल्कि अपने कर्मों और गुणों से महान बनता है। राम के इन गुणों का अनुसरण करके हम भी अपने जीवन को सार्थक बना सकते हैं।
॥ रामो विग्रहवान् धर्मः ॥
जय श्री राम 🙏