राम की कहानी – श्लोक 26

संस्कृत श्लोक

अङ्गुलीयकदानं च ऋक्षस्य बिलदर्शनम् । प्रायोपवेशनं चैव संपातेश्चापि दर्शनम् ॥

हिंदी अनुवाद

अंगूठी का दान, ऋक्ष (भालू) की गुफा का दर्शन, प्रायोपवेशन (भूख पर आसन) और संपाति का दर्शन।

अर्थ / व्याख्या

हनुमान को सीता को पहचानने के लिए राम ने अपनी अंगूठी दी। रास्ते में उन्हें एक भालू (ऋक्ष) की गुफा दिखी। जब खोजी दल को सीता का कोई पता नहीं चला और समय सीमा समाप्त हो गई, तो उन्होंने प्रायोपवेशन (भूख पर बैठने) का निर्णय लिया। तभी उनकी भेंट गृध्र संपाति से हुई।

टिप्पणी

यह श्लोक हनुमान के दक्षिण दिशा अभियान की महत्वपूर्ण घटनाओं को समेटे हुए है। राम की अंगूठी सीता के लिए विश्वास का प्रतीक थी। प्रायोपवेशन दल के समर्पण और निराशा की चरम सीमा को दर्शाता है। संपाति का दर्शन एक दैवीय हस्तक्षेप है, जो उन्हें सीता के लंका में होने की सूचना देता है।

॥ श्री रामायण – बाल काण्ड – अध्याय ३ – श्लोक २६ ॥

अङ्गुलीयकदानं च ऋक्षस्य बिलदर्शनम् । प्रायोपवेशनं चैव संपातेश्चापि दर्शनम् ॥
aṅgulīyakadānaṃ ca ṛkṣasya biladarśanam | prāyopaveśanaṃ caiva saṃpāteścāpi darśanam ||

🔹 हिन्दी अनुवाद : अंगूठी का दान, ऋक्ष (भालू) की गुफा का दर्शन, प्रायोपवेशन (भूख पर आसन) और संपाति का दर्शन।

🔹 English Translation : The giving of the ring, the sight of the bear's cave, sitting in fasting (unto death), and the sight of Sampati.

🔍 शब्दार्थ (Word by Word Meaning)

संस्कृतव्याकरणहिन्दी अर्थ
अङ्गुलीयकदानम्नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचनअंगूठी का दान (देना)
अव्ययऔर
ऋक्षस्यपुल्लिंग, षष्ठी एकवचनभालू (ऋक्ष) का
बिलदर्शनम्नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचनगुफा का दर्शन
प्रायोपवेशनम्नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचनप्रायोपवेशन (आमरण अनशन)
चैवअव्ययऔर भी
संपातेःपुल्लिंग, षष्ठी एकवचनसंपाति (गिद्ध) का
चापिअव्यय (च + अपि)और भी
दर्शनम्नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचनदर्शन

📖 व्याख्या एवं महत्व

यह श्लोक हनुमान के नेतृत्व वाले दक्षिणी दल के साहसिक अभियान का सार है। राम ने हनुमान को अपनी अंगूठी देकर सीता के लिए एक विश्वसनीय पहचान चिह्न प्रदान किया। यह अंगूठी राम के अस्तित्व और उनके प्रेम का प्रमाण थी। रास्ते में उन्होंने एक विशाल भालू (ऋक्षराज जाम्बवान) की गुफा देखी, जो उनके दल का ही एक महत्वपूर्ण सदस्य बना। जब वे दक्षिण के समुद्र तट पर पहुँचे और उन्हें सीता का कोई सुराग नहीं मिला, तो निर्धारित समय (मास) समाप्त हो गया। अपनी असफलता से निराश और सुग्रीव के क्रोध के भय से ग्रस्त, वानर दल ने प्रायोपवेशन (भूख पर बैठना) करने का निर्णय लिया, जो कर्तव्य के प्रति उनकी निष्ठा और आत्म-सम्मान को दर्शाता है। इसी दुःखद क्षण में दैवीय कृपा हुई। उनकी भेंट विशाल गिद्ध संपाति से हुई, जो जटायु का बड़ा भाई था। संपाति ने उन्हें बताया कि रावण सीता को लंका की ओर ले गया था। यह जानकारी हनुमान के अभियान को नई दिशा और ऊर्जा प्रदान करती है। संपाति का दर्शन आशा की किरण थी, जिसने निराशा को सफलता में बदलने का मार्ग प्रशस्त किया।

यह घटना हमें सिखाती है कि सच्चे प्रयास और बलिदान के बाद ईश्वरीय सहायता अवश्य मिलती है। अंगूठी दान राम के विश्वास का प्रतीक है, जो उन्होंने हनुमान पर किया।