राम की कहानी – श्लोक 25
संस्कृत श्लोक
कोपं राघवसिंहस्य बलानामुपसंग्रहम् । दिशः प्रस्थापनं चैव पृथिव्याश्च निवेदनम् ॥
हिंदी अनुवाद
राघवसिंह (राम) के क्रोध को, (वानर) सेनाओं के एकत्रीकरण को, दिशाओं में भेजे जाने को तथा पृथ्वी का (सीता के बारे में) समाचार न देने का वर्णन।
अर्थ / व्याख्या
जब वर्षा ऋतु बीत गई और सुग्रीव ने सीता की खोज में कोई पहल नहीं की, तो राम को बहुत क्रोध आया। इस पर सुग्रीव ने सभी दिशाओं में वानर सेनाएँ भेजीं। लेकिन उन सेनाओं को सीता का कोई पता नहीं चला।
टिप्पणी
यह श्लोक राम के सिंह-समान क्रोध को दर्शाता है, जो उनके नेतृत्व कौशल और समय के महत्व को रेखांकित करता है। सुग्रीव की निष्क्रियता से कुपित होकर, राम ने उसे उसके कर्तव्य का स्मरण दिलाया। इसके बाद व्यापक स्तर पर खोज अभियान शुरू हुआ। सभी दिशाओं में वानर भेजे गए, लेकिन प्रारंभिक प्रयास असफल रहे, जिससे राम की चिंता और बढ़ गई।
॥ श्री रामायण – बाल काण्ड – अध्याय ३ – श्लोक २५ ॥
🔹 हिन्दी अनुवाद : राघवसिंह (राम) के क्रोध को, (वानर) सेनाओं के एकत्रीकरण को, दिशाओं में भेजे जाने को तथा पृथ्वी का (सीता के बारे में) समाचार न देने का वर्णन।
🔹 English Translation : The anger of the lion among Raghavas (Rama), the gathering of (monkey) armies, sending them in all directions, and (their) not bringing any news of the earth (Sita).
🔍 शब्दार्थ (Word by Word Meaning)
| संस्कृत | व्याकरण | हिन्दी अर्थ |
|---|---|---|
| कोपम् | पुल्लिंग, द्वितीया एकवचन | क्रोध, गुस्सा |
| राघवसिंहस्य | पुल्लिंग, षष्ठी एकवचन | राघवों में सिंह (श्रेष्ठ) राम का |
| बलानाम् | पुल्लिंग, षष्ठी बहुवचन | सेनाओं का |
| उपसंग्रहम् | पुल्लिंग, द्वितीया एकवचन | एकत्रीकरण, संग्रह |
| दिशः | स्त्रीलिंग, द्वितीया बहुवचन | दिशाओं में |
| प्रस्थापनम् | नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचन | भेजना, प्रस्थान कराना |
| चैव | अव्यय | और भी |
| पृथिव्याः | स्त्रीलिंग, षष्ठी एकवचन | पृथ्वी (यहाँ सीता) के बारे में |
| च | अव्यय | और |
| निवेदनम् | नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचन | सूचना, समाचार (न मिलना) |
📖 व्याख्या एवं महत्व
यह श्लोक कथा में एक महत्वपूर्ण मोड़ है। वर्षा ऋतु समाप्त होने के बाद भी जब सुग्रीव ने अपने वचन का पालन नहीं किया और सीता की खोज के लिए कोई प्रयास नहीं किया, तो राम का क्रोध सात्विक रूप से प्रकट हुआ। यह क्रोध अन्याय या स्वार्थ के लिए नहीं, बल्कि अपने कर्तव्य में लापरवाही बरतने वाले मित्र के प्रति था। लक्ष्मण ने सुग्रीव को यह क्रोध का संदेश पहुँचाया, जिससे सुग्रीव सचेत हुए और तुरंत कार्रवाई शुरू की। उन्होंने समस्त वानर सेनाओं को एकत्र किया और उन्हें चारों दिशाओं में सीता की खोज के लिए भेज दिया। इस विशाल अभियान के बावजूद, प्रारंभिक प्रयासों में सीता का कोई सुराग नहीं मिला। "पृथिव्याश्च निवेदनम्" का अर्थ है कि उन्हें सीता (जो पृथ्वी की पुत्री थीं) का कोई पता नहीं चला। इस असफलता से राम की चिंता और दुःख और गहरा गया, और अब उनकी आशा का एकमात्र केंद्र दक्षिण दिशा में भेजे गए हनुमान का दल था।
यह घटना हमें सिखाती है कि नेतृत्व में कर्तव्यनिष्ठा और समय की पाबंदी कितनी आवश्यक है। साथ ही, यह भी दर्शाती है कि बड़े लक्ष्यों की प्राप्ति में असफलताएँ मिल सकती हैं, लेकिन धैर्य नहीं छोड़ना चाहिए।