राम की कहानी – श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
पर्वतारोहणं चैव सागरस्यापि लङ्घनम् । समुद्रवचनाच्चैव मैनाकस्य च दर्शनम् ॥
हिंदी अनुवाद
पर्वत पर चढ़ना, सागर का लंघन करना, समुद्र के वचन से मैनाक पर्वत का दर्शन।
अर्थ / व्याख्या
हनुमान लंका जाने के लिए महेन्द्र पर्वत पर चढ़े और फिर उससे छलांग लगाकर समुद्र का लंघन किया। समुद्र ने उनकी परीक्षा ली और फिर मैनाक पर्वत को उनके विश्राम के लिए प्रकट होने का आदेश दिया।
टिप्पणी
यह श्लोक हनुमान की अद्भुत शक्ति और दृढ़ संकल्प का परिचायक है। सौ योजन (लगभग 1200 किमी) चौड़े समुद्र को लाँघना असंभव-सा कार्य था, लेकिन राम-कार्य के प्रति समर्पण ने हनुमान को यह शक्ति प्रदान की। समुद्र ने उनकी परीक्षा लेने के लिए मैनाक को बीच में भेजा, लेकिन हनुमान ने उसे केवल स्पर्श किया और आगे बढ़ गए।
॥ श्री रामायण – बाल काण्ड – अध्याय ३ – श्लोक २७ ॥
🔹 हिन्दी अनुवाद : पर्वत पर चढ़ना, सागर का लंघन करना, समुद्र के वचन से मैनाक पर्वत का दर्शन।
🔹 English Translation : Climbing the mountain, leaping across the ocean, and by the word of the ocean, the sight of Mainaka mountain.
🔍 शब्दार्थ (Word by Word Meaning)
| संस्कृत | व्याकरण | हिन्दी अर्थ |
|---|---|---|
| पर्वतारोहणम् | नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचन | पर्वत पर चढ़ना (आरोहण) |
| चैव | अव्यय | और भी |
| सागरस्य | पुल्लिंग, षष्ठी एकवचन | सागर (समुद्र) का |
| अपि | अव्यय | भी |
| लङ्घनम् | नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचन | लाँघना, पार करना |
| समुद्रवचनात् | पुल्लिंग, पञ्चमी एकवचन | समुद्र के वचन (कहने) से |
| चैव | अव्यय | और भी |
| मैनाकस्य | पुल्लिंग, षष्ठी एकवचन | मैनाक पर्वत का |
| च | अव्यय | और |
| दर्शनम् | नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचन | दर्शन |
📖 व्याख्या एवं महत्व
यह श्लोक हनुमान की वीरता और भक्ति के चरमोत्कर्ष का वर्णन करता है। समुद्र तट पर खड़े होकर, हनुमान ने अपने शरीर का आकार बढ़ाया और महेन्द्र पर्वत पर आरोहण किया। वहाँ से उन्होंने समुद्र को लाँघने के लिए छलांग लगाई। यह केवल एक शारीरिक उपलब्धि नहीं थी, बल्कि उनके मानसिक बल, राम के प्रति प्रेम और असीम समर्पण का परिणाम थी। जैसे ही वे आकाश में उड़े, देवराज इंद्र के मित्र और समुद्र द्वारा संरक्षित मैनाक पर्वत समुद्र से प्रकट हुआ। उसने हनुमान को विश्राम के लिए आमंत्रित किया, क्योंकि वह उनके पराक्रम से प्रभावित था और उनकी सहायता करना चाहता था। लेकिन हनुमान ने विनम्रतापूर्वक उसे केवल स्पर्श किया और बिना रुके अपनी यात्रा जारी रखी। उनका यह कृत्य उनके लक्ष्य के प्रति अडिग निष्ठा और समय की कीमत समझने का प्रतीक है। वे किसी भी प्रलोभन या विश्राम में नहीं फंसे। मैनाक का दर्शन यह दर्शाता है कि साहसी और निष्ठावान व्यक्ति को मार्ग में सहायता स्वयं ही मिलती है।
यह घटना हनुमान के चरित्र के कई पहलुओं को उजागर करती है - उनकी अटूट शक्ति, विनम्रता, और लक्ष्य-निष्ठा। समुद्र और मैनाक ने उनकी परीक्षा ली, और वे खरे उतरे। यही कारण है कि वे राम के सबसे विश्वसनीय दूत और सेवक बने।