राम की कहानी – श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रुत्वा वस्तु समग्रं तद्धर्मार्थसहितं हितम् । व्यक्तमन्वेषते भूयो यद् वृत्तं तस्य धीमतः ॥

हिंदी अनुवाद

धर्म और अर्थ से युक्त उस सम्पूर्ण हितकर वृत्तान्त को सुनकर, वे धीमान (वाल्मीकि) उसके (राम के) चरित्र के बारे में और अधिक स्पष्ट रूप से जानना चाहते हैं।

अर्थ / व्याख्या

यह श्लोक वाल्मीकि की जिज्ञासा को दर्शाता है, जो नारद से रामकथा का संक्षेप सुनने के बाद उसके विस्तार को जानने की इच्छा रखते हैं।

टिप्पणी

प्रथम श्लोक में वाल्मीकि की मानसिक स्थिति का वर्णन है। वे नारद से राम के चरित्र का संक्षिप्त विवरण सुन चुके हैं और अब उसी का विस्तार से जानने के लिए उत्सुक हैं। यह जिज्ञासा ही आगे चलकर रामायण के महाकाव्य के रचना का कारण बनती है।

॥ श्रीमद्वाल्मीकियरामायणे बालकाण्डे तृतीयः सर्गः श्लोक १ ॥

श्रुत्वा वस्तु समग्रं तद्धर्मार्थसहितं हितम् ।
व्यक्तमन्वेषते भूयो यद् वृत्तं तस्य धीमतः ॥
śrutvā vastu samagraṃ taddharmārthasahitaṃ hitam |
vyaktam anveṣate bhūyo yad vṛttaṃ tasya dhīmataḥ ||

🔹 हिन्दी अनुवाद : धर्म और अर्थ से युक्त उस सम्पूर्ण हितकर वृत्तान्त को सुनकर, वे धीमान (वाल्मीकि) उसके (राम के) चरित्र के बारे में और अधिक स्पष्ट रूप से जानना चाहते हैं।

🔹 English Translation : Having heard that complete, beneficial narrative endowed with dharma and artha, the wise Valmiki desires to know more clearly the past events of that intelligent Rama.

🔍 शब्दार्थ (Word by Word Meaning)

संस्कृतव्याकरणहिन्दी अर्थ
श्रुत्वाक्रिया (ल्यबन्त)सुनकर
वस्तुनपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचनवृत्तान्त, कथा
समग्रम्विशेषण, नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचनसम्पूर्ण
तत्सर्वनाम, नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचनउस
धर्मार्थसहितम्विशेषण, नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचन (धर्म+अर्थ+सहित)धर्म और अर्थ से युक्त
हितम्विशेषण, नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचनहितकारी, कल्याणकारी
व्यक्तम्क्रियाविशेषणस्पष्ट रूप से
अन्वेषतेआत्मनेपद, प्रथमपुरुष, एकवचन (अनु+इष् धातु)खोज करता है, जानना चाहता है
भूयःअव्ययफिर से, और अधिक
यत्सर्वनाम, नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचनजो
वृत्तम्नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचन (वृत् धातु से)चरित्र, वृत्तान्त, घटना
तस्यसर्वनाम, पुल्लिंग, षष्ठी एकवचनउसका (राम का)
धीमतःविशेषण, पुल्लिंग, षष्ठी एकवचन (धीमत् शब्द)बुद्धिमान का, धीमान (राम) का

📜 श्लोक का सन्दर्भ एवं व्याख्या

यह श्लोक बालकाण्ड के तृतीय सर्ग का प्रथम श्लोक है। पूर्व सर्ग (द्वितीय) में नारद जी ने वाल्मीकि को राम के चरित्र का संक्षिप्त विवरण सुनाया था। इस श्लोक में वाल्मीकि की मानसिक दशा का वर्णन है – वे उस कथा को सुनने के बाद और अधिक जानने के लिए उत्सुक हो उठे हैं। वे नारद द्वारा बताई गई बातों को "धर्मार्थसहित" और "हित" कहते हैं, जो दर्शाता है कि रामकथा केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि धर्म और अर्थ से परिपूर्ण तथा सबके कल्याण के लिए है।

"व्यक्तम् अन्वेषते" से पता चलता है कि वाल्मीकि केवल सुनकर ही नहीं रुक गए, बल्कि उस कथा को स्पष्ट रूप से समझने और उसके हर पहलू को जानने की इच्छा रखते हैं। यह जिज्ञासा ही महाकवि की रचनाशीलता का आधार बनती है। इस प्रकार यह श्लोक आगे के सम्पूर्ण महाकाव्य के लिए भूमिका का कार्य करता है।

✨ विशेष तथ्य: यह श्लोक दर्शाता है कि किसी भी महान रचना के लिए गहरी जिज्ञासा और तल्लीनता आवश्यक है। वाल्मीकि का "अन्वेषण" ही आगे चलकर योगबल से सम्पूर्ण रामकथा के दर्शन का कारण बनता है।

📖 आध्यात्मिक संदेश

इस श्लोक से हमें सीखने को मिलता है कि धर्म और अर्थ से युक्त कथा का श्रवण मात्र ही पर्याप्त नहीं है, उसे गहराई से समझने और उस पर मनन करने की आवश्यकता होती है। सच्चा ज्ञान तभी उत्पन्न होता है जब हम सुनी हुई बातों को व्यक्त (स्पष्ट) रूप से अपने हृदय में उतार लेते हैं। वाल्मीकि की यह जिज्ञासा ही उन्हें आदिकवि बनाती है।

॥ जिज्ञासा ही ज्ञान का मूल है ॥

जय श्री राम 🙏