संक्षेप रामायण – श्लोक 89
संस्कृत श्लोक
अनेकयज्ञदानानां तपसां च फलं लभेत् । रामायणमिदं पुण्यं यः पठेत् शृणुयादपि ॥
हिंदी अनुवाद
अनेक यज्ञों, दानों और तपों का जो फल होता है, वह फल इस पुण्यमय रामायण को जो पढ़ता या सुनता है, उसे प्राप्त होता है।
अर्थ / व्याख्या
रामायण पाठ या श्रवण से अनेक यज्ञों, दानों और तपों का फल मिलता है।
टिप्पणी
यह श्लोक रामायण के फल की तुलना यज्ञ-दान-तप से करता है।
॥ श्लोक ८९ – रामायण पाठ से यज्ञ-दान-तप का फल ॥
🔹 हिन्दी अनुवाद : अनेक यज्ञों, दानों और तपों का जो फल होता है, वह फल इस पुण्यमय रामायण को जो पढ़ता या सुनता है, उसे प्राप्त होता है।
🔹 English Translation : One who reads or hears this sacred Ramayana obtains the fruit of many sacrifices, charities and austerities.
🔍 शब्दार्थ (Word by Word Meaning)
| संस्कृत | व्याकरण | हिन्दी अर्थ |
|---|---|---|
| अनेकयज्ञदानानाम् | नपुंसकलिंग, षष्ठी बहुवचन (अनेक + यज्ञ + दान) | अनेक यज्ञों और दानों का |
| तपसाम् | नपुंसकलिंग, षष्ठी बहुवचन | तपों का |
| च | अव्यय | और |
| फलम् | नपुंसकलिंग, प्रथमा एकवचन | फल |
| लभेत् | विधिलिङ्, प्रथमपुरुष एकवचन (लभ् धातु) | प्राप्त करे |
| रामायणम् | नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचन | रामायण |
| इदम् | सर्वनाम, नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचन | इस |
| पुण्यम् | विशेषण, नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचन | पुण्यमय |
| यः | सर्वनाम, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन | जो |
| पठेत् | विधिलिङ्, प्रथमपुरुष एकवचन (पठ् धातु) | पढ़े |
| शृणुयात् | विधिलिङ्, प्रथमपुरुष एकवचन (श्रु धातु) | सुने |
| अपि | अव्यय | भी |
📜 ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक महत्व
यह श्लोक रामायण के पाठ-श्रवण के फल की तुलना यज्ञ, दान और तप से करता है। यज्ञ, दान और तप तीनों ही अत्यन्त पुण्यकारी कर्म हैं, किन्तु उन्हें करना कठिन है। यज्ञ के लिए बहुत सारी सामग्री और अधिकार की आवश्यकता होती है। दान के लिए धन चाहिए। तप के लिए शारीरिक और मानसिक क्षमता चाहिए। किन्तु रामायण का पाठ या श्रवण सभी के लिए सुलभ है। उससे इन सबका फल मिल जाता है।
यह श्लोक रामायण की महिमा को सर्वोपरि स्थापित करता है। यह बताता है कि रामायण में वह शक्ति है जो दुर्लभ कर्मों के फल को भी सुलभ बना देती है।
आध्यात्मिक दृष्टि से, यज्ञ बाह्य कर्म है, दान बाह्य सम्पत्ति का त्याग है, तप शरीर को कष्ट देना है। किन्तु रामायण का पाठ आन्तरिक चित्तशुद्धि का कार्य है, जो इन सबसे अधिक शक्तिशाली है।
॥ रामायणपाठेन यज्ञदानतपःफलम् ॥
जय श्री राम 🙏