संक्षेप रामायण – श्लोक 96

संस्कृत श्लोक

गृहस्थेन सदा पुण्यं प्रथमं सर्गमुत्तमम् । पठितव्यं प्रयत्नेन रामप्रीत्यर्थमादरात् ॥

हिंदी अनुवाद

गृहस्थ को सदा इस पुण्यमय उत्तम प्रथम सर्ग का प्रयत्नपूर्वक और आदर के साथ पाठ करना चाहिए, राम को प्रसन्न करने के लिए।

अर्थ / व्याख्या

गृहस्थों के लिए प्रथम सर्ग पाठ का विधान।

टिप्पणी

यह श्लोक गृहस्थों को प्रथम सर्ग के पाठ का निर्देश देता है।

॥ श्लोक ९६ – गृहस्थों के लिए प्रथम सर्ग पाठ का विधान ॥

गृहस्थेन सदा पुण्यं प्रथमं सर्गमुत्तमम् । पठितव्यं प्रयत्नेन रामप्रीत्यर्थमादरात् ॥
gṛhasthena sadā puṇyaṃ prathamaṃ sargamuttamam | paṭhitavyaṃ prayatnena rāmaprītyartham ādarāt ||

🔹 हिन्दी अनुवाद : गृहस्थ को सदा इस पुण्यमय उत्तम प्रथम सर्ग का प्रयत्नपूर्वक और आदर के साथ पाठ करना चाहिए, राम को प्रसन्न करने के लिए।

🔹 English Translation : A householder should always read this sacred, excellent first chapter with effort and reverence, for the purpose of pleasing Rama.

🔍 शब्दार्थ (Word by Word Meaning)

संस्कृतव्याकरणहिन्दी अर्थ
गृहस्थेनपुल्लिंग, तृतीया एकवचनगृहस्थ को
सदाअव्ययसदा
पुण्यम्विशेषण, पुल्लिंग, द्वितीया एकवचनपुण्यमय
प्रथमम्विशेषण, पुल्लिंग, द्वितीया एकवचनप्रथम
सर्गम्पुल्लिंग, द्वितीया एकवचनसर्ग का
उत्तमम्विशेषण, पुल्लिंग, द्वितीया एकवचनउत्तम
पठितव्यम्कृत्य प्रत्यय, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचनपाठ करना चाहिए
प्रयत्नेनपुल्लिंग, तृतीया एकवचनप्रयत्नपूर्वक
रामप्रीत्यर्थम्अव्यय (राम + प्रीति + अर्थ)राम को प्रसन्न करने के लिए
आदरात्पुल्लिंग, पञ्चमी एकवचनआदर से

📜 ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक महत्व

यह श्लोक विशेष रूप से गृहस्थों (गृहस्थ आश्रम में रहने वालों) के लिए प्रथम सर्ग के पाठ का विधान करता है। गृहस्थ जीवन में अनेक उत्तरदायित्व और बाधाएँ होती हैं। ऐसे में रामायण के प्रथम सर्ग का पाठ करने से राम प्रसन्न होते हैं और गृहस्थ के जीवन की सभी बाधाएँ दूर होती हैं, तथा उसे धन-धान्य आदि की प्राप्ति होती है।

"रामप्रीत्यर्थम्" – राम को प्रसन्न करने के लिए – यहाँ पाठ का उद्देश्य स्पष्ट किया गया है। केवल पुण्य कमाने के लिए नहीं, बल्कि भगवान् को प्रसन्न करने के लिए पाठ करना चाहिए। यह भक्ति का मार्ग है।

आध्यात्मिक दृष्टि से, गृहस्थ जीवन में भी भक्ति का मार्ग सुलभ है। रामायण का पाठ गृहस्थ को सांसारिक बंधनों में रहते हुए भी आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रदान करता है।

॥ गृहस्थेन सदा पाठ्यं रामायणमनुत्तमम् ॥

जय श्री राम 🙏