संक्षेप रामायण – श्लोक 95
संस्कृत श्लोक
सर्वशास्त्रसारभूतं रामायणमनुत्तमम् । तस्य प्रथमसर्गोऽयं सर्वपापप्रणाशनः ॥
हिंदी अनुवाद
सर्वशास्त्रों के सारभूत अनुपम रामायण का यह प्रथम सर्ग सभी पापों का नाश करने वाला है।
अर्थ / व्याख्या
रामायण के प्रथम सर्ग की महिमा – सर्वपापनाशक।
टिप्पणी
यह श्लोक प्रथम सर्ग की पापनाशक महिमा का वर्णन करता है।
॥ श्लोक ९५ – प्रथम सर्ग सर्वपापनाशक ॥
🔹 हिन्दी अनुवाद : सर्वशास्त्रों के सारभूत अनुपम रामायण का यह प्रथम सर्ग सभी पापों का नाश करने वाला है।
🔹 English Translation : This first chapter of the unsurpassed Ramayana, which is the essence of all scriptures, destroys all sins.
🔍 शब्दार्थ (Word by Word Meaning)
| संस्कृत | व्याकरण | हिन्दी अर्थ |
|---|---|---|
| सर्वशास्त्रसारभूतम् | विशेषण, नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचन | सर्वशास्त्रों के सारभूत |
| रामायणम् | नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचन | रामायण |
| अनुत्तमम् | विशेषण, नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचन | अनुपम |
| तस्य | सर्वनाम, नपुंसकलिंग, षष्ठी एकवचन | उसका |
| प्रथमसर्गः | पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन | प्रथम सर्ग |
| अयम् | सर्वनाम, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन | यह |
| सर्वपापप्रणाशनः | विशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन | सभी पापों का नाश करने वाला |
📜 ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक महत्व
यह श्लोक पहले कहे गए तथ्य को पुनः दोहराता है कि रामायण सर्वशास्त्रसार है, और उसका प्रथम सर्ग सर्वपापप्रणाशन है। यहाँ "प्रणाशन" शब्द का प्रयोग हुआ है, जिसका अर्थ है सम्पूर्ण रूप से नाश करना। पापों का केवल क्षय नहीं, बल्कि उनका पूर्णतः विनाश हो जाता है।
यह श्लोक हमें बताता है कि यदि कोई व्यक्ति केवल प्रथम सर्ग का ही श्रद्धापूर्वक अध्ययन कर ले, तो उसके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। यह उन लोगों के लिए अत्यन्त प्रोत्साहन है जो सम्पूर्ण रामायण पढ़ने में असमर्थ हैं।
आध्यात्मिक दृष्टि से, प्रथम सर्ग में राम के सम्पूर्ण जीवन का सार है। राम के गुणों का स्मरण मात्र पापनाशक है।
॥ रामायणप्रथमसर्गः सर्वपापप्रणाशनः ॥
जय श्री राम 🙏