संक्षेप रामायण – श्लोक 98

संस्कृत श्लोक

इच्छति यत् फलं यस्तु तत् सर्वं लभते नरः । प्रथमं सर्गमासाद्य रामायणस्य कीर्तनात् ॥

हिंदी अनुवाद

मनुष्य जिस फल की इच्छा करता है, वह सब कुछ उसे प्राप्त होता है, रामायण के प्रथम सर्ग का कीर्तन करके।

अर्थ / व्याख्या

प्रथम सर्ग के कीर्तन से मनुष्य की सभी इच्छाएँ पूरी होती हैं।

टिप्पणी

यह श्लोक प्रथम सर्ग के कीर्तन से सर्वकामनापूर्ति का वर्णन करता है।

॥ श्लोक ९८ – प्रथम सर्ग कीर्तन से सर्वकामनापूर्ति ॥

इच्छति यत् फलं यस्तु तत् सर्वं लभते नरः । प्रथमं सर्गमासाद्य रामायणस्य कीर्तनात् ॥
icchati yat phalaṃ yastu tat sarvaṃ labhate naraḥ | prathamaṃ sargamāsādya rāmāyaṇasya kīrtanāt ||

🔹 हिन्दी अनुवाद : मनुष्य जिस फल की इच्छा करता है, वह सब कुछ उसे प्राप्त होता है, रामायण के प्रथम सर्ग का कीर्तन करके।

🔹 English Translation : Whatever fruit a man desires, he obtains all that, by resorting to the first chapter of the Ramayana through recitation.

🔍 शब्दार्थ (Word by Word Meaning)

संस्कृतव्याकरणहिन्दी अर्थ
इच्छतिलट्लकार, प्रथमपुरुष एकवचन (इष् धातु)इच्छा करता है
यत्सर्वनाम, नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचनजिस
फलम्नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचनफल की
यःसर्वनाम, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचनजो
तुअव्ययतो
तत्सर्वनाम, नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचनवह
सर्वम्सर्वनाम, नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचनसब
लभतेलट्लकार, प्रथमपुरुष एकवचन (लभ् धातु)प्राप्त करता है
नरःपुल्लिंग, प्रथमा एकवचनमनुष्य
प्रथमम्विशेषण, पुल्लिंग, द्वितीया एकवचनप्रथम
सर्गम्पुल्लिंग, द्वितीया एकवचनसर्ग
आसाद्यल्यबन्त अव्यय (आ + सद्)प्राप्त करके, आश्रय लेकर
रामायणस्यनपुंसकलिंग, षष्ठी एकवचनरामायण का
कीर्तनात्नपुंसकलिंग, पञ्चमी एकवचनकीर्तन से

📜 ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक महत्व

यह श्लोक प्रथम सर्ग के कीर्तन को सर्वकामप्रद बताता है। "इच्छति यत् फलम्" – मनुष्य जिस भी फल की इच्छा करता है – चाहे वह धर्म हो, अर्थ हो, काम हो या मोक्ष – वह सब उसे प्राप्त हो जाता है। यह रामायण के प्रथम सर्ग की सर्वसमर्थता को दर्शाता है।

यहाँ "आसाद्य" शब्द महत्वपूर्ण है, जिसका अर्थ है आश्रय लेना। प्रथम सर्ग का आश्रय लेकर, उसकी शरण में जाकर कीर्तन करने से सब कुछ मिलता है।

आध्यात्मिक दृष्टि से, प्रथम सर्ग में राम के समस्त गुणों और लीलाओं का सार है। उनका कीर्तन करने से राम प्रसन्न होते हैं और भक्त की सभी मनोकामनाएँ पूरी करते हैं।

॥ रामायणप्रथमसर्गः सर्वकामफलप्रदः ॥

जय श्री राम 🙏