संक्षेप रामायण – श्लोक 92

संस्कृत श्लोक

य इदं कीर्तयेद् भक्त्या प्रथमं सर्गमुत्तमम् । तस्य पुण्यफलं वक्तुं न शक्यं वर्षकोटिभिः ॥

हिंदी अनुवाद

जो भक्तिपूर्वक इस उत्तम प्रथम सर्ग का कीर्तन करता है, उसके पुण्यफल को करोड़ों वर्षों में भी नहीं कहा जा सकता।

अर्थ / व्याख्या

प्रथम सर्ग के कीर्तन का फल अपरिमित है।

टिप्पणी

यह श्लोक प्रथम सर्ग के कीर्तन के फल का वर्णन करता है।

॥ श्लोक ९२ – प्रथम सर्ग कीर्तन का अपरिमित पुण्य ॥

य इदं कीर्तयेद् भक्त्या प्रथमं सर्गमुत्तमम् । तस्य पुण्यफलं वक्तुं न शक्यं वर्षकोटिभिः ॥
ya idaṃ kīrtayed bhaktyā prathamaṃ sargamuttamam | tasya puṇyaphalaṃ vaktuṃ na śakyaṃ varṣakoṭibhiḥ ||

🔹 हिन्दी अनुवाद : जो भक्तिपूर्वक इस उत्तम प्रथम सर्ग का कीर्तन करता है, उसके पुण्यफल को करोड़ों वर्षों में भी नहीं कहा जा सकता।

🔹 English Translation : He who recites this excellent first chapter with devotion, the meritorious fruit of that cannot be described even in crores of years.

🔍 शब्दार्थ (Word by Word Meaning)

संस्कृतव्याकरणहिन्दी अर्थ
यःसर्वनाम, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचनजो
इदम्सर्वनाम, नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचनइस
कीर्तयेत्विधिलिङ्, प्रथमपुरुष एकवचन (कीर्त् धातु)कीर्तन करे
भक्त्यास्त्रीलिंग, तृतीया एकवचनभक्ति से
प्रथमम्विशेषण, पुल्लिंग, द्वितीया एकवचनप्रथम
सर्गम्पुल्लिंग, द्वितीया एकवचनसर्ग का
उत्तमम्विशेषण, पुल्लिंग, द्वितीया एकवचनउत्तम
तस्यसर्वनाम, पुल्लिंग, षष्ठी एकवचनउसके
पुण्यफलम्नपुंसकलिंग, प्रथमा एकवचनपुण्यफल को
वक्तुम्तुमुन्नन्त अव्यय (वच् धातु)कहने के लिए
अव्ययनहीं
शक्यम्विशेषण, नपुंसकलिंग, प्रथमा एकवचनशक्य
वर्षकोटिभिःनपुंसकलिंग, तृतीया बहुवचनकरोड़ों वर्षों में

📜 ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक महत्व

यह श्लोक प्रथम सर्ग के कीर्तन के फल को अपरिमित बताता है। "कीर्तन" का अर्थ है श्रद्धापूर्वक पाठ करना या गान करना। भक्ति के साथ किया गया कीर्तन और भी अधिक फलदायी होता है। प्रथम सर्ग में सम्पूर्ण रामकथा का सार निहित है, इसलिए उसका कीर्तन सम्पूर्ण रामायण के पाठ के समान फलदायी है।

यहाँ "वर्षकोटिभिः" (करोड़ों वर्षों में) कहकर पुण्य की अपरिमितता को दर्शाया गया है। यह एक अतिशयोक्ति है, जो इस सर्ग की महिमा को चरम पर पहुँचाती है।

आध्यात्मिक दृष्टि से, प्रथम सर्ग में नारद द्वारा वर्णित राम के गुणों का कीर्तन करने से मनुष्य के हृदय में वे गुण प्रतिबिम्बित होते हैं और वह राम के समान बनने लगता है। यही सबसे बड़ा पुण्य है।

॥ प्रथमसर्गकीर्तनात् पुण्यं कोटिगुणं भवेत् ॥

जय श्री राम 🙏