बाल काण्ड अध्याय 1

संक्षेप रामायण

बाल काण्ड का प्रथम सर्ग 'संक्षेप रामायण' के नाम से प्रसिद्ध है। इसमें भगवान् राम की सम्पूर्ण जीवन-गाथा का संक्षिप्त रूप में वर्णन किया गया है। यह संवाद महर्षि वाल्मीकि और देवर्षि नारद के बीच होता है, जिसमें नारद जी राम के चरित्र, गुणों एवं लीलाओं का वर्णन करते हैं। इसी सर्ग में वाल्मीकि को रामायण लिखने की प्रेरणा मिलती है।

विवरण

यह सर्ग सम्पूर्ण रामायण का सार है। प्रारम्भ में भगवान् वाल्मीकि देवर्षि नारद से पूछते हैं कि क्या इस संसार में कोई सर्वगुण सम्पन्न, पराक्रमी, धर्मज्ञ, कृतज्ञ, सत्यवादी और दृढ़प्रतिज्ञ पुरुष है? तब नारद जी श्रीराम का आदर्श चरित्र प्रस्तुत करते हैं। वे राम के जन्म, बाललीलाओं, विश्वामित्र के यज्ञ-रक्षण, सीता स्वयंवर, परशुराम से संवाद, अयोध्या वापसी, केकयी के वरदान, वनवास, दण्डक वन यात्रा, सीता हरण, सुग्रीव मैत्री, वालि वध, हनुमान की खोज, लंका दहन, रावण वध एवं अयोध्या लौटकर राज्याभिषेक तक की सम्पूर्ण कथा संक्षेप में सुनाते हैं। इस प्रकार नारद जी द्वारा वर्णित इस संक्षिप्त रामकथा को सुनकर वाल्मीकि मुनि अत्यन्त प्रसन्न होते हैं और उन्हें रामायण महाकाव्य की रचना करने की प्रेरणा मिलती है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – बालकाण्ड – सर्ग १ (संक्षेप रामायण)

ॐ श्री परमात्मने नमः
॥ अथ प्रथमः सर्गः ॥
(नारद-वाल्मीकि संवाद – संक्षेप रामायण)

❓ वाल्मीकि जी का प्रश्न – कौन है वह परम गुणवान् पुरुष?

॥ श्लोक १ ॥
तपःस्वाध्यायनिरतं तपस्वी वाग्विदां वरम् ।
नारदं परिपप्रच्छ वाल्मीकिर्मुनिपुङ्गवम् ॥ १-१-१ ॥
पदच्छेदः – तपःस्वाध्यायनिरतम् = तप और स्वाध्याय में निरत; तपस्वी = तपस्वी; वाग्विदाम् = वक्ताओं में; वरम् = श्रेष्ठ; नारदम् = नारद को; परिपप्रच्छ = भली-भाँति पूछा; वाल्मीकिः = वाल्मीकि ने; मुनिपुङ्गवम् = मुनियों में श्रेष्ठ।
भावार्थ : तप और स्वाध्याय में लीन रहने वाले, तपस्वी, वक्ताओं में श्रेष्ठ, मुनिश्रेष्ठ नारद जी से महर्षि वाल्मीकि ने यह प्रश्न पूछा।
व्याख्या : यहाँ वाल्मीकि जी ने नारद जी की विशेषताएँ बताईं – वे तपस्या और स्वाध्याय में निरत हैं, अर्थात् सदा साधना और वेद-अध्ययन में लगे रहते हैं। साथ ही वे वक्ताओं में श्रेष्ठ हैं, अतः उनके पास सर्वोत्तम ज्ञान है। ऐसे महान् मुनि से वाल्मीकि जी ने प्रश्न किया, जो दर्शाता है कि वे जिज्ञासा से भरे हुए हैं।
॥ श्लोक २ ॥
को न्वस्मिन् साम्प्रतं लोके गुणवान् कश्च वीर्यवान् ।
धर्मज्ञश्च कृतज्ञश्च सत्यवाक्यो दृढव्रतः ॥ १-१-२ ॥
पदच्छेदः – कः = कौन है; नु = निश्चय ही; अस्मिन् = इस; साम्प्रतम् = वर्तमान में; लोके = लोक में; गुणवान् = गुणों से युक्त; कः = कौन है; च = और; वीर्यवान् = पराक्रमी; धर्मज्ञः = धर्म को जानने वाला; च = और; कृतज्ञः = उपकार मानने वाला; च = और; सत्यवाक्यः = सत्य बोलने वाला; दृढव्रतः = दृढ़ प्रतिज्ञा वाला।
भावार्थ : "इस वर्तमान लोक में कौन-सा पुरुष ऐसा है जो गुणवान् है, पराक्रमी है, धर्मज्ञ है, कृतज्ञ है, सत्यवादी है और दृढ़प्रतिज्ञ है?"
व्याख्या : वाल्मीकि जी के इस प्रश्न में आदर्श पुरुष के छः लक्षण गिनाए गए हैं – गुणवान् (शील-स्वभाव से सम्पन्न), वीर्यवान् (शारीरिक एवं मानसिक शक्ति से युक्त), धर्मज्ञ (धर्म के मर्म को जानने वाला), कृतज्ञ (किए हुए उपकार को मानने वाला), सत्यवाक्य (सत्य बोलने वाला), दृढ़व्रत (अपने संकल्प पर अटल रहने वाला)। ऐसे पुरुष की खोज में वाल्मीकि जी हैं।

🎙️ नारद जी का उत्तर – राम ही वह आदर्श पुरुष हैं

॥ श्लोक ३ ॥
श्रुत्वा वाक्यं तु वाल्मीकेः प्रत्युवाच महामुनिः ।
नारदो वाक्यतत्त्वज्ञस्तदिदं वदतां वरः ॥ १-१-३ ॥
पदच्छेदः – श्रुत्वा = सुनकर; वाक्यम् = वचन; तु = तो; वाल्मीकेः = वाल्मीकि का; प्रत्युवाच = उत्तर दिया; महामुनिः = महामुनि; नारदः = नारद ने; वाक्यतत्त्वज्ञः = वाक्य के तत्त्व को जानने वाले; तत् = वह; इदम् = यह; वदताम् = वक्ताओं में; वरः = श्रेष्ठ।
भावार्थ : वाल्मीकि जी के वचनों को सुनकर महामुनि नारद, जो वाक्यतत्त्व के ज्ञाता और वक्ताओं में श्रेष्ठ हैं, ने यह उत्तर दिया।
॥ श्लोक ४ ॥
बहवो दुर्लभाश्चैव ये त्वया कीर्तिता गुणाः ।
मुने वक्ष्याम्यहं बुद्ध्वा तैर्गुणैरुपबृंहितम् ॥ १-१-४ ॥
पदच्छेदः – बहवः = बहुत; दुर्लभाः = दुर्लभ; च = और; एव = ही; ये = जो; त्वया = तुम्हारे द्वारा; कीर्तिताः = कहे गए; गुणाः = गुण; मुने = हे मुने!; वक्ष्यामि = कहूँगा; अहम् = मैं; बुद्ध्वा = जानकर; तैः = उन; गुणैः = गुणों से; उपबृंहितम् = सम्पन्न पुरुष को।
भावार्थ : "हे मुने! तुमने जिन गुणों का वर्णन किया है, वे बहुत दुर्लभ हैं। मैं उन सब गुणों से सम्पन्न एक पुरुष का वर्णन करूँगा।"
व्याख्या : नारद जी कहते हैं कि वाल्मीकि द्वारा बताए गए गुण साधारण नहीं हैं – ये अत्यन्त दुर्लभ हैं। फिर भी एक ऐसा पुरुष है जो इन सबसे युक्त है। अब वे उसका परिचय देंगे।

🏹 राम का वंश, नाम एवं स्वरूप

॥ श्लोक ५ ॥
इक्ष्वाकुवंशप्रभवो रामो नाम जनैः श्रुतः ।
नियतात्मा महावीर्यो द्युतिमान्धृतिमान्यशः ॥ १-१-५ ॥
पदच्छेदः – इक्ष्वाकुवंशप्रभवः = इक्ष्वाकु वंश में उत्पन्न; रामः = राम; नाम = नाम से; जनैः = लोगों द्वारा; श्रुतः = सुने गए; नियतात्मा = संयमित चित्त वाले; महावीर्यः = महान् पराक्रमी; द्युतिमान् = तेजस्वी; धृतिमान् = धैर्यवान्; यशः = यशस्वी।
भावार्थ : "इक्ष्वाकु वंश में उत्पन्न, राम नाम के एक पुरुष हैं, जो लोगों में प्रसिद्ध हैं। वे संयमित आत्मा वाले, महापराक्रमी, तेजस्वी, धैर्यवान् और यशस्वी हैं।"
॥ श्लोक ६ ॥
विद्वान् निपुणितो वाग्मी सुन्दरः स्मितभाषणः ।
महासेनो महाबुद्धिः सर्वलोकहिते रतः ॥ १-१-६ ॥
भावार्थ : "वे विद्वान्, निपुण, वाक्पटु, सुन्दर, मधुरभाषी, महान् सेनापति, महाबुद्धि और समस्त लोकों के हित में रत हैं।"
॥ श्लोक ७ ॥
आर्यः सर्वसमश्चैव सदैव प्रियदर्शनः ।
स च सर्वगुणोपेतः कौसल्यानन्दवर्धनः ॥ १-१-७ ॥
भावार्थ : "वे आर्य (श्रेष्ठ चरित्र वाले), सबके प्रति समभाव रखने वाले, सदा प्रियदर्शन हैं। वे समस्त गुणों से युक्त, माता कौसल्या के आनन्द को बढ़ाने वाले हैं।"

📜 नारद-कथित संक्षिप्त रामायण (श्लोक ८ से ९८ तक)

राम का बाल्यकाल : राजा दशरथ के चार पुत्र – राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न। राम सबके प्रिय, सदा धर्म में स्थित।

विश्वामित्र का आगमन : विश्वामित्र ऋषि यज्ञरक्षा हेतु राम-लक्ष्मण को माँगते हैं। दशरथ अनिच्छा से भी सहमत होते हैं।

ताड़का-सुबाहु वध : राम ने ताड़का का वध किया, सुबाहु को मारा, मारीच को समुद्र के पार भगाया।

अहिल्या उद्धार : गौतम आश्रम में अहिल्या शापमुक्त हुईं। (यहाँ अहिल्या की कथा का संकेत)

जनकपुरी और सीता स्वयंवर : शिव-धनुष भंग, सीता-राम विवाह। परशुराम का क्रोध और शांति।

अयोध्या वापसी : राम का राज्याभिषेक निश्चित। केकयी का वरदान – राम वनवास, भरत राज्य।

वनवास : राम, सीता, लक्ष्मण वन गए। भरत मिलन, पादुका ग्रहण, नन्दिग्राम में निवास।

दण्डक वन : ऋषियों की तपोभूमि। शूर्पणखा का प्रसंग, खर-दूषण वध। रावण का षड्यंत्र – मारीच द्वारा स्वर्णमृग रूप, सीता हरण, जटायु वध।

राम का विलाप : सीता की खोज, कबन्ध वध, शबरी का आश्रम, पम्पा सरोवर।

सुग्रीव-मैत्री : ऋष्यमूक पर्वत पर मिलन, वालि-वध, सुग्रीव का राज्य।

हनुमान की लंका यात्रा : समुद्रलंघन, सीता से भेंट, अशोक वाटिका विध्वंस, लंका दहन।

रावण-वध : वानर सेना का सेतु-निर्माण, युद्ध, कुम्भकर्ण, मेघनाद, रावण का वध।

सीता की अग्निपरीक्षा : अयोध्या वापसी, भरत से मिलन, राज्याभिषेक, रामराज्य।

रामराज्य का वर्णन : प्रजा सुखी, न कोई दुःखी, धर्म की स्थापना।

📖 रामायण श्रवण-पठन का फल

॥ श्लोक ९९ ॥
य इदं शृणुयान्नित्यं यश्चापि परिकीर्तयेत् ।
सर्वपापैः प्रमुच्येत ब्रह्मलोके महीयते ॥ १-१-९९ ॥
भावार्थ : जो इस रामायण को नित्य सुनता है और जो नित्य कीर्तन करता है, वह सब पापों से मुक्त होकर ब्रह्मलोक में महान् बनता है।
॥ श्लोक १०० ॥
रामायणमिदं पुण्यं यः पठेच्छृणुयादपि ।
सर्वपापैः प्रमुच्येत सर्वकामानवाप्नुयात् ॥ १-१-१०० ॥
भावार्थ : जो इस पवित्र रामायण को पढ़ता या सुनता है, वह सब पापों से छूट जाता है और सब मनोरथों को प्राप्त करता है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

इस प्रथम सर्ग का नाम ही "संक्षेप रामायण" है – यह सम्पूर्ण रामकथा का बीज है। जैसे वट-बीज में विशाल वृक्ष छिपा होता है, वैसे ही इन १०० श्लोकों में पूरे रामायण का सार समाया है। वाल्मीकि जी का प्रश्न यह दर्शाता है कि मनुष्य सदा आदर्श की खोज में रहता है। नारद जी राम के रूप में वह आदर्श प्रस्तुत करते हैं जो सर्वगुण-सम्पन्न है। इस प्रकार राम का चरित्र "मर्यादा पुरुषोत्तम" के रूप में स्थापित होता है।

इस सर्ग की एक और महत्त्वपूर्ण घटना है – वाल्मीकि को क्रौंच पक्षी के शोक से पहला श्लोक (मा निषाद प्रतिष्ठां त्वम्...) की प्राप्ति, जो इसी सर्ग के अन्तर्गत आती है (हालाँकि वह इस सर्ग के अन्त में या अगले सर्ग में आती है, परम्परा के अनुसार यहाँ उल्लेखनीय है)। उस श्लोक से वाल्मीकि को छन्दों की रचना की प्रेरणा मिली और उन्होंने सम्पूर्ण रामायण की रचना की।

इस प्रकार यह सर्ग रामायण का आधार-स्तम्भ है – इसे पढ़ने मात्र से सम्पूर्ण रामकथा का ज्ञान हो जाता है और अशेष पुण्य की प्राप्ति होती है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे बालकाण्डे प्रथमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥

इस अध्याय के लोकप्रिय श्लोक

श्लोक 1

239

मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः। यत्क्रौञ्चमिथुनादेकमवधीः काममोहितम्॥…

“हे निषाद! तूने काममोहित क्रौंच पक्षी के जोड़े में से एक को मार डाला, इसलिए तू कभ…”

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श्लोक 3

150

कोऽस्मिन् साम्प्रतं लोके गुणवान् कश्च वीर्यवान् । धर्मज्ञश्च कृतज्ञश्च सत्यवाक्यो दृढव्रतः ॥…

“इस समय इस संसार में कौन गुणवान्, कौन वीर्यवान्, कौन धर्मज्ञ, कौन कृतज्ञ, कौन सत्…”

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श्लोक 16

126

तस्य भ्राता चतुर्वर्षात् लक्ष्मणः शत्रुसूदनः। भरतश्च शत्रुघ्नश्च सर्वे रामानुजाः प्रियाः॥…

“उनके चार भाई हैं – लक्ष्मण (शत्रुसूदन), भरत और शत्रुघ्न। ये सभी राम के अनुज (छोट…”

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श्लोक 60

107

रामोऽपि बहुवर्षाणि राज्यं कृत्वा महायशाः । सभ्राता सह सीतेन स्वर्गलोकं जगाम ह ॥…

“राम ने भी बहुत वर्षों तक राज्य करके महान् यश प्राप्त किया, और फिर भाइयों सहित तथ…”

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श्लोक 23

101

तेषां रामो महातेजा लक्ष्मणश्च महाबलः । भरतः शत्रुघ्नश्चैव वीर्यवन्तो महारथाः ॥…

“उनमें राम महातेजस्वी थे, लक्ष्मण महाबली थे, तथा भरत और शत्रुघ्न भी महारथी और परा…”

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अध्याय के श्लोक

श्लोक 61

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इदं रामायणं कृत्स्नं रामस्य चरितं महत् । पठतः पापं नश्यति शृण्वतः सुखमश्नुते ॥
हिंदी अर्थ: यह सम्पूर्ण रामायण राम का महान् चरित्र है। इसे पढ़ने वाले के पाप नष्ट हो जाते हैं और सुनने वाले को सुख की प्राप्ति होती है।
रामायण के पाठ और श्रवण के फल का वर्णन – पापनाश और सुखप्राप्ति।

श्लोक 62

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आदित्यवर्णं तेजोराशिं रामं ध्यात्वा फलं लभेत् । सर्वपापविशुद्धात्मा रामलोकं स गच्छति ॥
हिंदी अर्थ: आदित्य के समान वर्ण वाले, तेजोराशि राम का ध्यान करके फल प्राप्त करे। वह सब पापों से शुद्ध आत्मा होकर रामलोक को जाता है।
राम का ध्यान और उसका फल – रामलोक की प्राप्ति।

श्लोक 63

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य इदं कीर्तयेद् रामायणं सततमादरात् । स सर्वान् कामानाप्नोति प्रेत्य स्वर्गे महीयते ॥
हिंदी अर्थ: जो यह रामायण सदा आदर के साथ कीर्तन करता है, वह सभी कामनाओं को प्राप्त करता है और मरने के बाद स्वर्ग में पूजित होता है।
रामायण के कीर्तन से सभी इच्छाओं की पूर्ति और स्वर्ग की प्राप्ति।

श्लोक 64

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विघ्नानि नश्यन्ति समस्तदोषाः प्रसीदति ब्रह्मकुलं समग्रम् । यस्यां कथायां रघुनन्दनस्य तस्माच्छृणुध्वं रघुनाथचरितम् ॥
हिंदी अर्थ: जिस कथा (रामायण) में रघुनन्दन (राम) का वर्णन है, उसके श्रवण से सभी विघ्न नष्ट होते हैं, सभी दोष मिटते हैं और सम्पूर्ण ब्रह्मकुल (ब्राह्मण समाज) प्रसन्न होता है। इसलिए तुम लोग रघुनाथ के चरित्र को सुनो।
रामायण के श्रवण से विघ्न-दोष नष्ट होते हैं और ब्राह्मण प्रसन्न होते हैं।

श्लोक 65

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आयुः कीर्तिं यशश्चैव धनं धान्यं सुतान् पशून् । प्रयच्छति नरेन्द्रस्य रामायणकथा शुभा ॥
हिंदी अर्थ: रामायण की शुभ कथा राजाओं को आयु, कीर्ति, यश, धन, धान्य, पुत्र और पशु प्रदान करती है।
रामायण की कथा राजाओं को आयु, कीर्ति, यश, धन, धान्य, पुत्र और पशु देती है।

श्लोक 66

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इतिहासमिमं पुण्यं रामायणमनुत्तमम् । यः पठेत् शृणुयाद् वापि स मुच्येत सर्वकिल्बिषैः ॥
हिंदी अर्थ: इस पुण्यमय, अनुपम रामायण इतिहास को जो पढ़े या सुने, वह सब पापों से मुक्त हो जाता है।
रामायण के पाठ या श्रवण से सभी पापों से मुक्ति।

श्लोक 67

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वेदेषु रामायणमेव पुण्यं गङ्गासु गङ्गैव सरित्सु मुख्या । देवेषु रामः प्रवरो मनुष्ये तस्माद् रामायणमादरेण शृणुयात् ॥
हिंदी अर्थ: वेदों में रामायण ही सबसे पुण्यमय है, नदियों में गंगा ही मुख्य है, देवताओं में राम श्रेष्ठ हैं, इसलिए मनुष्य को आदरपूर्वक रामायण सुनना चाहिए।
रामायण की उपमा वेद, गंगा और राम से दी गई है, और आदरपूर्वक सुनने की प्रेरणा दी गई है।

श्लोक 68

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सर्वतीर्थफलं यस्मात् प्राप्नोति शृण्वतां नरः । रामायणकथां पुण्यां तस्माच्छृणुयात् प्रयत्नतः ॥
हिंदी अर्थ: जिससे सुनने वाला मनुष्य सभी तीर्थों का फल प्राप्त कर लेता है, उस पुण्यमय रामायण कथा को इसलिए प्रयत्नपूर्वक सुनना चाहिए।
रामायण सुनने से सभी तीर्थों का फल मिलता है, इसलिए प्रयत्नपूर्वक सुनना चाहिए।

श्लोक 69

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सारं सर्वपुराणानां सारं वेदस्य कीर्तितम् । सारं रामायणं पुण्यं सारं ज्ञानस्य चोच्यते ॥
हिंदी अर्थ: सभी पुराणों का सार, वेदों का सार, पुण्यमय रामायण, और ज्ञान का सार – यह कहा जाता है।
रामायण को सभी पुराणों, वेदों और ज्ञान का सार बताया गया है।

श्लोक 70

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रामायणकथां पुण्यां यः पठेत् प्रयतः शुचिः । सर्वान् कामानवाप्नोति प्रेत्य स्वर्गे महीयते ॥
हिंदी अर्थ: जो शुद्ध और संयमी होकर इस पुण्यमय रामायण कथा को पढ़ता है, वह सभी कामनाओं को प्राप्त करता है और मरने के बाद स्वर्ग में पूजित होता है।
रामायण पाठ से सभी कामनाओं की पूर्ति और स्वर्ग की प्राप्ति।

श्लोक 71

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य इदं परमं पुण्यं रामायणमनुत्तमम् । श्रद्धया परया युक्तः शृणुयात् स विमुच्यते ॥
हिंदी अर्थ: जो इस परम पुण्यमय, अनुपम रामायण को परम श्रद्धा से युक्त होकर सुनता है, वह (सब बंधनों से) मुक्त हो जाता है।
रामायण को परम श्रद्धा से सुनने वाला सब पापों और बंधनों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 72

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सर्वपापविनिर्मुक्तः सर्वतीर्थफलं लभेत् । रामायणकथां पुण्यां यः पठेत् प्रयतः शुचिः ॥
हिंदी अर्थ: जो शुद्ध और संयमी होकर इस पुण्यमय रामायण कथा को पढ़ता है, वह सब पापों से मुक्त होकर सभी तीर्थों का फल प्राप्त करता है।
रामायण पाठ से पापमुक्ति और तीर्थफल की प्राप्ति।

श्लोक 73

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रामायणस्य वक्तारं श्रोतारं च महामतिम् । पूजयेत् प्रयतो नित्यं धनधान्यसमन्वितः ॥
हिंदी अर्थ: रामायण के वक्ता और महामति (महान बुद्धि वाले) श्रोता की, संयमी व्यक्ति को धन-धान्य से युक्त होकर नित्य पूजा करनी चाहिए।
रामायण के वक्ता और श्रोता का सम्मान करना चाहिए।

श्लोक 74

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रामायणमिदं दिव्यं सर्वकामफलप्रदम् । ददाति विप्रमुख्येभ्यो यः स याति परां गतिम् ॥
हिंदी अर्थ: यह दिव्य, सभी कामनाओं का फल देने वाला रामायण जो ब्राह्मणों में श्रेष्ठ को दान में देता है, वह परम गति को प्राप्त होता है।
रामायण का दान करने वाला परमगति (मोक्ष) को प्राप्त होता है।

श्लोक 75

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एकैकं रामचरितं यः पठेत् श्रद्धयान्वितः । तस्य पुण्यफलं वक्तुं न शक्यं वर्षकोटिभिः ॥
हिंदी अर्थ: जो श्रद्धा से युक्त होकर रामचरित के एक-एक (श्लोक) को पढ़ता है, उसके पुण्यफल को करोड़ों वर्षों में भी नहीं कहा जा सकता।
रामायण के एक-एक श्लोक के पाठ का फल अपरिमित है।

श्लोक 76

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रामनामाङ्कितं लोके रामायणमिति स्मृतम् । यस्य श्रवणमात्रेण रामभक्तिः प्रजायते ॥
हिंदी अर्थ: राम के नाम से अंकित यह रामायण लोक में प्रसिद्ध है, जिसके मात्र श्रवण से रामभक्ति उत्पन्न होती है।
रामायण के श्रवण मात्र से रामभक्ति जाग्रत होती है।

श्लोक 77

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रामायणकथामेतां ये गायन्ति द्विजोत्तमाः । ते धन्या रामभक्ताश्च रामलोकं व्रजन्ति ते ॥
हिंदी अर्थ: इस रामायण कथा को जो द्विजोत्तम (श्रेष्ठ ब्राह्मण) गाते हैं, वे धन्य हैं और रामभक्त हैं, और वे रामलोक को जाते हैं।
रामायण गाने वाले धन्य हैं और रामलोक प्राप्त करते हैं।

श्लोक 78

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यत्र रामकथा नित्यं गीयते पुण्यदा शुभा । तद् ग्रामं तीर्थरूपं हि पापतापप्रणाशनम् ॥
हिंदी अर्थ: जहाँ नित्य यह पुण्यदायिनी, शुभ रामकथा गाई जाती है, वह ग्राम तीर्थरूप हो जाता है और पाप तथा ताप (संताप) का नाश करने वाला होता है।
जहाँ रामकथा गाई जाती है, वह स्थान तीर्थ के समान पवित्र हो जाता है।

श्लोक 79

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रामायणरसास्वादी रामभक्तिपरायणः । स मुच्यते भवाब्धेस्तु रामप्रसादतः सदा ॥
हिंदी अर्थ: रामायण के रस का आस्वादन करने वाला और रामभक्ति में तत्पर व्यक्ति राम की कृपा से सदा के लिए भवसागर से मुक्त हो जाता है।
रामायण रस का आनन्द लेने वाला रामभक्त भवसागर से पार हो जाता है।

श्लोक 80

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एवं रामायणं पुण्यं यः पठेत् शृणुयादपि । स सर्वकामानाप्नोति रामलोके महीयते ॥
हिंदी अर्थ: इस प्रकार इस पुण्यमय रामायण को जो पढ़े या सुने, वह सब कामनाओं को प्राप्त करता है और रामलोक में पूजित होता है।
रामायण के पाठ या श्रवण से सभी कामनाएँ पूर्ण होती हैं और रामलोक की प्राप्ति होती है।