संक्षेप रामायण – श्लोक 67

संस्कृत श्लोक

वेदेषु रामायणमेव पुण्यं गङ्गासु गङ्गैव सरित्सु मुख्या । देवेषु रामः प्रवरो मनुष्ये तस्माद् रामायणमादरेण शृणुयात् ॥

हिंदी अनुवाद

वेदों में रामायण ही सबसे पुण्यमय है, नदियों में गंगा ही मुख्य है, देवताओं में राम श्रेष्ठ हैं, इसलिए मनुष्य को आदरपूर्वक रामायण सुनना चाहिए।

अर्थ / व्याख्या

रामायण की उपमा वेद, गंगा और राम से दी गई है, और आदरपूर्वक सुनने की प्रेरणा दी गई है।

टिप्पणी

यह श्लोक रामायण की तुलना वेद, गंगा और राम से करता है।

॥ श्लोक ६७ – रामायण की वैदिक महिमा ॥

वेदेषु रामायणमेव पुण्यं गङ्गासु गङ्गैव सरित्सु मुख्या । देवेषु रामः प्रवरो मनुष्ये तस्माद् रामायणमादरेण शृणुयात् ॥
vedeṣu rāmāyaṇameva puṇyaṃ gaṅgāsu gaṅgaiva saritsu mukhyā | deveṣu rāmaḥ pravāro manuṣye tasmād rāmāyaṇamādareṇa śṛṇuyāt ||

🔹 हिन्दी अनुवाद : वेदों में रामायण ही सबसे पुण्यमय है, नदियों में गंगा ही मुख्य है, देवताओं में राम श्रेष्ठ हैं, इसलिए मनुष्य को आदरपूर्वक रामायण सुनना चाहिए।

🔹 English Translation : Among the Vedas, the Ramayana alone is most sacred; among rivers, the Ganga is the foremost; among gods, Rama is the best; therefore, one should listen to the Ramayana with reverence.

🔍 शब्दार्थ (Word by Word Meaning)

संस्कृतव्याकरणहिन्दी अर्थ
वेदेषुपुल्लिंग, सप्तमी बहुवचनवेदों में
रामायणम्नपुंसकलिंग, प्रथमा एकवचनरामायण
एवअव्ययही
पुण्यम्विशेषण, नपुंसकलिंग, प्रथमा एकवचनपुण्यमय
गङ्गासुस्त्रीलिंग, सप्तमी बहुवचननदियों में
गङ्गास्त्रीलिंग, प्रथमा एकवचनगंगा
एवअव्ययही
सरित्सुस्त्रीलिंग, सप्तमी बहुवचननदियों में
मुख्याविशेषण, स्त्रीलिंग, प्रथमा एकवचनमुख्य
देवेषुपुल्लिंग, सप्तमी बहुवचनदेवताओं में
रामःपुल्लिंग, प्रथमा एकवचनराम
प्रवरःविशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचनश्रेष्ठ
मनुष्येपुल्लिंग, सप्तमी एकवचनमनुष्य में
तस्मात्अव्ययइसलिए
रामायणम्नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचनरामायण को
आदरेणपुल्लिंग, तृतीया एकवचनआदर के साथ
शृणुयात्विधिलिङ्, प्रथमपुरुष एकवचन (श्रु धातु)सुनना चाहिए

📜 ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक महत्व

इस श्लोक में रामायण को वेदों के समकक्ष स्थान दिया गया है। वेदों में सबसे पुण्यमय रामायण है – यह एक अद्भुत उक्ति है। रामायण को वेदों से भी ऊपर नहीं, पर उनके तुल्य पुण्यदायी बताया गया है। गंगा को नदियों में मुख्य कहा गया है, और राम को देवताओं में श्रेष्ठ। फिर कहा गया है कि इसलिए मनुष्य को आदरपूर्वक रामायण सुनना चाहिए। यह एक न्याय (तर्क) है – जैसे गंगा सब नदियों में पुण्यदायिनी है, वैसे ही रामायण सब ग्रन्थों में पुण्यदायिनी है।

यह श्लोक रामभक्ति की पराकाष्ठा को दर्शाता है। राम को देवताओं में प्रवर कहकर उनकी सर्वोच्चता स्थापित की गई है।

आध्यात्मिक दृष्टि से, रामायण का आदरपूर्वक श्रवण करने से मनुष्य के हृदय में राम के गुणों का वास होता है, जिससे वह पवित्र हो जाता है।

॥ वेदेषु रामायणमेव पुण्यं गङ्गासु गङ्गा सरितां वरेण्या ॥

जय श्री राम 🙏