संक्षेप रामायण – श्लोक 68

संस्कृत श्लोक

सर्वतीर्थफलं यस्मात् प्राप्नोति शृण्वतां नरः । रामायणकथां पुण्यां तस्माच्छृणुयात् प्रयत्नतः ॥

हिंदी अनुवाद

जिससे सुनने वाला मनुष्य सभी तीर्थों का फल प्राप्त कर लेता है, उस पुण्यमय रामायण कथा को इसलिए प्रयत्नपूर्वक सुनना चाहिए।

अर्थ / व्याख्या

रामायण सुनने से सभी तीर्थों का फल मिलता है, इसलिए प्रयत्नपूर्वक सुनना चाहिए।

टिप्पणी

यह श्लोक रामायण श्रवण को तीर्थयात्रा के समान फलदायी बताता है।

॥ श्लोक ६८ – रामायण श्रवण से तीर्थफल ॥

सर्वतीर्थफलं यस्मात् प्राप्नोति शृण्वतां नरः । रामायणकथां पुण्यां तस्माच्छृणुयात् प्रयत्नतः ॥
sarvatīrthaphalaṃ yasmāt prāpnoti śṛṇvatāṃ naraḥ | rāmāyaṇakathāṃ puṇyāṃ tasmāc chṛṇuyāt prayatnataḥ ||

🔹 हिन्दी अनुवाद : जिससे सुनने वाला मनुष्य सभी तीर्थों का फल प्राप्त कर लेता है, उस पुण्यमय रामायण कथा को इसलिए प्रयत्नपूर्वक सुनना चाहिए।

🔹 English Translation : Since a person listening to the sacred Ramayana obtains the fruit of all pilgrimages, therefore one should listen to it attentively.

🔍 शब्दार्थ (Word by Word Meaning)

संस्कृतव्याकरणहिन्दी अर्थ
सर्वतीर्थफलम्नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचनसभी तीर्थों का फल
यस्मात्सर्वनाम, पुल्लिंग, पञ्चमी एकवचनजिससे
प्राप्नोतिलट्लकार, प्रथमपुरुष एकवचन (प्र + आप्)प्राप्त करता है
शृण्वताम्शतृप्रत्यय, पुल्लिंग, षष्ठी एकवचनसुनने वाला
नरःपुल्लिंग, प्रथमा एकवचनमनुष्य
रामायणकथाम्स्त्रीलिंग, द्वितीया एकवचनरामायण की कथा
पुण्याम्विशेषण, स्त्रीलिंग, द्वितीया एकवचनपुण्यमय
तस्मात्अव्ययइसलिए
शृणुयात्विधिलिङ्, प्रथमपुरुष एकवचन (श्रु धातु)सुनना चाहिए
प्रयत्नतःअव्ययप्रयत्नपूर्वक

📜 ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक महत्व

तीर्थयात्रा का भारतीय संस्कृति में अत्यधिक महत्व है। लोग दूर-दूर तक तीर्थों की यात्रा करते हैं, कष्ट सहते हैं, और पुण्य अर्जित करते हैं। यह श्लोक कहता है कि रामायण को सुनने मात्र से सभी तीर्थों का फल प्राप्त हो जाता है। अर्थात्, रामायण का श्रवण तीर्थयात्रा के समान ही फलदायी है, बल्कि उससे भी अधिक सुलभ है। यह उन लोगों के लिए बड़ी कृपा है जो शारीरिक रूप से यात्रा करने में असमर्थ हैं।

रामायण में राम के चरित्र का वर्णन है, जो स्वयं सभी तीर्थों के तीर्थ हैं। उनके नाम का स्मरण ही सब पापों को हर लेता है। अतः उनकी कथा का श्रवण तो और भी फलदायी है।

आध्यात्मिक दृष्टि से, तीर्थों का फल बाहरी यात्रा से मिलता है, जबकि रामायण का श्रवण आन्तरिक यात्रा है, जो अन्तश्चेतना को पवित्र करती है।

॥ रामायणश्रवणात् तीर्थफलमाप्नोति मानवः ॥

जय श्री राम 🙏