संक्षेप रामायण – श्लोक 72

संस्कृत श्लोक

सर्वपापविनिर्मुक्तः सर्वतीर्थफलं लभेत् । रामायणकथां पुण्यां यः पठेत् प्रयतः शुचिः ॥

हिंदी अनुवाद

जो शुद्ध और संयमी होकर इस पुण्यमय रामायण कथा को पढ़ता है, वह सब पापों से मुक्त होकर सभी तीर्थों का फल प्राप्त करता है।

अर्थ / व्याख्या

रामायण पाठ से पापमुक्ति और तीर्थफल की प्राप्ति।

टिप्पणी

यह श्लोक रामायण पाठ के फल को पुनः दोहराता है।

॥ श्लोक ७२ – रामायण पाठ से पापमुक्ति और तीर्थफल ॥

सर्वपापविनिर्मुक्तः सर्वतीर्थफलं लभेत् । रामायणकथां पुण्यां यः पठेत् प्रयतः शुचिः ॥
sarvapāpavinirmuktaḥ sarvatīrthaphalaṃ labhet | rāmāyaṇakathāṃ puṇyāṃ yaḥ paṭhet prayataḥ śuciḥ ||

🔹 हिन्दी अनुवाद : जो शुद्ध और संयमी होकर इस पुण्यमय रामायण कथा को पढ़ता है, वह सब पापों से मुक्त होकर सभी तीर्थों का फल प्राप्त करता है।

🔹 English Translation : He who, being pure and self-controlled, reads this sacred Ramayana, becomes freed from all sins and obtains the fruit of all pilgrimages.

🔍 शब्दार्थ (Word by Word Meaning)

संस्कृतव्याकरणहिन्दी अर्थ
सर्वपापविनिर्मुक्तःविशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचनसब पापों से मुक्त
सर्वतीर्थफलम्नपुंसकलिंग, द्वितीया एकवचनसभी तीर्थों का फल
लभेत्विधिलिङ्, प्रथमपुरुष एकवचन (लभ् धातु)प्राप्त करे
रामायणकथाम्स्त्रीलिंग, द्वितीया एकवचनरामायण की कथा
पुण्याम्विशेषण, स्त्रीलिंग, द्वितीया एकवचनपुण्यमय
यःसर्वनाम, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचनजो
पठेत्विधिलिङ्, प्रथमपुरुष एकवचन (पठ् धातु)पढ़े
प्रयतःविशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचनसंयमी
शुचिःविशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचनशुद्ध

📜 ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक महत्व

यह श्लोक रामायण पाठ के दो फल बताता है – पापों से मुक्ति और तीर्थयात्रा का फल। "सर्वपापविनिर्मुक्तः" का अर्थ है कि पाठक के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं, चाहे वे जाने-अनजाने में किए गए हों। और "सर्वतीर्थफलम्" का अर्थ है कि उसे उन सभी तीर्थों में स्नान करने का पुण्य प्राप्त हो जाता है, जिनकी यात्रा करना कठिन है। यह रामायण की महिमा को दर्शाता है।

पापों से मुक्ति का अर्थ है कि व्यक्ति के कर्मों का फल समाप्त हो जाता है और वह आगे बढ़ सकता है। तीर्थफल का अर्थ है कि उसे शारीरिक यात्रा के बिना ही तीर्थयात्रा का लाभ मिल जाता है।

आध्यात्मिक दृष्टि से, रामायण का पाठ मन को इतना पवित्र कर देता है कि बाहरी तीर्थों की आवश्यकता नहीं रहती।

॥ रामायणपाठेन पापं याति विनाशनम् ॥

जय श्री राम 🙏