संक्षेप रामायण – श्लोक 73
संस्कृत श्लोक
रामायणस्य वक्तारं श्रोतारं च महामतिम् । पूजयेत् प्रयतो नित्यं धनधान्यसमन्वितः ॥
हिंदी अनुवाद
रामायण के वक्ता और महामति (महान बुद्धि वाले) श्रोता की, संयमी व्यक्ति को धन-धान्य से युक्त होकर नित्य पूजा करनी चाहिए।
अर्थ / व्याख्या
रामायण के वक्ता और श्रोता का सम्मान करना चाहिए।
टिप्पणी
यह श्लोक रामायण के वक्ता और श्रोता के प्रति आदर का भाव व्यक्त करता है।
॥ श्लोक ७३ – रामायण के वक्ता और श्रोता का सम्मान ॥
🔹 हिन्दी अनुवाद : रामायण के वक्ता और महामति (महान बुद्धि वाले) श्रोता की, संयमी व्यक्ति को धन-धान्य से युक्त होकर नित्य पूजा करनी चाहिए।
🔹 English Translation : One should always, being self-controlled and endowed with wealth and grain, honor the reciter of the Ramayana and the listener of great intelligence.
🔍 शब्दार्थ (Word by Word Meaning)
| संस्कृत | व्याकरण | हिन्दी अर्थ |
|---|---|---|
| रामायणस्य | नपुंसकलिंग, षष्ठी एकवचन | रामायण के |
| वक्तारम् | पुल्लिंग, द्वितीया एकवचन | वक्ता की |
| श्रोतारम् | पुल्लिंग, द्वितीया एकवचन | श्रोता की |
| च | अव्यय | और |
| महामतिम् | विशेषण, पुल्लिंग, द्वितीया एकवचन | महान बुद्धि वाले |
| पूजयेत् | विधिलिङ्, प्रथमपुरुष एकवचन (पूज् धातु) | पूजा करे |
| प्रयतः | विशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन | संयमी |
| नित्यम् | अव्यय | नित्य |
| धनधान्यसमन्वितः | विशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचन | धन-धान्य से युक्त |
📜 ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक महत्व
यह श्लोक रामायण के प्रचार-प्रसार में लगे लोगों के प्रति सम्मान व्यक्त करता है। वक्ता वह है जो रामायण का पाठ करता है या उसे समझाता है। श्रोता वह है जो ध्यानपूर्वक सुनता है। दोनों ही पूजनीय हैं। यहाँ "महामतिम्" शब्द श्रोता के लिए प्रयुक्त हुआ है, जो दर्शाता है कि रामायण सुनने से बुद्धि महान हो जाती है।
इस श्लोक में यह भी निर्देश है कि संयमी व्यक्ति को चाहिए कि वह अपने धन-धान्य से इनका सम्मान करे। यह दान और सेवा की भावना को दर्शाता है। रामायण के वक्ता और श्रोता समाज के पथप्रदर्शक होते हैं, उनका आदर-सत्कार करना चाहिए।
आध्यात्मिक दृष्टि से, जो लोग रामकथा का प्रचार करते हैं, वे राम के दूत हैं। उनका सम्मान करना स्वयं राम का सम्मान करना है।
॥ वक्ता श्रोता च यत्र स्यात् तत्र सन्निहितो हरिः ॥
जय श्री राम 🙏