बाल काण्ड अध्याय 1

संक्षेप रामायण

बाल काण्ड का प्रथम सर्ग 'संक्षेप रामायण' के नाम से प्रसिद्ध है। इसमें भगवान् राम की सम्पूर्ण जीवन-गाथा का संक्षिप्त रूप में वर्णन किया गया है। यह संवाद महर्षि वाल्मीकि और देवर्षि नारद के बीच होता है, जिसमें नारद जी राम के चरित्र, गुणों एवं लीलाओं का वर्णन करते हैं। इसी सर्ग में वाल्मीकि को रामायण लिखने की प्रेरणा मिलती है।

विवरण

यह सर्ग सम्पूर्ण रामायण का सार है। प्रारम्भ में भगवान् वाल्मीकि देवर्षि नारद से पूछते हैं कि क्या इस संसार में कोई सर्वगुण सम्पन्न, पराक्रमी, धर्मज्ञ, कृतज्ञ, सत्यवादी और दृढ़प्रतिज्ञ पुरुष है? तब नारद जी श्रीराम का आदर्श चरित्र प्रस्तुत करते हैं। वे राम के जन्म, बाललीलाओं, विश्वामित्र के यज्ञ-रक्षण, सीता स्वयंवर, परशुराम से संवाद, अयोध्या वापसी, केकयी के वरदान, वनवास, दण्डक वन यात्रा, सीता हरण, सुग्रीव मैत्री, वालि वध, हनुमान की खोज, लंका दहन, रावण वध एवं अयोध्या लौटकर राज्याभिषेक तक की सम्पूर्ण कथा संक्षेप में सुनाते हैं। इस प्रकार नारद जी द्वारा वर्णित इस संक्षिप्त रामकथा को सुनकर वाल्मीकि मुनि अत्यन्त प्रसन्न होते हैं और उन्हें रामायण महाकाव्य की रचना करने की प्रेरणा मिलती है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – बालकाण्ड – सर्ग १ (संक्षेप रामायण)

ॐ श्री परमात्मने नमः
॥ अथ प्रथमः सर्गः ॥
(नारद-वाल्मीकि संवाद – संक्षेप रामायण)

❓ वाल्मीकि जी का प्रश्न – कौन है वह परम गुणवान् पुरुष?

॥ श्लोक १ ॥
तपःस्वाध्यायनिरतं तपस्वी वाग्विदां वरम् ।
नारदं परिपप्रच्छ वाल्मीकिर्मुनिपुङ्गवम् ॥ १-१-१ ॥
पदच्छेदः – तपःस्वाध्यायनिरतम् = तप और स्वाध्याय में निरत; तपस्वी = तपस्वी; वाग्विदाम् = वक्ताओं में; वरम् = श्रेष्ठ; नारदम् = नारद को; परिपप्रच्छ = भली-भाँति पूछा; वाल्मीकिः = वाल्मीकि ने; मुनिपुङ्गवम् = मुनियों में श्रेष्ठ।
भावार्थ : तप और स्वाध्याय में लीन रहने वाले, तपस्वी, वक्ताओं में श्रेष्ठ, मुनिश्रेष्ठ नारद जी से महर्षि वाल्मीकि ने यह प्रश्न पूछा।
व्याख्या : यहाँ वाल्मीकि जी ने नारद जी की विशेषताएँ बताईं – वे तपस्या और स्वाध्याय में निरत हैं, अर्थात् सदा साधना और वेद-अध्ययन में लगे रहते हैं। साथ ही वे वक्ताओं में श्रेष्ठ हैं, अतः उनके पास सर्वोत्तम ज्ञान है। ऐसे महान् मुनि से वाल्मीकि जी ने प्रश्न किया, जो दर्शाता है कि वे जिज्ञासा से भरे हुए हैं।
॥ श्लोक २ ॥
को न्वस्मिन् साम्प्रतं लोके गुणवान् कश्च वीर्यवान् ।
धर्मज्ञश्च कृतज्ञश्च सत्यवाक्यो दृढव्रतः ॥ १-१-२ ॥
पदच्छेदः – कः = कौन है; नु = निश्चय ही; अस्मिन् = इस; साम्प्रतम् = वर्तमान में; लोके = लोक में; गुणवान् = गुणों से युक्त; कः = कौन है; च = और; वीर्यवान् = पराक्रमी; धर्मज्ञः = धर्म को जानने वाला; च = और; कृतज्ञः = उपकार मानने वाला; च = और; सत्यवाक्यः = सत्य बोलने वाला; दृढव्रतः = दृढ़ प्रतिज्ञा वाला।
भावार्थ : "इस वर्तमान लोक में कौन-सा पुरुष ऐसा है जो गुणवान् है, पराक्रमी है, धर्मज्ञ है, कृतज्ञ है, सत्यवादी है और दृढ़प्रतिज्ञ है?"
व्याख्या : वाल्मीकि जी के इस प्रश्न में आदर्श पुरुष के छः लक्षण गिनाए गए हैं – गुणवान् (शील-स्वभाव से सम्पन्न), वीर्यवान् (शारीरिक एवं मानसिक शक्ति से युक्त), धर्मज्ञ (धर्म के मर्म को जानने वाला), कृतज्ञ (किए हुए उपकार को मानने वाला), सत्यवाक्य (सत्य बोलने वाला), दृढ़व्रत (अपने संकल्प पर अटल रहने वाला)। ऐसे पुरुष की खोज में वाल्मीकि जी हैं।

🎙️ नारद जी का उत्तर – राम ही वह आदर्श पुरुष हैं

॥ श्लोक ३ ॥
श्रुत्वा वाक्यं तु वाल्मीकेः प्रत्युवाच महामुनिः ।
नारदो वाक्यतत्त्वज्ञस्तदिदं वदतां वरः ॥ १-१-३ ॥
पदच्छेदः – श्रुत्वा = सुनकर; वाक्यम् = वचन; तु = तो; वाल्मीकेः = वाल्मीकि का; प्रत्युवाच = उत्तर दिया; महामुनिः = महामुनि; नारदः = नारद ने; वाक्यतत्त्वज्ञः = वाक्य के तत्त्व को जानने वाले; तत् = वह; इदम् = यह; वदताम् = वक्ताओं में; वरः = श्रेष्ठ।
भावार्थ : वाल्मीकि जी के वचनों को सुनकर महामुनि नारद, जो वाक्यतत्त्व के ज्ञाता और वक्ताओं में श्रेष्ठ हैं, ने यह उत्तर दिया।
॥ श्लोक ४ ॥
बहवो दुर्लभाश्चैव ये त्वया कीर्तिता गुणाः ।
मुने वक्ष्याम्यहं बुद्ध्वा तैर्गुणैरुपबृंहितम् ॥ १-१-४ ॥
पदच्छेदः – बहवः = बहुत; दुर्लभाः = दुर्लभ; च = और; एव = ही; ये = जो; त्वया = तुम्हारे द्वारा; कीर्तिताः = कहे गए; गुणाः = गुण; मुने = हे मुने!; वक्ष्यामि = कहूँगा; अहम् = मैं; बुद्ध्वा = जानकर; तैः = उन; गुणैः = गुणों से; उपबृंहितम् = सम्पन्न पुरुष को।
भावार्थ : "हे मुने! तुमने जिन गुणों का वर्णन किया है, वे बहुत दुर्लभ हैं। मैं उन सब गुणों से सम्पन्न एक पुरुष का वर्णन करूँगा।"
व्याख्या : नारद जी कहते हैं कि वाल्मीकि द्वारा बताए गए गुण साधारण नहीं हैं – ये अत्यन्त दुर्लभ हैं। फिर भी एक ऐसा पुरुष है जो इन सबसे युक्त है। अब वे उसका परिचय देंगे।

🏹 राम का वंश, नाम एवं स्वरूप

॥ श्लोक ५ ॥
इक्ष्वाकुवंशप्रभवो रामो नाम जनैः श्रुतः ।
नियतात्मा महावीर्यो द्युतिमान्धृतिमान्यशः ॥ १-१-५ ॥
पदच्छेदः – इक्ष्वाकुवंशप्रभवः = इक्ष्वाकु वंश में उत्पन्न; रामः = राम; नाम = नाम से; जनैः = लोगों द्वारा; श्रुतः = सुने गए; नियतात्मा = संयमित चित्त वाले; महावीर्यः = महान् पराक्रमी; द्युतिमान् = तेजस्वी; धृतिमान् = धैर्यवान्; यशः = यशस्वी।
भावार्थ : "इक्ष्वाकु वंश में उत्पन्न, राम नाम के एक पुरुष हैं, जो लोगों में प्रसिद्ध हैं। वे संयमित आत्मा वाले, महापराक्रमी, तेजस्वी, धैर्यवान् और यशस्वी हैं।"
॥ श्लोक ६ ॥
विद्वान् निपुणितो वाग्मी सुन्दरः स्मितभाषणः ।
महासेनो महाबुद्धिः सर्वलोकहिते रतः ॥ १-१-६ ॥
भावार्थ : "वे विद्वान्, निपुण, वाक्पटु, सुन्दर, मधुरभाषी, महान् सेनापति, महाबुद्धि और समस्त लोकों के हित में रत हैं।"
॥ श्लोक ७ ॥
आर्यः सर्वसमश्चैव सदैव प्रियदर्शनः ।
स च सर्वगुणोपेतः कौसल्यानन्दवर्धनः ॥ १-१-७ ॥
भावार्थ : "वे आर्य (श्रेष्ठ चरित्र वाले), सबके प्रति समभाव रखने वाले, सदा प्रियदर्शन हैं। वे समस्त गुणों से युक्त, माता कौसल्या के आनन्द को बढ़ाने वाले हैं।"

📜 नारद-कथित संक्षिप्त रामायण (श्लोक ८ से ९८ तक)

राम का बाल्यकाल : राजा दशरथ के चार पुत्र – राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न। राम सबके प्रिय, सदा धर्म में स्थित।

विश्वामित्र का आगमन : विश्वामित्र ऋषि यज्ञरक्षा हेतु राम-लक्ष्मण को माँगते हैं। दशरथ अनिच्छा से भी सहमत होते हैं।

ताड़का-सुबाहु वध : राम ने ताड़का का वध किया, सुबाहु को मारा, मारीच को समुद्र के पार भगाया।

अहिल्या उद्धार : गौतम आश्रम में अहिल्या शापमुक्त हुईं। (यहाँ अहिल्या की कथा का संकेत)

जनकपुरी और सीता स्वयंवर : शिव-धनुष भंग, सीता-राम विवाह। परशुराम का क्रोध और शांति।

अयोध्या वापसी : राम का राज्याभिषेक निश्चित। केकयी का वरदान – राम वनवास, भरत राज्य।

वनवास : राम, सीता, लक्ष्मण वन गए। भरत मिलन, पादुका ग्रहण, नन्दिग्राम में निवास।

दण्डक वन : ऋषियों की तपोभूमि। शूर्पणखा का प्रसंग, खर-दूषण वध। रावण का षड्यंत्र – मारीच द्वारा स्वर्णमृग रूप, सीता हरण, जटायु वध।

राम का विलाप : सीता की खोज, कबन्ध वध, शबरी का आश्रम, पम्पा सरोवर।

सुग्रीव-मैत्री : ऋष्यमूक पर्वत पर मिलन, वालि-वध, सुग्रीव का राज्य।

हनुमान की लंका यात्रा : समुद्रलंघन, सीता से भेंट, अशोक वाटिका विध्वंस, लंका दहन।

रावण-वध : वानर सेना का सेतु-निर्माण, युद्ध, कुम्भकर्ण, मेघनाद, रावण का वध।

सीता की अग्निपरीक्षा : अयोध्या वापसी, भरत से मिलन, राज्याभिषेक, रामराज्य।

रामराज्य का वर्णन : प्रजा सुखी, न कोई दुःखी, धर्म की स्थापना।

📖 रामायण श्रवण-पठन का फल

॥ श्लोक ९९ ॥
य इदं शृणुयान्नित्यं यश्चापि परिकीर्तयेत् ।
सर्वपापैः प्रमुच्येत ब्रह्मलोके महीयते ॥ १-१-९९ ॥
भावार्थ : जो इस रामायण को नित्य सुनता है और जो नित्य कीर्तन करता है, वह सब पापों से मुक्त होकर ब्रह्मलोक में महान् बनता है।
॥ श्लोक १०० ॥
रामायणमिदं पुण्यं यः पठेच्छृणुयादपि ।
सर्वपापैः प्रमुच्येत सर्वकामानवाप्नुयात् ॥ १-१-१०० ॥
भावार्थ : जो इस पवित्र रामायण को पढ़ता या सुनता है, वह सब पापों से छूट जाता है और सब मनोरथों को प्राप्त करता है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

इस प्रथम सर्ग का नाम ही "संक्षेप रामायण" है – यह सम्पूर्ण रामकथा का बीज है। जैसे वट-बीज में विशाल वृक्ष छिपा होता है, वैसे ही इन १०० श्लोकों में पूरे रामायण का सार समाया है। वाल्मीकि जी का प्रश्न यह दर्शाता है कि मनुष्य सदा आदर्श की खोज में रहता है। नारद जी राम के रूप में वह आदर्श प्रस्तुत करते हैं जो सर्वगुण-सम्पन्न है। इस प्रकार राम का चरित्र "मर्यादा पुरुषोत्तम" के रूप में स्थापित होता है।

इस सर्ग की एक और महत्त्वपूर्ण घटना है – वाल्मीकि को क्रौंच पक्षी के शोक से पहला श्लोक (मा निषाद प्रतिष्ठां त्वम्...) की प्राप्ति, जो इसी सर्ग के अन्तर्गत आती है (हालाँकि वह इस सर्ग के अन्त में या अगले सर्ग में आती है, परम्परा के अनुसार यहाँ उल्लेखनीय है)। उस श्लोक से वाल्मीकि को छन्दों की रचना की प्रेरणा मिली और उन्होंने सम्पूर्ण रामायण की रचना की।

इस प्रकार यह सर्ग रामायण का आधार-स्तम्भ है – इसे पढ़ने मात्र से सम्पूर्ण रामकथा का ज्ञान हो जाता है और अशेष पुण्य की प्राप्ति होती है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे बालकाण्डे प्रथमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥

इस अध्याय के लोकप्रिय श्लोक

श्लोक 1

239

मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः। यत्क्रौञ्चमिथुनादेकमवधीः काममोहितम्॥…

“हे निषाद! तूने काममोहित क्रौंच पक्षी के जोड़े में से एक को मार डाला, इसलिए तू कभ…”

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श्लोक 3

150

कोऽस्मिन् साम्प्रतं लोके गुणवान् कश्च वीर्यवान् । धर्मज्ञश्च कृतज्ञश्च सत्यवाक्यो दृढव्रतः ॥…

“इस समय इस संसार में कौन गुणवान्, कौन वीर्यवान्, कौन धर्मज्ञ, कौन कृतज्ञ, कौन सत्…”

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श्लोक 16

126

तस्य भ्राता चतुर्वर्षात् लक्ष्मणः शत्रुसूदनः। भरतश्च शत्रुघ्नश्च सर्वे रामानुजाः प्रियाः॥…

“उनके चार भाई हैं – लक्ष्मण (शत्रुसूदन), भरत और शत्रुघ्न। ये सभी राम के अनुज (छोट…”

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श्लोक 60

107

रामोऽपि बहुवर्षाणि राज्यं कृत्वा महायशाः । सभ्राता सह सीतेन स्वर्गलोकं जगाम ह ॥…

“राम ने भी बहुत वर्षों तक राज्य करके महान् यश प्राप्त किया, और फिर भाइयों सहित तथ…”

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श्लोक 23

101

तेषां रामो महातेजा लक्ष्मणश्च महाबलः । भरतः शत्रुघ्नश्चैव वीर्यवन्तो महारथाः ॥…

“उनमें राम महातेजस्वी थे, लक्ष्मण महाबली थे, तथा भरत और शत्रुघ्न भी महारथी और परा…”

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अध्याय के श्लोक

श्लोक 41

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ततो नलसेतुं बद्ध्वा रामः सुग्रीवसंयुतः । तीर्त्वा सागरमक्षोभ्यं लङ्कां प्रति ययौ तदा ॥
हिंदी अर्थ: तत्पश्चात् नल द्वारा निर्मित सेतु (पुल) को बाँधकर राम ने सुग्रीव के साथ मिलकर अक्षोभ्य सागर को पार कर लिया और तब लंका की ओर प्रस्थान किया।
राम ने वानर सेना के साथ समुद्र पर पुल बनवाकर लंका पर चढ़ाई की।

श्लोक 42

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ततो लङ्कां समासाद्य रामः सुग्रीवसंयुतः । अवरुध्य च तां लङ्कां न्यवसत्पर्वतोपमः ॥
हिंदी अर्थ: तत्पश्चात् लंका में पहुँचकर राम ने सुग्रीव के साथ मिलकर उस लंका को घेर लिया और पर्वत के समान (अडिग) होकर निवास किया।
राम और वानर सेना ने लंका को चारों ओर से घेर लिया और युद्ध की तैयारी की।

श्लोक 43

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ततो रावणसैन्यैश्च महायुद्धमवर्तत । रामस्य वानरैः सार्धं राक्षसैश्च सुदारुणम् ॥
हिंदी अर्थ: तत्पश्चात् रावण की सेना और राम के वानरों तथा राक्षसों के बीच अत्यन्त भयंकर महायुद्ध हुआ।
राम और रावण की सेनाओं के बीच भीषण युद्ध प्रारम्भ हुआ।

श्लोक 44

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तत्र कुम्भकर्णो नाम राक्षसो भीमविक्रमः । रामेण निहतो युद्धे वानरैश्च महाबलैः ॥
हिंदी अर्थ: उस युद्ध में कुम्भकर्ण नामक भीम पराक्रमी राक्षस राम द्वारा और महाबलशाली वानरों के द्वारा मारा गया।
कुम्भकर्ण का वध राम और वानरों ने मिलकर किया।

श्लोक 45

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इन्द्रजिन्नाम राक्षसो मायावी युद्धदुर्मदः । लक्ष्मणं शक्तिभिन्नाङ्गं चकार रणमूर्धनि ॥
हिंदी अर्थ: इन्द्रजित् नामक मायावी और युद्ध में दुर्मद राक्षस ने रणभूमि में लक्ष्मण को शक्ति से बींधकर उनके अंगों को पीड़ित कर दिया।
इन्द्रजित ने लक्ष्मण पर शक्ति का प्रहार किया, जिससे वे मूर्छित हो गए।

श्लोक 46

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ततो हनूमान् गत्वाशु हिमवन्तं महागिरिम् । औषधं सञ्जीवनीयमानीय प्राणमापयत् ॥
हिंदी अर्थ: तत्पश्चात् हनुमान् शीघ्र हिमालय पर्वत पर जाकर संजीवनी औषधि लाए और (लक्ष्मण को) पुनः प्राणवान् किया।
हनुमान् ने हिमालय से संजीवनी लाकर लक्ष्मण को पुनर्जीवित किया।

श्लोक 47

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ततो रावणसंग्रामे रामः सत्यपराक्रमः । रावणं सगणं हत्वा यशः प्राप महत्पुनः ॥
हिंदी अर्थ: तत्पश्चात् रावण के साथ युद्ध में सत्यपराक्रमी राम ने रावण को उसके गणों (सेना) सहित मारकर पुनः महान् यश प्राप्त किया।
राम ने रावण और उसकी सेना का वध करके महान यश प्राप्त किया।

श्लोक 48

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ततो विभीषणं राज्ये लङ्कायाः स्थापयत्प्रभुः । रामो दाशरथिः श्रीमान् सुग्रीवादिभिरन्वितः ॥
हिंदी अर्थ: तत्पश्चात् प्रभु श्रीमान् राम ने सुग्रीव आदि के साथ मिलकर विभीषण को लंका के राज्य पर स्थापित किया।
राम ने विभीषण को लंका का राजा बनाया।

श्लोक 49

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सीतां पुनरवाप्याथ रामो राजीवलोचनः । तस्याश्चाग्निपरीक्षां वै चकार स महामतिः ॥
हिंदी अर्थ: तत्पश्चात् राजीवलोचन राम ने सीता को पुनः प्राप्त करके उसकी अग्निपरीक्षा की, वे महामति थे।
राम ने सीता की अग्निपरीक्षा ली।

श्लोक 50

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ततः पुष्पकमारुह्य रामो दाशरथिर्बली । अयोध्यामागतः श्रीमान् भरतस्य प्रियंकरः ॥
हिंदी अर्थ: तत्पश्चात् बलशाली राम पुष्पक विमान पर आरूढ़ होकर अयोध्या लौटे, जो भरत को प्रिय करने वाले हैं।
राम पुष्पक विमान से अयोध्या लौटे और भरत को प्रसन्न किया।

श्लोक 51

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ततो रामोऽभिषिक्तश्च लक्ष्मणेन सहानघः । राज्यं प्राप्य पुरीं रम्यामयोध्यां पुनरागतः ॥
हिंदी अर्थ: तत्पश्चात् निष्पाप राम ने लक्ष्मण के साथ राज्य प्राप्त करके रम्य अयोध्या पुरी में अभिषिक्त होकर प्रवेश किया।
राम का राज्याभिषेक और अयोध्या वापसी।

श्लोक 52

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रामे राज्यं प्रशासति सर्वे धर्मपरा जनाः । न च दुर्भिक्षमरकं न चौरादिभयं क्वचित् ॥
हिंदी अर्थ: जब राम राज्य का शासन कर रहे थे, सभी लोग धर्मपरायण थे। न कहीं दुर्भिक्ष (अकाल) था, न मरी (महामारी), और न चोर आदि का भय।
राम के शासनकाल में प्रजा सुखी, धर्मपरायण और सभी भयों से मुक्त थी।

श्लोक 53

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सीतायां जनसंवादो रामस्याप्यभवत्तदा । लोकापवादभीतेन सा त्यक्ता जनकात्मजा ॥
हिंदी अर्थ: उस समय सीता के विषय में जनता में संवाद (अफवाह) हुई, और लोकापवाद से भयभीत राम ने जनकात्मजा सीता का त्याग कर दिया।
राम ने लोकापवाद के भय से सीता का त्याग किया।

श्लोक 54

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ततो लक्ष्मणमाहूय रामः शोकाकुलस्तदा । गङ्गाकूले विवासाय प्रेषयामास धर्मवित् ॥
हिंदी अर्थ: तत्पश्चात् धर्मज्ञ राम ने शोकाकुल होकर लक्ष्मण को बुलाया और गंगा के तट पर निर्वासन के लिए भेज दिया।
राम ने लक्ष्मण को सीता को वन में छोड़ने का आदेश दिया।

श्लोक 55

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सा गत्वा वाल्मिकेराश्रमं शोकाकुला तदा । रामस्य चिन्तयन्ती सा न्यवसत्तापसार्चिता ॥
हिंदी अर्थ: वह (सीता) शोकाकुल होकर वाल्मीकि के आश्रम में गई और वहाँ राम का चिन्तन करती हुई, तापसों (ऋषियों) द्वारा पूजित होकर निवास करने लगी।
सीता वाल्मीकि आश्रम में रहीं और राम का ध्यान करती रहीं।

श्लोक 56

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तस्यां जज्ञातिरौ कुशौ पुत्रौ रामस्य धीमतः । वाल्मिकेः पालनां प्राप्तौ ववृधाते तपोवने ॥
हिंदी अर्थ: उस (सीता) से धीमान् राम के दो पुत्र – लव और कुश – उत्पन्न हुए। वे वाल्मीकि की पालना प्राप्त करके तपोवन में बढ़ने लगे।
सीता ने लव और कुश को जन्म दिया, जिनका पालन वाल्मीकि ने किया।

श्लोक 57

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रामस्त्वश्वमेधेन यज्ञेन यजतां वरः । इष्ट्वा बहुविधैर्यज्ञैर्ब्राह्मणैः पूजितोऽभवत् ॥
हिंदी अर्थ: राम ने यज्ञ करने वालों में श्रेष्ठ होकर अश्वमेध यज्ञ किया और अन्य बहुविध यज्ञों का अनुष्ठान करके ब्राह्मणों द्वारा पूजित हुए।
राम ने अश्वमेध और अन्य यज्ञ किए।

श्लोक 58

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लवकुशौ तु तौ वीरौ रामस्य चरितं महत् । गायन्तौ विबुधैः सार्धं रामायणमगायताम् ॥
हिंदी अर्थ: वे दोनों वीर लव और कुश राम के महान् चरित्र का गान करते हुए, विद्वानों के साथ रामायण का गायन करने लगे।
लव-कुश ने रामायण का गायन किया।

श्लोक 59

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सीता तु पुनरालक्ष्य रामस्य वचनात्तदा । भूमिं विवेश धर्मज्ञा पतिव्रतापरायणा ॥
हिंदी अर्थ: तत्पश्चात् सीता ने राम के वचन को सुनकर (या लक्ष्य करके), धर्मज्ञा और पतिव्रतापरायणा होकर भूमि में प्रवेश कर लिया।
सीता ने राम के कथन के अनुसार भूमि में समाधि ले ली।

श्लोक 60

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रामोऽपि बहुवर्षाणि राज्यं कृत्वा महायशाः । सभ्राता सह सीतेन स्वर्गलोकं जगाम ह ॥
हिंदी अर्थ: राम ने भी बहुत वर्षों तक राज्य करके महान् यश प्राप्त किया, और फिर भाइयों सहित तथा सीता के साथ (अन्त में) स्वर्गलोक को चले गए।
राम ने दीर्घकाल तक राज्य किया और अन्त में भाइयों और सीता सहित स्वर्गारोहण किया।