संक्षेप रामायण – श्लोक 41

संस्कृत श्लोक

ततो नलसेतुं बद्ध्वा रामः सुग्रीवसंयुतः । तीर्त्वा सागरमक्षोभ्यं लङ्कां प्रति ययौ तदा ॥

हिंदी अनुवाद

तत्पश्चात् नल द्वारा निर्मित सेतु (पुल) को बाँधकर राम ने सुग्रीव के साथ मिलकर अक्षोभ्य सागर को पार कर लिया और तब लंका की ओर प्रस्थान किया।

अर्थ / व्याख्या

राम ने वानर सेना के साथ समुद्र पर पुल बनवाकर लंका पर चढ़ाई की।

टिप्पणी

इस श्लोक में राम के समुद्र पार करने की घटना का उल्लेख है। नल नामक वानर ने विश्वकर्मा के पुत्र होने के कारण सेतु का निर्माण किया।

॥ श्लोक ४१ – नलसेतु निर्माण और समुद्र पार करना ॥

ततो नलसेतुं बद्ध्वा रामः सुग्रीवसंयुतः । तीर्त्वा सागरमक्षोभ्यं लङ्कां प्रति ययौ तदा ॥
tato nalasetuṃ baddhvā rāmaḥ sugrīvasaṃyutaḥ | tīrtvā sāgaramakṣobhyaṃ laṅkāṃ prati yayau tadā ||

🔹 हिन्दी अनुवाद : तत्पश्चात् नल द्वारा निर्मित सेतु (पुल) को बाँधकर राम ने सुग्रीव के साथ मिलकर अक्षोभ्य सागर को पार कर लिया और तब लंका की ओर प्रस्थान किया।

🔹 English Translation : Then, having built the bridge (constructed by Nala), Rama along with Sugriva crossed the unagitated ocean and proceeded towards Lanka.

🔍 शब्दार्थ (Word by Word Meaning)

संस्कृतव्याकरणहिन्दी अर्थ
ततःअव्ययतत्पश्चात्
नलसेतुम्पुल्लिंग, द्वितीया एकवचन (नल + सेतु)नल द्वारा निर्मित सेतु को
बद्ध्वाल्यबन्त अव्यय (बन्ध् धातु)बाँधकर
रामःपुल्लिंग, प्रथमा एकवचनराम
सुग्रीवसंयुतःविशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचनसुग्रीव के साथ संयुक्त
तीर्त्वाल्यबन्त अव्यय (तॄ धातु)पार करके
सागरम्पुल्लिंग, द्वितीया एकवचनसमुद्र को
अक्षोभ्यम्विशेषण, पुल्लिंग, द्वितीया एकवचनअक्षोभ्य (जिसे क्षोभित न किया गया हो)
लङ्काम्स्त्रीलिंग, द्वितीया एकवचनलंका
प्रतिअव्ययकी ओर
ययौलिट्लकार, प्रथमपुरुष एकवचन (या धातु)गए
तदाअव्ययतब

📜 ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक महत्व

यह श्लोक रामायण के उस महत्वपूर्ण प्रसंग का सार है जब राम की वानर सेना ने समुद्र पर पुल का निर्माण किया और लंका पर चढ़ाई की। पुल का निर्माण नल नामक वानर ने किया था, जो विश्वकर्मा के पुत्र थे। उन्होंने वरदान प्राप्त किया था कि जो पत्थर उनके हाथ से छूटेगा, वह पानी पर नहीं डूबेगा। इस प्रकार वानरों ने पत्थरों पर नल के नाम लिखकर समुद्र में डाले और पुल बन गया। यह पुल रामेश्वरम (धनुषकोडि) से लंका (श्रीलंका) तक बना था। आज भी यह स्थल धार्मिक आस्था का केंद्र है और इसे "रामसेतु" या "एडम्स ब्रिज" कहा जाता है। वैज्ञानिक दृष्टि से भी यह माना जाता है कि यहाँ एक प्राचीन प्राकृतिक सेतु था, जिसे रामकाल में सुधारा गया होगा।

राम का समुद्र पार करना उनके अदम्य साहस और दृढ़ संकल्प को दर्शाता है। उन्होंने तीन दिनों तक समुद्र से प्रार्थना की, किन्तु जब समुद्र ने उत्तर नहीं दिया, तो उन्होंने क्रोधित होकर बाण चढ़ा लिया। तब समुद्र ने प्रकट होकर क्षमा माँगी और सेतु निर्माण का उपाय बताया। यह घटना धर्म और सत्य के प्रति राम की प्रतिबद्धता को दर्शाती है।

आध्यात्मिक दृष्टि से, समुद्र संसार-सागर का प्रतीक है, जिसे पार करने के लिए सद्गुरु (नल) के मार्गदर्शन और भक्ति (वानर सेना) की आवश्यकता होती है। सेतु साधना या भक्ति का मार्ग है, जो भवसागर को पार करने में सहायक होता है।

📖 पाठ की विधि एवं लाभ

इस श्लोक का पाठ करने से जीवन में आने वाली बाधाओं को पार करने की शक्ति मिलती है। विशेष रूप से यात्रा या किसी कठिन कार्य से पहले इसका पाठ शुभ माना जाता है।

॥ रामसेतुः समुद्रस्य बन्धनं विजयस्य च ॥

जय श्री राम 🙏