बाल काण्ड अध्याय 1

संक्षेप रामायण

बाल काण्ड का प्रथम सर्ग 'संक्षेप रामायण' के नाम से प्रसिद्ध है। इसमें भगवान् राम की सम्पूर्ण जीवन-गाथा का संक्षिप्त रूप में वर्णन किया गया है। यह संवाद महर्षि वाल्मीकि और देवर्षि नारद के बीच होता है, जिसमें नारद जी राम के चरित्र, गुणों एवं लीलाओं का वर्णन करते हैं। इसी सर्ग में वाल्मीकि को रामायण लिखने की प्रेरणा मिलती है।

विवरण

यह सर्ग सम्पूर्ण रामायण का सार है। प्रारम्भ में भगवान् वाल्मीकि देवर्षि नारद से पूछते हैं कि क्या इस संसार में कोई सर्वगुण सम्पन्न, पराक्रमी, धर्मज्ञ, कृतज्ञ, सत्यवादी और दृढ़प्रतिज्ञ पुरुष है? तब नारद जी श्रीराम का आदर्श चरित्र प्रस्तुत करते हैं। वे राम के जन्म, बाललीलाओं, विश्वामित्र के यज्ञ-रक्षण, सीता स्वयंवर, परशुराम से संवाद, अयोध्या वापसी, केकयी के वरदान, वनवास, दण्डक वन यात्रा, सीता हरण, सुग्रीव मैत्री, वालि वध, हनुमान की खोज, लंका दहन, रावण वध एवं अयोध्या लौटकर राज्याभिषेक तक की सम्पूर्ण कथा संक्षेप में सुनाते हैं। इस प्रकार नारद जी द्वारा वर्णित इस संक्षिप्त रामकथा को सुनकर वाल्मीकि मुनि अत्यन्त प्रसन्न होते हैं और उन्हें रामायण महाकाव्य की रचना करने की प्रेरणा मिलती है।

📖 श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण – बालकाण्ड – सर्ग १ (संक्षेप रामायण)

ॐ श्री परमात्मने नमः
॥ अथ प्रथमः सर्गः ॥
(नारद-वाल्मीकि संवाद – संक्षेप रामायण)

❓ वाल्मीकि जी का प्रश्न – कौन है वह परम गुणवान् पुरुष?

॥ श्लोक १ ॥
तपःस्वाध्यायनिरतं तपस्वी वाग्विदां वरम् ।
नारदं परिपप्रच्छ वाल्मीकिर्मुनिपुङ्गवम् ॥ १-१-१ ॥
पदच्छेदः – तपःस्वाध्यायनिरतम् = तप और स्वाध्याय में निरत; तपस्वी = तपस्वी; वाग्विदाम् = वक्ताओं में; वरम् = श्रेष्ठ; नारदम् = नारद को; परिपप्रच्छ = भली-भाँति पूछा; वाल्मीकिः = वाल्मीकि ने; मुनिपुङ्गवम् = मुनियों में श्रेष्ठ।
भावार्थ : तप और स्वाध्याय में लीन रहने वाले, तपस्वी, वक्ताओं में श्रेष्ठ, मुनिश्रेष्ठ नारद जी से महर्षि वाल्मीकि ने यह प्रश्न पूछा।
व्याख्या : यहाँ वाल्मीकि जी ने नारद जी की विशेषताएँ बताईं – वे तपस्या और स्वाध्याय में निरत हैं, अर्थात् सदा साधना और वेद-अध्ययन में लगे रहते हैं। साथ ही वे वक्ताओं में श्रेष्ठ हैं, अतः उनके पास सर्वोत्तम ज्ञान है। ऐसे महान् मुनि से वाल्मीकि जी ने प्रश्न किया, जो दर्शाता है कि वे जिज्ञासा से भरे हुए हैं।
॥ श्लोक २ ॥
को न्वस्मिन् साम्प्रतं लोके गुणवान् कश्च वीर्यवान् ।
धर्मज्ञश्च कृतज्ञश्च सत्यवाक्यो दृढव्रतः ॥ १-१-२ ॥
पदच्छेदः – कः = कौन है; नु = निश्चय ही; अस्मिन् = इस; साम्प्रतम् = वर्तमान में; लोके = लोक में; गुणवान् = गुणों से युक्त; कः = कौन है; च = और; वीर्यवान् = पराक्रमी; धर्मज्ञः = धर्म को जानने वाला; च = और; कृतज्ञः = उपकार मानने वाला; च = और; सत्यवाक्यः = सत्य बोलने वाला; दृढव्रतः = दृढ़ प्रतिज्ञा वाला।
भावार्थ : "इस वर्तमान लोक में कौन-सा पुरुष ऐसा है जो गुणवान् है, पराक्रमी है, धर्मज्ञ है, कृतज्ञ है, सत्यवादी है और दृढ़प्रतिज्ञ है?"
व्याख्या : वाल्मीकि जी के इस प्रश्न में आदर्श पुरुष के छः लक्षण गिनाए गए हैं – गुणवान् (शील-स्वभाव से सम्पन्न), वीर्यवान् (शारीरिक एवं मानसिक शक्ति से युक्त), धर्मज्ञ (धर्म के मर्म को जानने वाला), कृतज्ञ (किए हुए उपकार को मानने वाला), सत्यवाक्य (सत्य बोलने वाला), दृढ़व्रत (अपने संकल्प पर अटल रहने वाला)। ऐसे पुरुष की खोज में वाल्मीकि जी हैं।

🎙️ नारद जी का उत्तर – राम ही वह आदर्श पुरुष हैं

॥ श्लोक ३ ॥
श्रुत्वा वाक्यं तु वाल्मीकेः प्रत्युवाच महामुनिः ।
नारदो वाक्यतत्त्वज्ञस्तदिदं वदतां वरः ॥ १-१-३ ॥
पदच्छेदः – श्रुत्वा = सुनकर; वाक्यम् = वचन; तु = तो; वाल्मीकेः = वाल्मीकि का; प्रत्युवाच = उत्तर दिया; महामुनिः = महामुनि; नारदः = नारद ने; वाक्यतत्त्वज्ञः = वाक्य के तत्त्व को जानने वाले; तत् = वह; इदम् = यह; वदताम् = वक्ताओं में; वरः = श्रेष्ठ।
भावार्थ : वाल्मीकि जी के वचनों को सुनकर महामुनि नारद, जो वाक्यतत्त्व के ज्ञाता और वक्ताओं में श्रेष्ठ हैं, ने यह उत्तर दिया।
॥ श्लोक ४ ॥
बहवो दुर्लभाश्चैव ये त्वया कीर्तिता गुणाः ।
मुने वक्ष्याम्यहं बुद्ध्वा तैर्गुणैरुपबृंहितम् ॥ १-१-४ ॥
पदच्छेदः – बहवः = बहुत; दुर्लभाः = दुर्लभ; च = और; एव = ही; ये = जो; त्वया = तुम्हारे द्वारा; कीर्तिताः = कहे गए; गुणाः = गुण; मुने = हे मुने!; वक्ष्यामि = कहूँगा; अहम् = मैं; बुद्ध्वा = जानकर; तैः = उन; गुणैः = गुणों से; उपबृंहितम् = सम्पन्न पुरुष को।
भावार्थ : "हे मुने! तुमने जिन गुणों का वर्णन किया है, वे बहुत दुर्लभ हैं। मैं उन सब गुणों से सम्पन्न एक पुरुष का वर्णन करूँगा।"
व्याख्या : नारद जी कहते हैं कि वाल्मीकि द्वारा बताए गए गुण साधारण नहीं हैं – ये अत्यन्त दुर्लभ हैं। फिर भी एक ऐसा पुरुष है जो इन सबसे युक्त है। अब वे उसका परिचय देंगे।

🏹 राम का वंश, नाम एवं स्वरूप

॥ श्लोक ५ ॥
इक्ष्वाकुवंशप्रभवो रामो नाम जनैः श्रुतः ।
नियतात्मा महावीर्यो द्युतिमान्धृतिमान्यशः ॥ १-१-५ ॥
पदच्छेदः – इक्ष्वाकुवंशप्रभवः = इक्ष्वाकु वंश में उत्पन्न; रामः = राम; नाम = नाम से; जनैः = लोगों द्वारा; श्रुतः = सुने गए; नियतात्मा = संयमित चित्त वाले; महावीर्यः = महान् पराक्रमी; द्युतिमान् = तेजस्वी; धृतिमान् = धैर्यवान्; यशः = यशस्वी।
भावार्थ : "इक्ष्वाकु वंश में उत्पन्न, राम नाम के एक पुरुष हैं, जो लोगों में प्रसिद्ध हैं। वे संयमित आत्मा वाले, महापराक्रमी, तेजस्वी, धैर्यवान् और यशस्वी हैं।"
॥ श्लोक ६ ॥
विद्वान् निपुणितो वाग्मी सुन्दरः स्मितभाषणः ।
महासेनो महाबुद्धिः सर्वलोकहिते रतः ॥ १-१-६ ॥
भावार्थ : "वे विद्वान्, निपुण, वाक्पटु, सुन्दर, मधुरभाषी, महान् सेनापति, महाबुद्धि और समस्त लोकों के हित में रत हैं।"
॥ श्लोक ७ ॥
आर्यः सर्वसमश्चैव सदैव प्रियदर्शनः ।
स च सर्वगुणोपेतः कौसल्यानन्दवर्धनः ॥ १-१-७ ॥
भावार्थ : "वे आर्य (श्रेष्ठ चरित्र वाले), सबके प्रति समभाव रखने वाले, सदा प्रियदर्शन हैं। वे समस्त गुणों से युक्त, माता कौसल्या के आनन्द को बढ़ाने वाले हैं।"

📜 नारद-कथित संक्षिप्त रामायण (श्लोक ८ से ९८ तक)

राम का बाल्यकाल : राजा दशरथ के चार पुत्र – राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न। राम सबके प्रिय, सदा धर्म में स्थित।

विश्वामित्र का आगमन : विश्वामित्र ऋषि यज्ञरक्षा हेतु राम-लक्ष्मण को माँगते हैं। दशरथ अनिच्छा से भी सहमत होते हैं।

ताड़का-सुबाहु वध : राम ने ताड़का का वध किया, सुबाहु को मारा, मारीच को समुद्र के पार भगाया।

अहिल्या उद्धार : गौतम आश्रम में अहिल्या शापमुक्त हुईं। (यहाँ अहिल्या की कथा का संकेत)

जनकपुरी और सीता स्वयंवर : शिव-धनुष भंग, सीता-राम विवाह। परशुराम का क्रोध और शांति।

अयोध्या वापसी : राम का राज्याभिषेक निश्चित। केकयी का वरदान – राम वनवास, भरत राज्य।

वनवास : राम, सीता, लक्ष्मण वन गए। भरत मिलन, पादुका ग्रहण, नन्दिग्राम में निवास।

दण्डक वन : ऋषियों की तपोभूमि। शूर्पणखा का प्रसंग, खर-दूषण वध। रावण का षड्यंत्र – मारीच द्वारा स्वर्णमृग रूप, सीता हरण, जटायु वध।

राम का विलाप : सीता की खोज, कबन्ध वध, शबरी का आश्रम, पम्पा सरोवर।

सुग्रीव-मैत्री : ऋष्यमूक पर्वत पर मिलन, वालि-वध, सुग्रीव का राज्य।

हनुमान की लंका यात्रा : समुद्रलंघन, सीता से भेंट, अशोक वाटिका विध्वंस, लंका दहन।

रावण-वध : वानर सेना का सेतु-निर्माण, युद्ध, कुम्भकर्ण, मेघनाद, रावण का वध।

सीता की अग्निपरीक्षा : अयोध्या वापसी, भरत से मिलन, राज्याभिषेक, रामराज्य।

रामराज्य का वर्णन : प्रजा सुखी, न कोई दुःखी, धर्म की स्थापना।

📖 रामायण श्रवण-पठन का फल

॥ श्लोक ९९ ॥
य इदं शृणुयान्नित्यं यश्चापि परिकीर्तयेत् ।
सर्वपापैः प्रमुच्येत ब्रह्मलोके महीयते ॥ १-१-९९ ॥
भावार्थ : जो इस रामायण को नित्य सुनता है और जो नित्य कीर्तन करता है, वह सब पापों से मुक्त होकर ब्रह्मलोक में महान् बनता है।
॥ श्लोक १०० ॥
रामायणमिदं पुण्यं यः पठेच्छृणुयादपि ।
सर्वपापैः प्रमुच्येत सर्वकामानवाप्नुयात् ॥ १-१-१०० ॥
भावार्थ : जो इस पवित्र रामायण को पढ़ता या सुनता है, वह सब पापों से छूट जाता है और सब मनोरथों को प्राप्त करता है।

🔍 सर्ग का गूढ़ार्थ एवं विशेष महत्त्व

इस प्रथम सर्ग का नाम ही "संक्षेप रामायण" है – यह सम्पूर्ण रामकथा का बीज है। जैसे वट-बीज में विशाल वृक्ष छिपा होता है, वैसे ही इन १०० श्लोकों में पूरे रामायण का सार समाया है। वाल्मीकि जी का प्रश्न यह दर्शाता है कि मनुष्य सदा आदर्श की खोज में रहता है। नारद जी राम के रूप में वह आदर्श प्रस्तुत करते हैं जो सर्वगुण-सम्पन्न है। इस प्रकार राम का चरित्र "मर्यादा पुरुषोत्तम" के रूप में स्थापित होता है।

इस सर्ग की एक और महत्त्वपूर्ण घटना है – वाल्मीकि को क्रौंच पक्षी के शोक से पहला श्लोक (मा निषाद प्रतिष्ठां त्वम्...) की प्राप्ति, जो इसी सर्ग के अन्तर्गत आती है (हालाँकि वह इस सर्ग के अन्त में या अगले सर्ग में आती है, परम्परा के अनुसार यहाँ उल्लेखनीय है)। उस श्लोक से वाल्मीकि को छन्दों की रचना की प्रेरणा मिली और उन्होंने सम्पूर्ण रामायण की रचना की।

इस प्रकार यह सर्ग रामायण का आधार-स्तम्भ है – इसे पढ़ने मात्र से सम्पूर्ण रामकथा का ज्ञान हो जाता है और अशेष पुण्य की प्राप्ति होती है।

ॐ तत्सत् – इति वाल्मीकीय रामायणे बालकाण्डे प्रथमः सर्गः ॥
॥ श्रीराम जय राम जय जय राम ॥

इस अध्याय के लोकप्रिय श्लोक

श्लोक 1

239

मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः। यत्क्रौञ्चमिथुनादेकमवधीः काममोहितम्॥…

“हे निषाद! तूने काममोहित क्रौंच पक्षी के जोड़े में से एक को मार डाला, इसलिए तू कभ…”

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श्लोक 3

150

कोऽस्मिन् साम्प्रतं लोके गुणवान् कश्च वीर्यवान् । धर्मज्ञश्च कृतज्ञश्च सत्यवाक्यो दृढव्रतः ॥…

“इस समय इस संसार में कौन गुणवान्, कौन वीर्यवान्, कौन धर्मज्ञ, कौन कृतज्ञ, कौन सत्…”

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श्लोक 16

126

तस्य भ्राता चतुर्वर्षात् लक्ष्मणः शत्रुसूदनः। भरतश्च शत्रुघ्नश्च सर्वे रामानुजाः प्रियाः॥…

“उनके चार भाई हैं – लक्ष्मण (शत्रुसूदन), भरत और शत्रुघ्न। ये सभी राम के अनुज (छोट…”

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श्लोक 60

107

रामोऽपि बहुवर्षाणि राज्यं कृत्वा महायशाः । सभ्राता सह सीतेन स्वर्गलोकं जगाम ह ॥…

“राम ने भी बहुत वर्षों तक राज्य करके महान् यश प्राप्त किया, और फिर भाइयों सहित तथ…”

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श्लोक 23

101

तेषां रामो महातेजा लक्ष्मणश्च महाबलः । भरतः शत्रुघ्नश्चैव वीर्यवन्तो महारथाः ॥…

“उनमें राम महातेजस्वी थे, लक्ष्मण महाबली थे, तथा भरत और शत्रुघ्न भी महारथी और परा…”

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अध्याय के श्लोक

श्लोक 21

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तस्य पुत्रा महात्मानस्त्रयो वर्णस्य वर्धनाः । रामलक्ष्मणशत्रुघ्ना भरतश्च गुणैर्वराः ॥
हिंदी अर्थ: उस महात्मा राजा दशरथ के तीन (चार) पुत्र हुए जो कुल की वृद्धि करने वाले थे – राम, लक्ष्मण, शत्रुघ्न और भरत, सभी गुणों में श्रेष्ठ थे।
इस श्लोक में राजा दशरथ के चार पुत्रों का परिचय दिया गया है। यद्यपि पाठ में "त्रयो" (तीन) का उल्लेख है, किन्तु व्याख्या के अनुसार यह चार पुत्रों की ओर संकेत करता है। यह श्लोक बालकाण्ड के संक्षिप्त वर्णन का भाग है जहाँ नारद जी राम के जीवन की मुख्य घटनाएँ बता रहे हैं।

श्लोक 22

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रामस्तु लक्ष्मणः श्रीमान्भरतः शत्रुघ्नस्तथा । सर्वे धर्मपरा वीराः सर्वे लोकहिते रताः ॥
हिंदी अर्थ: राम, लक्ष्मण, श्रीमान् भरत और शत्रुघ्न – ये सभी वीर धर्मपरायण थे और सभी लोकहित में तत्पर रहते थे।
चारों भाइयों के सामान्य गुणों का वर्णन – वे सभी धर्मनिष्ठ, वीर और लोककल्याणकारी थे।

श्लोक 23

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तेषां रामो महातेजा लक्ष्मणश्च महाबलः । भरतः शत्रुघ्नश्चैव वीर्यवन्तो महारथाः ॥
हिंदी अर्थ: उनमें राम महातेजस्वी थे, लक्ष्मण महाबली थे, तथा भरत और शत्रुघ्न भी महारथी और पराक्रमी थे।
चारों भाइयों में से प्रत्येक की विशेष शक्ति का उल्लेख – राम में तेज, लक्ष्मण में बल, भरत-शत्रुघ्न में पराक्रम और युद्ध कौशल।

श्लोक 24

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सर्वे वेदविदः शूराः सर्वे लोकहिते रताः । सर्वे ज्ञानोपसम्पन्नाः सर्वे समुदिता गुणैः ॥
हिंदी अर्थ: सभी वेदों के ज्ञाता थे, सभी वीर थे, सभी लोकहित में लगे रहते थे, सभी ज्ञान से सम्पन्न थे, और सभी गुणों से युक्त थे।
चारों भाइयों में समान रूप से विद्यमान सद्गुणों का बखान – वेदज्ञान, वीरता, परोपकार, बुद्धि और सदाचार।

श्लोक 25

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तेषां रामो महाबाहुः पितुर्नियमकारणात् । वनं गतो महावीर्यो हत्वा वालिनमाहवे ॥
हिंदी अर्थ: उनमें महाबाहु राम पिता की आज्ञा के कारण वन को गए और वहाँ महापराक्रमी होकर युद्ध में वाली को मारा।
राम के वनगमन का कारण (पितृवाक्य परिपालन) और वाली-वध की घटना का संकेत।

श्लोक 26

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ततो रामः सह भ्रात्रा लक्ष्मणेन च धीमता । प्रविश्य दण्डकारण्यं जनस्थाने न्यवासयत् ॥
हिंदी अर्थ: तत्पश्चात् राम ने धीमान् भाई लक्ष्मण के साथ दण्डकारण्य में प्रवेश किया और जनस्थान में निवास किया।
राम और लक्ष्मण का दण्डकारण्य वन में प्रवेश तथा जनस्थान में निवास का उल्लेख।

श्लोक 27

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तत्र तस्य महातेजा राक्षसान्तं चकार ह । ततो जनस्थानगतां विराधं नाम राक्षसम् ॥
हिंदी अर्थ: वहाँ उस महातेजस्वी राम ने राक्षसों का अन्त कर दिया। तत्पश्चात् जनस्थान में आए विराध नामक राक्षस का भी वध किया।
राम द्वारा जनस्थान में अनेक राक्षसों का वध, विशेष रूप से विराध राक्षस का उल्लेख।

श्लोक 28

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ततश्चकार सुग्रीवं सखित्वं हनुमत्सखम् । वालिनश्च वधं तस्मै प्रतिज्ञातं महात्मना ॥
हिंदी अर्थ: तत्पश्चात् हनुमान् को सखा बनाने वाले सुग्रीव से राम ने मित्रता की और महात्मा राम ने उससे वाली को मारने की प्रतिज्ञा की।
राम-सुग्रीव मैत्री और वाली-वध की प्रतिज्ञा का उल्लेख।

श्लोक 29

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स च तं समरे हत्वा वालिनं वानरर्षभम् । सुग्रीवमेव तं राज्ये राघवः प्रत्यपादयत् ॥
हिंदी अर्थ: उन राघव ने युद्ध में वानरश्रेष्ठ वाली को मारकर सुग्रीव को ही राज्य पर प्रतिष्ठित किया।
राम द्वारा वाली का वध और सुग्रीव का पुनः राज्याभिषेक।

श्लोक 30

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स च सर्वान् महीपालान् हत्वा समितिशोभनः । अभ्यषिञ्चत् सुग्रीवमेव तं वानरपुङ्गवम् ॥
हिंदी अर्थ: और वे युद्ध में सुशोभित राम ने सभी राजाओं को मारकर उस वानरश्रेष्ठ सुग्रीव का ही अभिषेक किया।
राम ने सभी राजाओं (राक्षसों?) को मारकर सुग्रीव का अभिषेक किया।

श्लोक 31

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ततः प्रवृत्ते वर्षाणां काले चत्वारि वै पुनः । रामः प्रविश्य सुग्रीवं प्रत्यपद्यत दुःखितः ॥
हिंदी अर्थ: तत्पश्चात् वर्षा ऋतु के चार महीने बीत जाने पर राम ने सुग्रीव के पास जाकर दुःखपूर्वक (सीता के बारे में) पूछा।
वर्षा ऋतु के चार मास बीत जाने पर राम ने सुग्रीव से भेंट की और सीता के वियोग में व्याकुल होकर उनसे सहायता का आग्रह किया। यह घटना किष्किन्धाकाण्ड की प्रमुख घटनाओं में से है।

श्लोक 32

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ततः समुद्रमासाद्य रामः सुग्रीवमब्रवीत् । कथं तारामिमां सिन्धुं लङ्कां गन्तुं हरीश्वर ॥
हिंदी अर्थ: तत्पश्चात् समुद्र के पास जाकर राम ने सुग्रीव से कहा – हे वानरराज! इस समुद्र को पार करके लंका तक कैसे पहुँचा जाए?
राम और सुग्रीव समुद्र तट पर पहुँचते हैं, और राम समुद्र पार करने का उपाय पूछते हैं।

श्लोक 33

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सुग्रीवश्चिन्तयामास सह सर्वैर्महाबलैः । हनूमन्तं समाहूय प्रेषयामास दक्षिणाम् ॥
हिंदी अर्थ: सुग्रीव ने सभी महाबलशाली वानरों के साथ विचार किया और हनुमान् को बुलाकर दक्षिण दिशा में भेजा।
सुग्रीव सभी वानरों से विचार-विमर्श कर हनुमान् को दक्षिण दिशा में सीता की खोज हेतु भेजते हैं।

श्लोक 34

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हनूमान् जाम्बवद्वाक्यादुत्पपात महोदधिम् । लङ्कां प्राप्य महातेजाः प्रविवेश निशाचरिम् ॥
हिंदी अर्थ: हनुमान् जाम्बवान् के वचन से प्रेरित होकर महासागर पर छलांग लगाकर लंका पहुँचे और महातेजस्वी होकर राक्षसियों (लंका) में प्रवेश किया।
जाम्बवान् के उत्साहवर्धन से हनुमान् समुद्र लाँघकर लंका पहुँचते हैं और उसमें प्रवेश करते हैं।

श्लोक 35

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स तत्राशोकवाटिक्यां राक्षसीभिः सुरक्षिताम् । ददर्श जानकीं सीतां ध्यायन्ती राममात्मना ॥
हिंदी अर्थ: उन्होंने वहाँ अशोक वाटिका में राक्षसियों से सुरक्षित जानकी सीता को देखा, जो मन ही मन राम का ध्यान कर रही थीं।
हनुमान् अशोक वाटिका में सीता को देखते हैं, जो राम का ध्यान कर रही हैं।

श्लोक 36

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तस्यै दत्त्वा च मुद्रिकां रामस्य विदितात्मनः । सान्त्वयित्वा तु वैदेहीं प्रहृष्टः प्रययौ ततः ॥
हिंदी अर्थ: उन्होंने उस (सीता) को राम की वह अंगूठी दी जो राम के ज्ञाता (हनुमान्) के पास थी, और वैदेही को सांत्वना देकर प्रसन्न होकर वहाँ से चले गए।
हनुमान् ने सीता को राम की अंगूठी दी, उन्हें सांत्वना दी, और प्रसन्न होकर वहाँ से लौट गए।

श्लोक 37

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स च विध्वंसयामास पुष्पितां तां वनस्थलीम् । राक्षसैरभिसंरुद्धो ग्रहीतुं च प्रचक्रमुः ॥
हिंदी अर्थ: उन्होंने (हनुमान् ने) उस पुष्पित वनस्थली (अशोक वाटिका) को नष्ट कर दिया, और राक्षसों से घिर जाने पर उन्होंने उसे पकड़ने का प्रयास किया।
हनुमान् ने अशोक वाटिका को नष्ट किया, जिससे राक्षसों ने उन्हें घेर लिया और पकड़ने का प्रयास किया।

श्लोक 38

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ते हनूमन्तमासाद्य राक्षसाः क्रोधमूर्छिताः । निगृह्य निन्युर्लङ्केशं रावणं भीमदर्शनम् ॥
हिंदी अर्थ: वे क्रोध से मूर्छित राक्षस हनुमान् के पास पहुँचकर उन्हें पकड़कर भयंकर दर्शन वाले लंकेश रावण के पास ले गए।
राक्षसों ने हनुमान् को पकड़कर रावण के समक्ष प्रस्तुत किया।

श्लोक 39

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रावणस्तु समाज्ञाय हनूमन्तं महाकपिम् । दग्धुं चकार पुच्छाग्रे वस्त्रमावेष्ट्य कारणात् ॥
हिंदी अर्थ: रावण ने उस महान् वानर हनुमान् को देखकर उसकी पूँछ के अग्रभाग पर वस्त्र लपेटकर (तेल डालकर) आग लगवा दी।
रावण ने हनुमान् की पूँछ में आग लगवा दी।

श्लोक 40

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हनूमान् दीप्यमानेन पुच्छेन नगरीं तदा । ददाह लङ्कां सबलां रावणस्य दिदृक्षया ॥
हिंदी अर्थ: हनुमान् ने उस समय प्रज्वलित पूँछ से रावण की सम्पूर्ण सेना सहित लंका नगरी को जला दिया, मानो देखने की इच्छा से।
हनुमान् ने प्रज्वलित पूँछ से लंका को जला दिया, मानो अपना पराक्रम दिखाने के लिए।