संक्षेप रामायण – श्लोक 36

संस्कृत श्लोक

तस्यै दत्त्वा च मुद्रिकां रामस्य विदितात्मनः । सान्त्वयित्वा तु वैदेहीं प्रहृष्टः प्रययौ ततः ॥

हिंदी अनुवाद

उन्होंने उस (सीता) को राम की वह अंगूठी दी जो राम के ज्ञाता (हनुमान्) के पास थी, और वैदेही को सांत्वना देकर प्रसन्न होकर वहाँ से चले गए।

अर्थ / व्याख्या

हनुमान् ने सीता को राम की अंगूठी दी, उन्हें सांत्वना दी, और प्रसन्न होकर वहाँ से लौट गए।

टिप्पणी

यह श्लोक हनुमान् और सीता के मिलन के बाद का घटनाक्रम है।

॥ श्लोक ३६ – हनुमान् का सीता को अंगूठी देना ॥

तस्यै दत्त्वा च मुद्रिकां रामस्य विदितात्मनः । सान्त्वयित्वा तु वैदेहीं प्रहृष्टः प्रययौ ततः ॥
tasyai dattvā ca mudrikāṃ rāmasya viditātmanaḥ | sāntvayitvā tu vaidehīṃ prahṛṣṭaḥ prayayau tataḥ ||

🔹 हिन्दी अनुवाद : उन्होंने उस (सीता) को राम की वह अंगूठी दी जो राम के ज्ञाता (हनुमान्) के पास थी, और वैदेही को सांत्वना देकर प्रसन्न होकर वहाँ से चले गए।

🔹 English Translation : He gave to her the ring of Rama, which was with him (Hanuman), and after consoling Vaidehi, he departed from there, delighted.

🔍 शब्दार्थ (Word by Word Meaning)

संस्कृतव्याकरणहिन्दी अर्थ
तस्यैसर्वनाम, स्त्रीलिंग, चतुर्थी एकवचनउसको (सीता को)
दत्त्वाल्यबन्त अव्यय (दा धातु)देकर
अव्ययऔर
मुद्रिकाम्स्त्रीलिंग, द्वितीया एकवचनअंगूठी
रामस्यपुल्लिंग, षष्ठी एकवचनराम की
विदितात्मनःविशेषण, पुल्लिंग, षष्ठी एकवचन (विदित + आत्मन्)ज्ञानी (हनुमान्) के पास
सान्त्वयित्वाल्यबन्त अव्यय (सान्त्वय धातु)सांत्वना देकर
तुअव्ययतो
वैदेहीम्स्त्रीलिंग, द्वितीया एकवचनवैदेही (सीता) को
प्रहृष्टःविशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचनअत्यन्त प्रसन्न
प्रययौलिट्लकार, प्रथमपुरुष एकवचन (प्र + या)चले गए
ततःअव्ययवहाँ से

📜 ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक महत्व

यह श्लोक हनुमान् और सीता के मिलन के बाद के क्षण का वर्णन करता है। हनुमान् ने सीता को राम की अंगूठी दी, जो उन्हें राम ने पहचान के लिए दी थी। सीता ने अंगूठी देखकर हनुमान् पर विश्वास किया। हनुमान् ने सीता को सांत्वना दी और बताया कि राम शीघ्र ही उन्हें छुड़ाने आएँगे। सीता ने हनुमान् को अपना चूड़ामणि दिया, जिसे वे राम को सौंपने वाले थे। यह संवाद अत्यन्त मार्मिक है और भक्त और भगवान की पत्नी के बीच आदर्श संबंध को दर्शाता है।

हनुमान् का प्रहृष्ट होना स्वाभाविक था, क्योंकि उनका मिशन सफल हो गया था। उन्होंने सीता को ढूँढ लिया था और उन्हें राम का संदेश दे दिया था। यह घटना सुन्दरकाण्ड की पराकाष्ठा है, जिसके बाद हनुमान् लंका दहन और वापसी की ओर अग्रसर होते हैं।

आध्यात्मिक दृष्टि से, अंगूठी राम-तत्व का प्रतीक है, जिसे गुरु (हनुमान्) जीवात्मा (सीता) को देता है, जिससे उसे अपने स्वामी (राम) का स्मरण होता है।

॥ रामचूड़ामणिं प्रादात् सीता हनुमते तदा ॥

जय श्री राम 🙏