संक्षेप रामायण – श्लोक 22

संस्कृत श्लोक

रामस्तु लक्ष्मणः श्रीमान्भरतः शत्रुघ्नस्तथा । सर्वे धर्मपरा वीराः सर्वे लोकहिते रताः ॥

हिंदी अनुवाद

राम, लक्ष्मण, श्रीमान् भरत और शत्रुघ्न – ये सभी वीर धर्मपरायण थे और सभी लोकहित में तत्पर रहते थे।

अर्थ / व्याख्या

चारों भाइयों के सामान्य गुणों का वर्णन – वे सभी धर्मनिष्ठ, वीर और लोककल्याणकारी थे।

टिप्पणी

इस श्लोक में राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न के सामान्य गुणों का उल्लेख है। ये सभी परम धार्मिक, वीर और सदैव प्रजा के कल्याण में लगे रहते थे।

॥ श्लोक २२ – चारों भाइयों के गुण ॥

रामस्तु लक्ष्मणः श्रीमान्भरतः शत्रुघ्नस्तथा । सर्वे धर्मपरा वीराः सर्वे लोकहिते रताः ॥
rāmastu lakṣmaṇaḥ śrīmānbharataḥ śatrughnastathā | sarve dharmaparā vīrāḥ sarve lokahite ratāḥ ||

🔹 हिन्दी अनुवाद : राम, लक्ष्मण, श्रीमान् भरत और शत्रुघ्न – ये सभी वीर धर्मपरायण थे और सभी लोकहित में तत्पर रहते थे।

🔹 English Translation : Rama, Lakshmana, glorious Bharata and Shatrughna – all were valiant, devoted to righteousness, and always engaged in the welfare of all people.

🔍 शब्दार्थ (Word by Word Meaning)

संस्कृतव्याकरणहिन्दी अर्थ
रामःपुल्लिंग, प्रथमा एकवचनराम
तुअव्ययतो, और
लक्ष्मणःपुल्लिंग, प्रथमा एकवचनलक्ष्मण
श्रीमान्विशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा एकवचनश्रीयुक्त, ऐश्वर्यवान्
भरतःपुल्लिंग, प्रथमा एकवचनभरत
शत्रुघ्नःपुल्लिंग, प्रथमा एकवचनशत्रुघ्न
तथाअव्ययइसी प्रकार
सर्वेसर्वनाम, पुल्लिंग, प्रथमा बहुवचनसभी
धर्मपराःविशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा बहुवचनधर्म का पालन करने वाले
वीराःविशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा बहुवचनवीर
सर्वेसर्वनाम, पुल्लिंग, प्रथमा बहुवचनसभी
लोकहितेनपुंसकलिंग, सप्तमी एकवचनलोक के हित में
रताःविशेषण, पुल्लिंग, प्रथमा बहुवचनलगे हुए, तत्पर

📜 ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक महत्व

यह श्लोक रामायण के उस भाग का हिस्सा है जहाँ नारद जी राम के चरित्र का वर्णन कर रहे हैं। चारों भाई अलग-अलग गुणों के धनी थे, फिर भी उनमें कुछ समान गुण थे – धर्मपरायणता, वीरता और लोकहित में तत्परता। यही कारण था कि उनके राज्य (अयोध्या) में सभी सुखी थे।

राम धर्म के मूर्तिमान स्वरूप थे, लक्ष्मण सेवा और समर्पण के प्रतीक थे, भरत न्याय और त्याग के, और शत्रुघ्न शक्ति और संयम के। फिर भी सभी में समान रूप से लोकहित की भावना थी। यह श्लोक हमें सिखाता है कि चाहे व्यक्ति का स्वभाव कैसा भी हो, उसे धर्म और परोपकार के मार्ग पर चलना चाहिए।

इस श्लोक में "श्रीमान्" विशेषण भरत के लिए प्रयुक्त हुआ है, जो उनके ऐश्वर्य और सम्पन्नता को दर्शाता है। यद्यपि भरत ने राज्य-सुख का त्याग कर दिया था, तथापि वे सदा समृद्धि के पात्र बने रहे।

📖 पाठ की विधि एवं लाभ

इस श्लोक के पाठ से मन में धर्म के प्रति श्रद्धा, वीरता का भाव और लोकसेवा की प्रेरणा मिलती है। यह श्लोक प्रातःकाल स्नान के बाद पढ़ने से विशेष लाभ होता है।

॥ सर्वे भवन्तु सुखिनः – सब सुखी हों, यही चारों भाइयों की भावना थी ॥

जय श्री राम 🙏