भक्ति रस काव्य व भजन

ऐसो को उदार जग माहीं - गोस्वामी तुलसीदास जी का प्रसिद्ध भजन

6 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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भजन का परिचय, भाव एवं भक्ति संदर्भ

गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित 'ऐसो को उदार जग माहीं' एक अत्यंत भावपूर्ण और भक्ति से ओत-प्रोत भजन है। इस भजन में तुलसीदास जी ने प्रभु श्री राम की असीम उदारता और उनकी दीन-दयालुता का गुणगान किया है। यह पद मुख्य रूप से 'विनय पत्रिका' की शैली में लिखा गया है, जहाँ भक्त अपने आराध्य के सम्मुख अपनी दीनता प्रकट करता है और प्रभु की करुणा का स्मरण करता है।

इस भजन का मुख्य भाव 'शरणागति' है। तुलसीदास जी तर्क देते हैं कि संसार में प्रभु श्री राम के समान उदार और कोई नहीं है। वे कहते हैं कि प्रभु बिना किसी सेवा या फल की अपेक्षा के ही दीन-दुखियों पर द्रवित हो जाते हैं। यह भजन हमें सिखाता है कि ईश्वर की कृपा पाने के लिए केवल अहंकार का त्याग और पूर्ण समर्पण आवश्यक है।

सम्पूर्ण मूल भजन लिरिक्स (हिंदी पाठ)

ऐसो को उदार जग माहीं।
बिनु सेवा जो द्रवै दीन पर, राम सरिस को नाहीं॥

जो गति सुर मुनि दुर्लभ चाहत, तिनको सो गति दीन्हीं।
बिल्लहुक, गीध, अजामिल, व्याध, जड़न को मुक्ति दीन्हीं॥

धनुष बाण अरु भाथा कर में, तजहु क्रोध की नाहीं।
तुलसीदास प्रभु के पद पंकज, प्रेम भक्ति मन माहीं॥

पदवार सरल हिंदी भावार्थ एवं आध्यात्मिक संदेश

प्रथम पद: तुलसीदास जी पूछते हैं कि इस संसार में प्रभु श्री राम के समान उदार और दयालु कौन है? वे कहते हैं कि बिना किसी सेवा या कर्मकांड के जो केवल दीन-दुखियों की पुकार सुनकर द्रवित हो जाए, ऐसे दयालु प्रभु के समान दूसरा कोई नहीं है।

द्वितीय पद: यहाँ भक्त उन उदाहरणों को याद करता है जिन्हें प्रभु ने तार दिया। वे कहते हैं कि जिस परम गति (मोक्ष) को पाने के लिए बड़े-बड़े मुनि और देवता तरसते हैं, प्रभु ने उसे शबरी (बिल्लहुक), जटायु (गीध), अजामिल और व्याध जैसे साधारण और पतित जीवों को सहज ही प्रदान कर दिया। यह प्रभु की अहैतुकी कृपा को दर्शाता है।

तृतीय पद: अंत में तुलसीदास जी प्रभु के स्वरूप का ध्यान करते हैं। वे कहते हैं कि प्रभु के हाथों में धनुष-बाण और तरकश (भाथा) है, जो दुष्टों के लिए काल है, परंतु वे अपने भक्तों के प्रति अत्यंत कोमल हैं। तुलसीदास जी प्रार्थना करते हैं कि उनके मन में प्रभु के चरण कमलों के प्रति अटूट प्रेम और भक्ति बनी रहे।

विशेष संदेश: यह भजन हमें याद दिलाता है कि ईश्वर के द्वार पर योग्यता नहीं, बल्कि भाव देखा जाता है। यदि आपका हृदय निर्मल है, तो प्रभु की कृपा स्वतः ही प्राप्त होती है।

गायन समय, लाभ एवं श्रवण महात्म्य

इस भजन का गायन किसी भी समय किया जा सकता है, परंतु ब्रह्म मुहूर्त या संध्या काल में इसका श्रवण मन को अत्यधिक शांति प्रदान करता है। इसे गाने से भक्त के मन में प्रभु के प्रति विश्वास दृढ़ होता है और सांसारिक चिंताओं से मुक्ति मिलती है।

इस भजन को सुनने या गाने का मुख्य लाभ 'अहंकार का नाश' है। जब हम यह अनुभव करते हैं कि प्रभु ने अजामिल जैसे पतितों को तार दिया, तो हमें अपने पापों के प्रति भय नहीं, बल्कि प्रभु की कृपा के प्रति आशा जागृत होती है। यह भजन मानसिक तनाव को कम करने और भक्ति मार्ग पर अग्रसर होने के लिए एक अचूक औषधि है।

विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 26 Sep 2026

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