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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 8 · श्लोक 20

अध्याय 8 · श्लोक 20

अक्षर ब्रह्म योग (Aksara Brahma Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात्सनातनः । यः स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति ॥ २०॥

paras tasmāt tu bhāvo 'nyo 'vyakto 'vyaktāt sanātanaḥ | yaḥ sa sarveṣu bhūteṣu naśyatsu na vinaśyati ||20||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

परः: supreme; तस्मात्: than that; तु: but; भावः: existence; अन्यः: other; अव्यक्तः: unmanifest; अव्यक्तात्: than the unmanifest; सनातनः: eternal; यः: which; सः: that; सर्वेषु भूतेषु: in all beings; नश्यत्सु: when they perish; न: not; विनश्यति: perishes.

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

किन्तु उस अव्यक्त (प्रकृति) से भी परे एक अन्य सनातन अव्यक्त भाव (तत्त्व) है, जो सब प्राणियों के नष्ट होने पर भी नष्ट नहीं होता।

English Translation

But there is another, unmanifest existence, eternal and transcending that unmanifest (the primal cause), which does not perish when all beings perish.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

यह श्लोक परमात्मा के उस परतत्त्व की ओर इशारा करता है जो प्रकृति के अव्यक्त रूप से भी परे है, जो नित्य और अविनाशी है। This verse points to the Supreme Reality that transcends even the unmanifest Prakriti, which is eternal and imperishable.
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।