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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 18 · श्लोक 24

अध्याय 18 · श्लोक 24

मोक्ष संन्यास योग (Moksha Sannyaasa Yoga) का पावन श्लोक तथा उसका विस्तृत हिंदी व अंग्रेजी अनुवाद एवं व्याख्या।

अंतिम अपडेट: 15 फरवरी, 2026

१. मूल संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verse)

यत्तु कामेप्सुना कर्म साहंकारेण वा पुनः। क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम्॥२४॥

yat tu kāme psunā karma sāhaṃkāreṇa vā punaḥ | kriyate bahulāyāsaṃ tad rājasam udāhṛtam ||24||

२. पदच्छेद एवं शब्दार्थ (Word Meanings)

यत्: which; तु: but; काम-ईप्सुना: by one desiring fruits; कर्म: action; स-अहंकारेण: with ego; वा: or; पुनः: again; क्रियते: is performed; बहुल-आयासम्: involving much effort; तत्: that; राजसम्: rajasic; उदाहृतम्: is declared.

३. श्लोक का अनुवाद (Verse Translation)

हिंदी अनुवाद

परन्तु जो कर्म फल की इच्छा वाले पुरुष द्वारा अथवा अहंकार सहित किया जाता है तथा बहुत परिश्रम साध्य है – वह राजस कहा गया है।

English Translation

That action which is performed by one desiring fruits, or with ego, and which involves much effort – that is declared to be rajasic.

४. विस्तृत व्याख्या एवं भावार्थ (Commentary)

राजस कर्म में फल की इच्छा, अहंकार और अत्यधिक परिश्रम होता है। यह कर्म कर्ता को बाँधता है, क्योंकि इसमें आसक्ति और अभिमान रहता है।
श्रीराम शास्त्री
शोधकर्ता व लेखक

श्रीराम शास्त्री

वैदिक संस्कृत और दार्शनिक साहित्य के व्याख्याता। सनातन इतिहास और प्राचीन ग्रंथों पर अनुसंधान का १०+ वर्षों का अनुभव।

आचार्य देवदत्त द्विवेदी
संपादकीय समीक्षा

आचार्य देवदत्त द्विवेदी

संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व प्राध्यापक एवं वैदिक शास्त्र विशेषज्ञ। भक्तिलोक की समस्त सामग्री के आध्यात्मिक सत्यता निरीक्षक।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।।