पौराणिक परिचय एवं आध्यात्मिक रहस्य
सनातन संस्कृति में भगवान हनुमान को अष्टचिवंजीवी, बल, बुद्धि, विद्या और पराक्रम के देवता के रूप में पूजा जाता है। हनुमान जी केवल कलिकाल में जागृत रहने वाले प्रत्यक्ष देवता ही नहीं हैं, बल्कि वे परम भक्त, रुद्रावतार और संकटमोचन भी हैं। जब भक्त अपने जीवन में विभिन्न प्रकार के भौतिक, मानसिक या आध्यात्मिक संकटों से घिर जाता है, तब भगवान हनुमान के नामों का स्मरण उसके जीवन में प्रकाश लेकर आता है। 'अष्टोत्तर शतनामावली' का अर्थ होता है किसी आराध्य देव के 108 पावन और पवित्र नाम। सनातन धर्म और पुराणों में हनुमान जी के सहस्रों नामों का वर्णन मिलता है, किंतु उनके 108 प्रमुख नामों का यह संग्रह अष्टोत्तर शतनामावली के रूप में अत्यधिक प्रसिद्ध और सिद्ध माना गया है।
इन 108 नामों का उद्गम विभिन्न पुराणों, जैसे पराशर संहिता, रुद्रयामल तंत्र, वाल्मीकि रामायण के संदर्भों और प्राचीन संतों की वाणियों से हुआ है। प्रत्येक नाम हनुमान जी के किसी विशेष गुण, उनके पराक्रम, उनकी सेवा भावना, उनके ब्रह्मचर्य, उनकी वाक्पटुता और उनके भगवान श्रीराम के प्रति अगाध प्रेम को प्रकट करता है। उदाहरण के लिए, 'आञ्जनेय' नाम उनकी माता अंजनी के पुत्र होने का बोध कराता है, तो 'महाबल' नाम उनकी उस असीम शारीरिक क्षमता को दर्शाता है जिसके बल पर उन्होंने सुमेरु पर्वत तक को हिला दिया था और लंका का दहन किया था। इसी प्रकार 'सीताशोकविनाशकाय' नाम उनकी उस करुणा को उजागर करता है जो उन्होंने अशोक वाटिका में बैठी माता सीता के दुखों को हरने के लिए दिखाई थी। इन नामों का जप करने से साधक के भीतर सात्विक ऊर्जा, आत्मविश्वास, निर्भयता और भगवद्भक्ति का संचार होता है।
आध्यात्मिक दृष्टिकोण से, हनुमान जी का हर नाम एक मंत्र की तरह कार्य करता है। जब कोई साधक पूरी श्रद्धा, शुचिता और ध्यान के साथ इन 108 नामों का उच्चारण करता है, तो उसके शरीर के चक्र जागृत होते हैं और नकारात्मक ऊर्जा का शमन होता है। विशेष रूप से राहु, केतु और शनि के कुप्रभावों से पीड़ित व्यक्तियों के लिए हनुमान जी के नामों का जप अत्यंत फलदायी माना गया है क्योंकि शनि देव ने हनुमान जी के शरणागत भक्तों को कभी भी कष्ट न देने का वचन दिया था। इस प्रकार, यह शतनामावली न केवल मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करती है, बल्कि इहलोक के सभी दुखों से मुक्ति दिलाकर साधक को अभय प्रदान करती है।
विनियोग, ध्यान एवं नामावली जप संकल्प
किसी भी देव अर्चना, स्तोत्र या शतनामावली के पाठ से पूर्व विनियोग और ध्यान का अत्यधिक महत्व होता है। विनियोग के माध्यम से हम उस मंत्र या स्तोत्र के ऋषि, छंद, देवता और उसके विनियोजन (उद्देश्य) को नमन करते हैं।
अस्य श्री हनुमान अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रमंत्रस्य श्रीरामचंद्र ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, श्रीहनुमान देवता, मरुत्सुतः इति बीजम्, अंजनीसुतः इति शक्तिः, वायुपुत्र इति कीलकम्, श्रीरामभक्त्यादि-सिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः।
ध्यानम्:
ध्यायेद्बालार्कसंकाशं जगद्व्याप्सिकरं परम्।
लोहिताक्षं त्रिनयनं कल्पद्रुमसमप्रभम्॥
उत्तुंगतुण्डशोभाढ्यं हारकेयूरभूषितम्।
कुण्डलाभ्यां प्रदीप्तस्य गण्डक्षेत्रे विराजितम्॥
गदाहस्तं च बाहुभ्यां शोभितं च जितेन्द्रियम्।
सीतासुखकरं ध्यायेद्वायुपुत्रं महाबलम्॥
इस ध्यान श्लोक का अर्थ है कि हम बालार्क (प्रातःकाल के सूर्य) के समान कांतिमान, तीनों लोकों में व्याप्त, लाल नेत्रों वाले, त्रिनयन, कल्पवृक्ष के समान फल देने वाले, कुण्डलों से शोभायमान, हाथ में गदा धारण किए हुए, जितेन्द्रिय और माता सीता को सुख प्रदान करने वाले वायुपुत्र महाबल हनुमान जी का ध्यान करते हैं। जप से पूर्व मन में यह संकल्प लेना चाहिए कि मैं अपने समस्त मानसिक विकारों, भय और कष्टों की निवृत्ति के लिए तथा श्रीराम भक्ति की प्राप्ति के लिए श्री हनुमान जी के इन 108 नामों का जाप कर रहा हूँ।
श्री हनुमान के सम्पूर्ण 108 पावन नाम (100% सम्पूर्ण 108 नामावली तालिका)
| क्र.सं. | दिव्य नाम (मंत्र रूप) | प्रमुख भावार्थ (सरल हिंदी अर्थ) |
|---|---|---|
| १ | ॐ आञ्जनेयाय नमः | माता अंजनी के पुत्र |
| २ | ॐ महाबलाय नमः | अत्यंत पराक्रमी एवं बलवान |
| ३ | ॐ सीताशोकविनाशकाय नमः | माता सीता का शोक दूर करने वाले |
| ४ | ॐ लक्ष्मणप्राणदात्रे नमः | लक्ष्मण जी के प्राण बचाने वाले (संजीवनी लाने वाले) |
| ५ | ॐ दशग्रीवकुलान्तकाय नमः | रावण के कुल का नाश करने वाले |
| ६ | ॐ महावीराय नमः | महान वीर |
| ७ | ॐ चिरंजीविने नमः | अमर (जो सदैव जीवित हैं) |
| ८ | ॐ रामभक्ताय नमः | श्रीराम के अनन्य भक्त |
| ९ | ॐ दैत्यकार्यविघातकाय नमः | राक्षसों के कार्यों को विफल करने वाले |
| १० | ॐ अक्षहन्त्रे नमः | राक्षस अक्षकुमार का वध करने वाले |
| ११ | ॐ कांचनाभताय नमः | सुवर्ण के समान कांति वाले |
| १२ | ॐ पिंगलाक्षाय नमः | पिंगल (भूरे/सुनहरे) नेत्रों वाले |
| १३ | ॐ पविप्रमाथिने नमः | वज्र के समान शरीर वाले |
| १४ | ॐ सर्वरोगहराय नमः | सभी रोगों का नाश करने वाले |
| १५ | ॐ सर्वविद्याप्रदायकाय नमः | सभी प्रकार की विद्याओं को प्रदान करने वाले |
| १६ | ॐ संकटमोचनाय नमः | संकटों से छुड़ाने वाले |
| १७ | ॐ गुरुवे नमः | सबके मार्गदर्शक एवं गुरु |
| १८ | ॐ दीनबंधवे नमः | दीनों और गरीबों के बंधु / सहायक |
| १९ | ॐ सुरारिमथनाय नमः | देवता के शत्रुओं (असुरों) को मथने वाले |
| २० | ॐ शतक्रतुप्रहर्त्रे नमः | इन्द्र के गर्व को चूर करने वाले (अथवा इन्द्र को प्रसन्न करने वाले) |
| २१ | ॐ सिंहिकासंहरणे नमः | सिंहिका राक्षसी का वध करने वाले |
| २२ | ॐ लंकाश्रितविनाशकाय नमः | लंका का आश्रय लेने वाले राक्षसों का नाश करने वाले |
| २३ | ॐ लंकारावणदाहकय नमः | लंका और रावण की सोने की लंका को जलाने वाले |
| २४ | ॐ सुग्रीवसचिवाय नमः | सुग्रीव के मंत्री एवं सलाहकार |
| २५ | ॐ धीराय नमः | धैर्यवान एवं बुद्धिमान |
| २६ | ॐ शूराय नमः | शूरवीर |
| २७ | ॐ वीराय नमः | वीरता की प्रतिमूर्ति |
| २८ | ॐ जितेन्द्रियाय नमः | इंद्रियों को जीतने वाले |
| २९ | ॐ बुद्धिमतां वरिष्ठाय नमः | बुद्धिमानों में श्रेष्ठ |
| ३० | ॐ वातात्मजाय नमः | वायुदेव के पुत्र (पवनसुत) |
| ३१ | ॐ तत्तवज्ञाननिधये नमः | तत्वज्ञान के अपार भंडार |
| ३२ | ॐ शौर्याय नमः | शौर्य के प्रतीक |
| ३३ | ॐ सुग्रीवमन्त्रिणे नमः | सुग्रीव के मंत्री |
| ३४ | ॐ भूतावासाय नमः | समस्त भूतों और प्राणियों में निवास करने वाले |
| ३५ | ॐ वाग्मिने नमः | उत्कृष्ट वक्ता (वाक्पटु) |
| ३६ | ॐ तत्वरूपिणे नमः | परमतत्व के रूप |
| ३७ | ॐ पिंगलाय नमः | पिंगल वर्ण वाले |
| ३८ | ॐ पवित्राय नमः | परम पवित्र |
| ३९ | ॐ समरप्रियकारिणे नमः | धर्मयुद्ध में प्रियता रखने वाले |
| ४0 | ॐ पुण्यकीर्तये नमः | पुण्यमयी कीर्ति वाले |
| ४१ | ॐ दयानिधये नमः | दया के सागर |
| ४२ | ॐ शान्ताय नमः | शांत स्वभाव वाले |
| ४३ | ॐ निष्कपटाय नमः | कपट रहित, सरल हृदय |
| ४४ | ॐ सत्यपराक्रमाय नमः | सत्य और अटल पराक्रम वाले |
| ४५ | ॐ बृहत्काय नमः | विशाल शरीर वाले |
| ४६ | ॐ महाकायाय नमः | विराट् स्वरूप वाले |
| ४७ | ॐ सर्वलोकचम्पकाय नमः | समस्त लोकों में पूजनीय |
| ४८ | ॐ शरणागतवत्सलाय नमः | शरण में आए हुओं से वात्सल्य रखने वाले |
| ४९ | ॐ अनादये नमः | जिनका कोई आदि (प्रारंभ) नहीं है |
| ५0 | ॐ अप्रमेयाय नमः | जिन्हें मापा न जा सके (अपरिमित) |
| ५१ | ॐ वरदाय नमः | वरदान देने वाले |
| ५२ | ॐ वायुपुत्राय नमः | पवनदेव के पुत्र |
| ५३ | ॐ अंजनीगर्भसंभूताय नमः | अंजनी माता के गर्भ से प्रकट होने वाले |
| ५४ | ॐ रामदूतस्य नमः | श्रीराम के दूत |
| ५५ | ॐ महातेजसे नमः | महान तेजपुंज वाले |
| ५६ | ॐ फाल्गुनसहाय नमः | अर्जुन (फाल्गुन) के रथ की ध्वजा पर सहायक रूप में रहने वाले |
| ५७ | ॐ पिङ्गकेशाय नमः | पिंगल रंग के बालों वाले |
| ५८ | ॐ सर्वरोगापहारकाय नमः | सभी रोगों का हरण करने वाले |
| ५९ | ॐ सर्वदुःखहराय नमः | समस्त दुखों को दूर करने वाले |
| ६0 | ॐ भूतेशानाय नमः | भूत-प्रेतों और पिशाचों के स्वामी (नियंता) |
| ६१ | ॐ भूतचेष्टाविनाशकाय नमः | नकारात्मक शक्तियों एवं बाधाओं का नाश करने वाले |
| ६२ | ॐ पिशाचगणसंहर्त्रे नमः | पिशाच गणों का संहार करने वाले |
| ६३ | ॐ बालार्कसदृशप्रभाय नमः | प्रातःकालीन सूर्य के समान कांति वाले |
| ६४ | ॐ गदाहस्ताय नमः | हाथ में गदा धारण करने वाले |
| ६५ | ॐ वज्रहस्ताय नमः | वज्र के समान दृढ़ हाथों वाले |
| ६६ | ॐ लवणोदधिधिमण्डकाय नमः | लवण समुद्र को पार करने वाले |
| ६७ | ॐ सीतादर्शनोत्कंठाय नमः | माता सीता के दर्शन के लिए उत्सुक रहने वाले |
| ६८ | ॐ रामकाथप्रियाय नमः | श्रीराम की कथा सुनने में प्रियता रखने वाले |
| ६९ | ॐ सीतानंदकराय नमः | माता सीता को आनंदित करने वाले |
| ७0 | ॐ वज्रांगाय नमः | वज्र के समान कठोर और मजबूत अंगों वाले (बजंगबली) |
| ७१ | ॐ कालनेमिप्रमथनाय नमः | कालनेमि राक्षस का वध करने वाले |
| ७२ | ॐ हरिविश्रान्तये नमः | वानर रूप में विश्राम करने वाले |
| ७३ | ॐ सुषेणप्रियाय नमः | सुषेण वैद्य के प्रिय |
| ७४ | ॐ गंधमादनवासिने नमः | गंधमादन पर्वत पर निवास करने वाले |
| ७५ | ॐ लक्ष्मणप्राणरक्षकाय नमः | लक्ष्मण जी के प्राणों की रक्षा करने वाले |
| ७६ | ॐ महाबलपराक्रमाय नमः | असीम बल और पराक्रम वाले |
| ७७ | ॐ सर्वपापहराय नमः | सभी पापों को हरने वाले |
| ७८ | ॐ सर्वसंपत्प्रदायकाय नमः | समस्त संपत्तियां प्रदान करने वाले |
| ७९ | ॐ लोकपादाय नमः | समस्त लोकों द्वारा वंदनीय चरणों वाले |
| ८0 | ॐ त्रैलोक्यरक्षकाय नमः | तीनों लोकों की रक्षा करने वाले |
| ८१ | ॐ धन्वन्तरये नमः | वैद्य रूप में संजीवनी लाने वाले (धन्वन्तरि स्वरूप) |
| ८२ | ॐ रुद्ररूपिणे नमः | भगवान शिव (रुद्र) के अवतार |
| ८३ | ॐ अमितौजसे नमः | अमित ओज और तेज वाले |
| ८४ | ॐ सर्वज्ञाय नमः | सब कुछ जानने वाले (सर्वज्ञ) |
| ८५ | ॐ सर्वदेवात्मने नमः | सभी देवताओं की आत्मा स्वरूप |
| ८६ | ॐ सर्वलोकहितेरताय नमः | सभी लोकों के हित में लीन रहने वाले |
| ८७ | ॐ ब्रह्मचारिणे नमः | अखंड ब्रह्मचर्य का पालन करने वाले |
| ८८ | ॐ जितेन्द्रियाय नमः | इंद्रियों को पूरी तरह वश में रखने वाले |
| ८९ | ॐ सूक्ष्मतमदर्शकाय नमः | अति सूक्ष्म रूप धारण करने वाले (लंका दहन पूर्व) |
| ९0 | ॐ विराटरूपिणे नमः | विशालकाय विराट रूप धारण करने वाले (समुद्र लांघते समय) |
| ९१ | ॐ पातालनिधिपाय नमः | पाताल लोक की निधियों की रक्षा करने वाले |
| ९२ | ॐ सर्वरक्षाकराय नमः | सबकी रक्षा करने वाले |
| ९३ | ॐ सर्वव्यापिने नमः | सर्वत्र व्याप्त रहने वाले |
| ९४ | ॐ अचलाय नमः | अचल, स्थिर और अडिग |
| ९५ | ॐ सर्वार्चिताय नमः | समस्त देवताओं और मनुष्यों द्वारा पूजित |
| ९६ | ॐ गगनगामिने नमः | आकाश में गमन करने वाले (उड़ने वाले) |
| ९७ | ॐ सर्वमन्त्रमयाय नमः | समस्त मंत्रों के स्वरूप |
| ९८ | ॐ सर्वयन्त्रप्रभञ्जकाय नमः | सभी प्रकार के यंत्र-तंत्र बाधाओं को तोड़ने वाले |
| ९९ | ॐ सर्वतन्त्रस्वरूपिणे नमः | समस्त तंत्र शास्त्रों के स्वरूप |
| १00 | ॐ एकान्नभोजिने नमः | एक बार भोजन करने वाले (अथवा शुद्ध शाकाहारी) |
| १01 | ॐ बालसूर्यनसंकाशाय नमः | उगते हुए सूर्य के समान कांतिमान |
| १02 | ॐ सुग्रीवप्रियकारिणे नमः | सुग्रीव के प्रिय कार्य करने वाले |
| १03 | ॐ भक्तवत्सलाय नमः | भक्तों से प्रेम करने वाले |
| १04 | ॐ सर्वकल्याणकृते नमः | सबका कल्याण करने वाले |
| १05 | ॐ शूरचूडामणये नमः | शूरवीरों में मुकुटमणि |
| १06 | ॐ रामपादपंकजाय नमः | श्रीराम के चरणकमलों में ध्यान लगाने वाले |
| १07 | ॐ सुमित्रासुतप्रियाय नमः | सुमित्रा पुत्र लक्ष्मण के प्रिय |
| १08 | ॐ श्रीरामहृदयालभाय नमः | श्रीराम के हृदय में निवास करने वाले |
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