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कर्मण्येवाधिकारस्ते: श्रीमद्भगवद्गीता का महामंत्र और अर्थ

18 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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श्रीमद्भगवद्गीता का यह अद्भुत श्लोक संपूर्ण मानव जाति के लिए कर्मयोग का सबसे महान उपदेश है। भगवान श्रीकृष्ण द्वारा कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में अर्जुन को दिया गया यह संदेश हमें सिखाता है कि जीवन में बिना किसी तनाव और फल की चिंता के अपने कर्तव्यों का पालन कैसे किया जाए। यह महामंत्र निष्काम कर्म की नींव है, जो मनुष्य को मानसिक शांति और शाश्वत सफलता की ओर ले जाता है।

मूल संस्कृत श्लोक

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥

पदच्छेद एवं अन्वय

संस्कृत अन्वय

ते अधिकारः कर्मणि एव (अस्ति), फलेषु कदाचन मा (अस्ति)। त्वं कर्मफलहेतुः मा भूः, अकर्मणि ते सङ्गः मा अस्तु।

सरल अन्वय अर्थ

तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में ही है, उसके फलों में कभी नहीं। तुम कर्मों के फल का कारण मत बनो और तुम्हारी आसक्ति कर्म न करने (अकर्म) में भी न हो।

शब्दार्थ (पदच्छेद एवं व्याकरण)

संस्कृत शब्द व्याकरण विश्लेषण हिंदी अर्थ
कर्मणि कर्मन् (नपुंसकलिंग), सप्तमी विभक्ति, एकवचन कर्तव्य कर्म में
एव अव्यय ही
अधिकारः अधिकार (पुल्लिंग), प्रथमा विभक्ति, एकवचन अधिकार
ते युष्मद् (सर्वनाम), षष्ठी विभक्ति, एकवचन तुम्हारा
मा अव्यय (निषेधवाचक) नहीं
फलेषु फल (नपुंसकलिंग), सप्तमी विभक्ति, बहुवचन फलों में
कदाचन अव्यय कभी भी
कर्मफलहेतुः कर्मणः फलम् इति कर्मफलम्, तस्य हेतुः (तत्पुरुष समास) कर्म के फल का कारण
भूः भू धातु, लोट् लकार, मध्यम पुरुष, एकवचन हो
अकर्मणि अकर्मन् (नपुंसकलिंग), सप्तमी विभक्ति, एकवचन कर्म न करने में (आलस्य में)
सङ्गः सङ्ग (पुल्लिंग), प्रथमा विभक्ति, एकवचन आसक्ति
अस्तु अस् धातु, लोट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन हो

सरल हिंदी भावार्थ

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को कर्मयोग का परम रहस्य समझा रहे हैं। वे कहते हैं कि हे अर्जुन! तुम्हारा अधिकार केवल अपने कर्तव्य (कर्म) को करने तक ही सीमित है। उस कर्म से उत्पन्न होने वाले फल पर तुम्हारा कोई अधिकार नहीं है। फल की इच्छा रखकर कर्म करना तुम्हें बंधन में डालता

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समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 26 Sep 2026

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