Shri Hanumant Stuti

श्री विष्णु स्तुति - शान्ताकारं भुजंगशयनं (Shri Vishnu Stuti - Shantakaram Bhujagashayanam Lyrics in Hindi) - Bhaktilok

77 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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प्रस्तावना एवं परिचय

शांति और कृपा का स्तोत्र

श्री विष्णु की स्तुति करने वाला यह भजन भक्तों को शांति और सुरक्षा प्रदान करता है।

शान्ताकारं भुजंगशयनं पद्मनाभं सुरेशं विश्वाधारं गगन सदृशं मेघवर्ण शुभांगम् । लक्ष्मीकांत कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं वन्दे विष्णु भवभयहरं सर्व लौकेक नाथम् ॥ यं ब्रह्मा वरुणैन्द्रु रुद्रमरुत: स्तुन्वानि दिव्यै स्तवैवेदे: । सांग पदक्रमोपनिषदै गार्यन्ति यं सामगा: । ध्यानावस्थित तद्गतेन मनसा पश्यति यं योगिनो यस्यातं न विदु: सुरासुरगणा दैवाय तस्मै नम: ॥
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🙏 विस्तृत अर्थ और भावार्थ

इस स्तुति में भगवान विष्णु के शांत और सौम्य स्वरूप का वर्णन किया गया है। 'शान्ताकारं भुजंगशयनं' से यह संकेत मिलता है कि भगवान विष्णु सर्प की शैया पर विश्राम कर रहे हैं, जो उनकी स्थिरता और गंभीरता को दर्शाता है। 'पद्मनाभं सुरेशं' में यह दर्शाया गया है कि वे कमल के फूल से उत्पन्न हुए हैं, जो जीवन और समृद्धि का प्रतीक है। 'विश्वाधारं' से हम समझते हैं कि विष्णु सृष्टि के आधार हैं, जबकि 'गगन सदृशं मेघवर्ण' से उनकी विशालता और अनंतता का ज्ञान होता है। इस भजन के माध्यम से भक्त क्रीड़ा, शक्ति और सुरक्षा के स्वरूप के प्रति अपनी निष्ठा प्रदर्शित करते हैं।

इस भक्ति गीत में भावनाओं का गहन प्रभाव है, जो भक्तों को भगवान की शांति और कृपा के प्रति समर्पित करता है। 'लक्ष्मीकांत कमलनयनं' की पंक्ति हमें लक्ष्मी देवी के साथ भगवान विष्णु की एकता का बोध कराती है, जो धन और कल्याण का प्रतीक है। यहां योगियों का ध्यान भी किया गया है, जो दर्शाता है कि सच्चे भक्त ध्यान में भगवान के दिव्य स्वरूप को साक्षात्कार कर सकते हैं। इस प्रकार का ध्यान हमें आंतरिक शांति और संतोष से भर देता है। भक्तों को यह भक्ति मंत्र का जाप करके अविभाज्य प्रेम और समर्पण की भावना महसूस होती है।

इस स्तुति में केवल भगवान विष्णु की महिमा नहीं, बल्कि भक्ति मार्ग का भी वर्णन है। 'धरावस्थित तद्गतेन मनसा' की पंक्ति से यह स्पष्ट होता है कि ध्यान और साधना के माध्यम से, भक्त विष्णु के दिव्य स्वरूप को अनुभव करते हैं। यह भक्ति मार्ग का महत्त्व है, जहां साधक एकाग्रता के साथ ध्यान में लीन होकर अंत में भगवान का साक्षात्कार करता है। यहाँ तक कि 'सुरासुरगणा दैवाय' से यह स्पष्ट होता है कि वह भगवान जो देवताओं और असुरों दोनों के लिए पूजनीय हैं। यह भक्ति हमें जीवन के प्रत्येक कठिनाई में सहारा प्रदान करती है और हमारे भीतर आत्म-विश्वास और सुरक्षा का संचार करती है।

🔍 विशेष महत्त्व और लाभ

श्री विष्णु की स्तुति का संदर्भ हमें विभिन्न पुराणों और धार्मिक ग्रंथों से मिलता है। विष्णु भगवान का न केवल दर्शन है, बल्कि वे समस्त सृष्टि के रक्षक हैं। विष्णु पुराण में उनका अतुलनीय स्वरूप और खेलों का वर्णन किया गया है। रामायण में भगवान राम को विष्णु का अवतार माना गया है, जो भक्ति और धर्म का पालन करते हैं। यह स्तुति हमें इस बात का बोध कराती है कि विष्णु भक्ति का मार्ग हमें आंतरिक शांति और आध्यात्मिक प्रगति की ओर ले जाता है।

प्रभु श्री राम के आदर्शों और मर्यादा पुरुषोत्तम के सम्पूर्ण चरित्र का रसास्वादन करने के लिए रामायण महाग्रंथ अन्वेषक का उपयोग करें। श्री विष्णु की इस स्तुति का जाप करने से मानसिक शांति प्राप्त होती है, जो तनाव और चिंता को कम करता है। नियमित रूप से इसका पाठ करने से सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और भक्तों में आत्म-विश्वास में वृद्धि होती है। यह भजन सांसारिक दुखों से स्वतंत्रता पाने में भी सहायक होता है।

🕒 साधना एवं गायन विधि

इस भक्ति गीत का पाठ सुबह या शाम के समय करना उत्तम होता है। पूजा स्थल को स्वच्छ रखें और एक दीपक जलाकर भगवान विष्णु की पूजा करें। इस दौरान ध्यान मुद्रा में बैठकर मन को शांति के साथ इस स्तुति पर केंद्रित करें। भक्ति भाव से इसे गाने से मानसिक शांति और दिव्यता की अनुभूति होती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

श्री विष्णु सुति के पाठ का सही समय क्या है?

श्री विष्णु की स्तुति का पाठ सुबह के समय करना श्रेष्ठ माना जाता है, जिससे दिनभर सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है।

क्या इस भजन का पाठ सामूहिक रूप से किया जा सकता है?

हां, इस भजन का सामूहिक पाठ करने से उसकी शक्ति में वृद्धि होती है और सभी भक्तों को मिलकर भक्ति का अनुभव होता है।

इस स्तुति का पाठ करने से क्या लाभ होते हैं?

इस स्तुति का पाठ मानसिक शांति, सकारात्मकता और भक्ति संबंधी भावनाओं की वृद्धि करता है, जिससे आध्यात्मिक विकास होता है।

विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 19 Sep 2026

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