Radha Kriya Kataksh Stotram

मंत्र : शिव तांडव स्तोत्रम् (Shiv Tandav Stotram) - Bhaktilok

62 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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प्रस्तावना एवं परिचय

शिव ताण्डव स्तोत्र: शिव की भक्ति का सर्वोत्तम स्तोत्र

इस स्तोत्र का पाठ मन को शांति और शक्ति प्रदान करता है, शिव के अनंत स्वरूप का ध्यान करें।

जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थलेगलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम् ।डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयंचकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम् ॥१॥जटाकटाहसम्भ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरीविलोलवीचिवल्लरीविराजमानमूर्धनि ।धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावकेकिशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम ॥२॥धराधरेन्द्रनंदिनीविलासबन्धुबन्धुरस्फुरद्दिगन्तसन्ततिप्रमोदमानमानसे ।कृपाकटाक्षधोरणीनिरुद्धदुर्धरापदिक्वचिद्दिगम्बरे(क्वचिच्चिदम्बरे) मनो विनोदमेतु वस्तुनि ॥३॥जटाभुजङ्गपिङ्गलस्फुरत्फणामणिप्रभाकदम्बकुङ्कुमद्रवप्रलिप्तदिग्वधूमुखे ।मदान्धसिन्धुरस्फुरत्त्वगुत्तरीयमेदुरेमनो विनोदमद्भुतं बिभर्तु भूतभर्तरि ॥४॥सहस्रलोचनप्रभृत्यशेषलेखशेखरप्रसूनधूलिधोरणी विधूसराङ्घ्रिपीठभूः ।भुजङ्गराजमालया निबद्धजाटजूटकश्रियै चिराय जायतां चकोरबन्धुशेखरः ॥५॥ललाटचत्वरज्वलद्धनञ्जयस्फुलिङ्गभानिपीतपञ्चसायकं नमन्निलिम्पनायकम् ।सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरंमहाकपालिसम्पदेशिरोजटालमस्तु नः ॥६॥करालभालपट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वलद्धनञ्जयाहुतीकृतप्रचण्डपञ्चसायके ।धराधरेन्द्रनन्दिनीकुचाग्रचित्रपत्रकप्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने रतिर्मम ॥७॥नवीनमेघमण्डली निरुद्धदुर्धरस्फुरत्कुहूनिशीथिनीतमः प्रबन्धबद्धकन्धरः ।निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिन्धुरःकलानिधानबन्धुरः श्रियं जगद्धुरंधरः ॥८॥प्रफुल्लनीलपङ्कजप्रपञ्चकालिमप्रभावलम्बिकण्ठकन्दलीरुचिप्रबद्धकन्धरम् ।स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदंगजच्छिदांधकच्छिदं तमन्तकच्छिदं भजे ॥९॥अगर्व सर्वमङ्गलाकलाकदम्बमञ्जरीरसप्रवाहमाधुरी विजृम्भणामधुव्रतम् ।स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकंगजान्तकान्धकान्तकं तमन्तकान्तकं भजे ॥१०॥जयत्वदभ्रविभ्रमभ्रमद्भुजङ्गमश्वसद्विनिर्गमत्क्रमस्फुरत्करालभालहव्यवाट् ।धिमिद्धिमिद्धिमिध्वनन्मृदङ्गतुङ्गमङ्गलध्वनिक्रमप्रवर्तित प्रचण्डताण्डवः शिवः ॥११॥दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजङ्गमौक्तिकस्रजोर्गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः ।तृणारविन्दचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोःसमं प्रव्रितिक: कदा सदाशिवं भजाम्यहम ॥१२॥कदा निलिम्पनिर्झरीनिकुञ्जकोटरे वसन्विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरः स्थमञ्जलिं वहन् ।विमुक्तलोललोचनो ललामभाललग्नकःशिवेति मंत्रमुच्चरन् कदा सुखी भवाम्यहम् ॥१३॥निलिम्प नाथनागरी कदम्ब मौलमल्लिका-निगुम्फनिर्भक्षरन्म धूष्णिकामनोहरः ।तनोतु नो मनोमुदं विनोदिनींमहनिशंपरिश्रय परं पदं तदङ्गजत्विषां चयः ॥१४॥प्रचण्ड वाडवानल प्रभाशुभप्रचारणीमहाष्टसिद्धिकामिनी जनावहूत जल्पना ।विमुक्त वाम लोचनो विवाहकालिकध्वनिःशिवेति मन्त्रभूषगो जगज्जयाय जायताम् ॥१५॥सार्थशिवताण्डवस्तोत्रम्॥ श्रीगणेशाय नमः ॥इमं हि नित्यमेवमुक्तमुत्तमोत्तमं स्तवंपठन्स्मरन्ब्रुवन्नरो विशुद्धिमेतिसंततम् ।हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथा गतिंविमोहनं हि देहिनां सुशङ्करस्य चिंतनम् ॥16॥पूजावसानसमये दशवक्त्रगीतंयः शम्भुपूजनपरं पठति प्रदोषे ।तस्य स्थिरां रथगजेन्द्रतुरङ्गयुक्तांलक्ष्मीं सदैव सुमुखिं प्रददाति शम्भुः ॥१७॥
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🙏 विस्तृत अर्थ और भावार्थ

शिव ताण्डव स्तोत्र महादेव शिव के असीम तेज और दिव्य लीलाओं का वर्णन करता है। इसमें भगवान शिव के तांडव नृत्य का विस्तृत विवरण है, जिसमें उनका विराट स्वरूप, जीवों के लिए दया और संहार के प्रतीक के रूप में प्रकट होता है। 'जटाटवीगलज्जल' से लेकर 'प्रचण्डताण्डवः शिवः' तक की पंक्तियाँ शिव के अनेक रूपों को दर्शाती हैं। शिव का इस उच्चतम रूप में ध्यान करते हुए भक्त 'ॐ नमः शिवाय' का जाप करते हैं, जिससे वे शिव के संवेदनशील और करुणामय स्वरूप की भी अनुभूति करते हैं। शिव तांडव की जटिलता और गहराई भक्तों को न केवल मंत्रमुग्ध करती है बल्कि उन्हें आत्मिक रूप से जागृत भी करती है। ये शब्द आध्यात्मिक अनुभूति और एकाग्रता का आदान-प्रदान करते हैं, जहां भक्त अपने हृदय की गहराइयों में शिव की अनंतता का अनुभव करते हैं।

इस स्तोत्र का भावार्थ भक्तों के मन में शिव के प्रति गहन प्रेम और श्रद्धा का संचार करता है। 'ललाटचत्वरज्वलद्धनञ्जय' से प्रतीत होता है कि शिव का तेज अन्योन्मुख है और यह हमारी त्रासदियों को समाप्त करता है। 'नवीनमेघमण्डली' की पंक्ति हमें यह संकेत देती है कि शिव का संरक्षण हमारे लिए अद्भुत और सुरक्षा प्रदान करता है। शिव का नाम उच्चारण न केवल एक उपासना है बल्कि यह आत्म-शोध, समर्पण और निर्भयता का प्रतीक भी है। भक्त जब इस स्तोत्र का पाठ करता है, तब वह अपने भीतर की नकारात्मकता को समाप्त करके निरंतर सकारात्मकता की ओर अग्रसर होता है। यह भक्ति की गहराई में उतरने का अवसर प्रदान करता है, जो भक्त को शांति और शक्ति की अनुभूति कराता है।

भक्ति मार्ग में शिव ताण्डव स्तोत्र विशेष महत्व रखता है। इसका गहन अध्ययन और जाप करने से मानसिक शक्ति और संकोच की दीवारें टूटती हैं। 'तृणारविन्दचक्षुषोः' की पंक्ति दर्शाती है कि शिव की कृपा से मनुष्य की दृष्टि में स्पष्टता आती है। यह केवल एक स्तोत्र नहीं है, बल्कि यह अद्वितीयता, साहस और मनोबल का स्रोत है। शिव केवल संहारक नहीं हैं, वे सृष्टि के रक्षक भी हैं। इस स्तोत्र में उल्लेखित तत्व जीवन के सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और मानसिक घनत्व को बढ़ाते हैं। भक्त की इच्छा शक्ति को उजागर करते हुए, यह उसका आत्म को प्रबुद्ध करता है। इस प्रकार शिव ताण्डव स्तोत्र के माध्यम से भक्त शिव में विलीन होने की इच्छाओं का अद्वितीय अनुभव करता है।

🔍 विशेष महत्त्व और लाभ

शिव ताण्डव स्तोत्र का स्रोत रावण द्वारा रचित है, जो एक परम शिव भक्त था। यह गीत महाभारत और पुराणों में शिव की महिमा के गुणगान के कारण महत्वपूर्ण हो गया है। इस स्तोत्र को पढ़ने और गाने से भक्तों को अनेक आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होते हैं। रावण ने इस स्तोत्र को शिव के तांडव नृत्य को जानने के लिए लिखा था, जिससे यह स्पष्ट होता है कि शिव तांडव केवल एक कला नहीं, बल्कि भगवान शिव की शक्तियों का प्रतीक है। शिव का तांडव नृत्य सृष्टि के संरक्षण, विनाश और पुनर्निर्माण की प्रक्रिया को दर्शाता है। यह स्तोत्र भक्तों को देवी-देवताओं की कृपा प्राप्त करने का माध्यम बना है, जिसमें भक्त अपने दुखों का निवारण और कठिनाइयों का समाधान पाते हैं।

प्रभु श्री राम के आदर्शों और मर्यादा पुरुषोत्तम के सम्पूर्ण चरित्र का रसास्वादन करने के लिए रामायण महाग्रंथ अन्वेषक का उपयोग करें। शिव ताण्डव स्तोत्र का पाठ करने से मानसिक शांति, ऊर्जा, और सकारात्मकता मिलती है। भक्त इस स्तोत्र का जाप करने से आत्मबल में वृद्ध‍ि और आध्यात्मिक विकास का अनुभव करते हैं। प्रतिदिन इसके पाठ से चित्त की एकाग्रता में सुधार होता है और नकारात्मकता दूर होती है। यह स्तोत्र कठिनाइयों से निकलने और संतोष प्राप्त करने में भी सहायक होता है।

🕒 साधना एवं गायन विधि

इस स्तोत्र का पाठ सुबह या शाम के समय करना सर्वोत्तम है। पूजा के समय एक दीप जलाना चाहिए और अपने मन को शांत करते हुए ध्यान लगाना ठीक रहता है। पत्थर या स्थिर स्थान पर बैठकर ध्यान करने से, भक्त अपने हृदय में शिव का ध्यान करते हुए इस स्तोत्र का उच्चारण करें। सच्चे मन के साथ भगवान शिव की कृपा की कामना करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

क्या शिव ताण्डव स्तोत्र का पाठ दैनिक रूप से करना चाहिए?

जी हाँ, शिव ताण्डव स्तोत्र का दैनिक पाठ करने से मानसिक शांति, शक्ति, और सकारात्मकता की प्राप्ति होती है। यह भक्त के जीवन में ऊर्जा का संचार करता है।

इस स्तोत्र को किन अवसरों पर पढ़ा जा सकता है?

यह स्तोत्र विशेष रूप से महाशिवरात्रि, प्रदोष, या जब भी भक्त को मानसिक कठिनाइयाँ महसूस होती हैं, उस समय पढ़ा जा सकता है।

क्या रावण ने केवल शिव ताण्डव स्तोत्र ही लिखा था?

रावण महाभारत का पात्र होते हुए, एक महान विद्वान और शिव भक्त थे, जिन्होंने शिव ताण्डव स्तोत्र के अलावा कई अन्य स्तोत्र भी लिखे।

विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 19 Sep 2026

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