🙏 तेरी अब न चराऊँ गैया री – मैया यमुना तट पे

(Teri Ab Na Charaoon Gaiya Ri – Maiya Yamuna Tat Pe) – बाल लीला भजन / बाल कृष्ण लोकगीत

🌸 बाल कृष्ण की मैया यशोदा से विनती – गाय न चराने और दूध-मलई की प्रार्थना

📝 भजन विवरण

🏷️ श्रेणी: कृष्ण भजन / बाल लीला / लोकगीत
🎶 भाव: वात्सल्य, बाल सुलभ नटखटपन, प्रेम
📍 विशेषता: बाल कृष्ण का मैया यशोदा से गाय न चराने और दूध-मलई माँगने का मार्मिक लोकगीत
📀 प्रचलन: ब्रज क्षेत्र में अत्यंत लोकप्रिय, बाल कृष्ण की लीला पर आधारित प्रिय भजन

📜 भजन लिरिक्स (हिन्दी में)

तेरी अब न चराऊँ गैया री,
मैया यमुना तट पे,
तेरी अब न चराऊँ गैया री,
मैया यमुना तट पे॥

ऊँचे-ऊँचे पहाड़न पे,
लंबे-लंबे झाड़न में,
भटकत डोलूँ वन-वन में,
हियो-हियो करतो डोलूँ,
मैया यमुना तट पे॥

दिन निकस गायन पे जाऊँ,
तेरी दिन भर गाय चराऊँ,
मैं साँझ परे घर आऊँ,
अब मोए दे दे दूध-मलइया री,
मैया यमुना तट पे॥

मैं अभी उमर को वारो,
पर गयो धूप ते कारो,
ना करे कोई ब्याह हमारो,
भग जाएगी मेरी घरवइया री,
मैया यमुना तट पे॥

🎵 रचनाकार : लोक परम्परा / ब्रज लोकगीत

🙏 भजन का अर्थ और संदेश

यह अत्यंत लोकप्रिय ब्रज लोकगीत बाल कृष्ण की मैया यशोदा से करुण पुकार को दर्शाता है। “तेरी अब न चराऊँ गैया री, मैया यमुना तट पे” – बाल कृष्ण मैया से कहते हैं कि अब मैं तुम्हारी गायें यमुना के किनारे नहीं चराऊँगा।

पहले अंतरे में – ऊँचे-ऊँचे पहाड़ों और लंबे-लंबे झाड़ों में, वन-वन में भटकते हुए, “हियो-हियो” करते (भय या कष्ट से) घूमता हूँ। यह कृष्ण के बाल मन की व्यथा है – गाय चराना कितना कठिन है।

दूसरे अंतरे में – दिन निकलते ही गायों पर चला जाता हूँ, दिनभर गायें चराता हूँ, साँझ को घर आता हूँ। अब मुझे दूध और मलई दे दो। यह बालक की सरल माँग है – मेहनत के बाद इनाम चाहिए।

तीसरे अंतरे में – मैं अभी छोटी उम्र का हूँ (उमर को वारो), धूप से काला पड़ गया (पर गयो धूप ते कारो)। कोई मेरा विवाह नहीं करेगा (ना करे कोई ब्याह हमारो) – यह व्यंग्य या मजाक है। और कहता है – मेरी घरवाली (भावी पत्नी) भाग जाएगी। अर्थात अगर मैं काला हो गया तो कोई मुझसे शादी नहीं करेगा।

यह भजन बाल कृष्ण की नटखट, सरल और व्यंग्यपूर्ण विनती को बड़े ही मनोहर ढंग से प्रस्तुत करता है। यह मैया यशोदा और बाल कृष्ण के अद्भुत वात्सल्य को दर्शाता है।

🔍 भजन का विशेष महत्त्व

बाल लीला का सजीव चित्रण: यह भजन बाल कृष्ण की वास्तविक दुनिया को दर्शाता है – गाय चराना, धूप से काला होना, मैया से दूध-मलई माँगना, और शादी की बातें करके नटखटपन दिखाना।

ब्रज की लोकभाषा: “हियो-हियो करतो”, “दूध-मलइया”, “उमर को वारो” आदि शब्द ब्रजभाषा की सहजता और मिठास को दर्शाते हैं।

वात्सल्य रस: यह भजन वात्सल्य रस (माता-पुत्र के प्रेम) का उत्कृष्ट उदाहरण है। मैया यशोदा के प्रति कान्हा की शिकायत और उनकी अपेक्षा अत्यंत मार्मिक है।

💖 बाल कृष्ण की सरल विनती

🎯 संदेश

बाल कृष्ण की यह विनती हमें सिखाती है कि भगवान भी एक बालक की तरह अपनी माँ से शिकायत और प्रेम कर सकते हैं। उनकी लीलाएँ हमें नटखटपन और सरलता का आनंद देती हैं।

✨ आस्था का प्रतीक

यह भजन हर उस भक्त के हृदय को छूता है जो बाल कृष्ण की लीलाओं में रमता है। “तेरी अब न चराऊँ गैया” की पंक्ति सुनते ही बाल स्वरूप की छवि आँखों में घूम जाती है।

🙏 जय श्री कृष्ण ।। जय यशोदा नंदन ।। तेरी अब न चराऊँ गैया री मैया ।।

॥ इति बाल लीला भजनम् ॥
॥ तेरी अब न चराऊँ गैया री – मैया यमुना तट पे – अब मोए दे दे दूध-मलइया री ॥