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दर दर भटक रहा हूँ, तेरी दोस्ती के पीछे (सुदामा भजन) लिरिक्स | Dar Dar Bhatak Raha Hoon Teri Dosti Ke Peeche Sudama Bhajan Lyrics

166 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Chandan Sah
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मूल पाठ एवं पवित्र संकीर्तन

शुद्ध उच्चारण और भक्ति भाव के साथ स्मरण करें

🙏 दर दर भटक रहा हूँ – तेरी दोस्ती के पीछे

सनातन संस्कृति के विभिन्न व्रत, उपवास और त्यौहारों की सही तिथियों के लिए सनातन कैलेंडर २०२६ तथा दैनिक पंचांग का अवलोकन अवश्य करें।

(Dar Dar Bhatak Raha Hoon – Teri Dosti Ke Peeche) – सुदामा भजन / सखा भाव

🎤 गायक: धन्वन्तरि दास जी | तर्ज: सखा भाव / मार्मिक कथा भजन

📝 भजन विवरण

🎤 गायक: धन्वन्तरि दास जी
🏷️ श्रेणी: सुदामा भजन / कृष्ण भजन / सखा भाव
🎵 तर्ज: सखा भाव / मार्मिक कथा भजन
📀 विशेषता: सुदामा की दृष्टि से कृष्ण से दोस्ती की पीड़ा और प्रार्थना – बचपन के मित्र के द्वार पर भटकते हुए करुण पुकार

📜 भजन लिरिक्स (हिन्दी में)

दर दर भटक रहा हूँ,
तेरी दोस्ती के पीछे,
क्या सज़ा मिली है मुझको,
क्या सज़ा मिली है मुझको,
तेरी दोस्ती के पीछे,
दर दर भटक रहा हूँ,
तेरी दोस्ती के पीछे॥

मैं गरीब हूँ तो क्या है,
दीनों के नाथ तुम हो,
होंठों पे है उदासी,
होंठों पे है उदासी,
तेरी दोस्ती के पीछे,
दर दर भटक रहा हूँ,
तेरी दोस्ती के पीछे॥

हे द्वारिका के वासी,
अँखियाँ दरस की प्यासी,
दिखला झलक ज़रा सी,
दिखला झलक ज़रा सी,
मेरी दोस्ती के पीछे,
दर दर भटक रहा हूँ,
तेरी दोस्ती के पीछे॥

बचपन का यार तेरा,
आया तेरी गली में,
दर दर भटक के आया,
दर दर भटक के आया,
तेरी दोस्ती के पीछे,
दर दर भटक रहा हूँ,
तेरी दोस्ती के पीछे॥

तुम हो पतित पावन,
अधमों का मैं हूँ स्वामी,
अब तो दरश करा जा,
अब तो दरश करा जा,
तेरी दोस्ती के पीछे,
दर दर भटक रहा हूँ,
तेरी दोस्ती के पीछे॥

क्या सज़ा मिली है मुझको,
क्या सज़ा मिली है मुझको,
तेरी दोस्ती के पीछे,
दर दर भटक रहा हूँ,
तेरी दोस्ती के पीछे॥

🎤 गायक : धन्वन्तरि दास जी

🙏 भजन का अर्थ और संदेश

यह अत्यंत मार्मिक सुदामा भजन है, जिसमें भक्त सुदामा की दृष्टि से श्रीकृष्ण से अपनी दोस्ती के नाते दर्शन की प्रार्थना करता है। “दर दर भटक रहा हूँ, तेरी दोस्ती के पीछे” – मैं तुम्हारी दोस्ती की खातिर दर-दर भटक रहा हूँ। “क्या सज़ा मिली है मुझको, तेरी दोस्ती के पीछे” – क्या यही सज़ा मिली मुझे तुम्हारी दोस्ती की वजह से? (अर्थात दूर रहना, वियोग सहना)।

पहले अंतरे में – भक्त कहता है कि मैं गरीब हूँ तो क्या? तुम तो दीनों के नाथ हो। मेरे होंठों पर उदासी है – यह तुम्हारी दोस्ती के कारण ही है।

दूसरे अंतरे में – हे द्वारिका के वासी, मेरी आँखें तुम्हारे दर्शन की प्यासी हैं। बस एक झलक दिखा दो – मेरी दोस्ती के नाते।

तीसरे अंतरे में – बचपन का तुम्हारा यार (मित्र) तुम्हारी गली में आया है। दर-दर भटक कर आया हूँ – तुम्हारी दोस्ती के पीछे।

चौथे अंतरे में – तुम पतित-पावन हो, और अधमों के स्वामी हो। अब तो दर्शन करा दो।

यह भजन सुदामा-कृष्ण की अटूट मित्रता और भक्त की प्रभु से मिलने की व्याकुलता को दर्शाता है।

🔍 भजन का विशेष महत्त्व

सखा भाव (मैत्री भक्ति): यह भजन भक्ति के सख्य भाव (मित्रता) का उत्कृष्ट उदाहरण है, जहाँ भक्त प्रभु को अपना मित्र मानकर उनसे प्रार्थना करता है।

सुदामा प्रसंग: सुदामा के भगवान कृष्ण के पास जाने और उनकी गरीबी दूर होने की कथा पर आधारित यह भजन अत्यंत मार्मिक है।

“पतित पावन” संबोधन: कृष्ण को पतित-पावन (पतितों को पवित्र करने वाला) कहना उनकी दयालुता को दर्शाता है।

💖 सखा भाव की मार्मिक अभिव्यक्ति

🎯 संदेश

प्रभु के मित्र होने का अर्थ है कि वह दर-दर भटकने वाले को भी अपनी गली में बुला लेते हैं। सुदामा जैसे गरीब मित्र को भी कृष्ण ने सिर नवाया था। सच्ची दोस्ती कभी व्यर्थ नहीं जाती।

✨ आस्था का प्रतीक

यह भजन हर उस भक्त को प्रेरणा देता है जो प्रभु को अपना सखा (मित्र) मानता है। धन्वन्तरि दास के स्वर में यह भजन अत्यंत भावपूर्ण है।

🙏 जय श्री कृष्ण ।। सुदामा-कृष्ण मैत्री की जय ।। दर दर भटक रहा हूँ तेरी दोस्ती के पीछे ।।

॥ इति सुदामा भजनम् ॥
॥ बचपन का यार तेरा आया तेरी गली में – दर दर भटक के आया तेरी दोस्ती के पीछे ॥

🙏 विस्तृत अर्थ और भावार्थ

यह अत्यंत ही पावन भक्ति रस से परिपूर्ण भजन "दर दर भटक रहा हूँ, तेरी दोस्ती के पीछे (सुदामा भजन) लिरिक्स | Dar Dar Bhatak Raha Hoon Teri Dosti Ke Peeche Sudama Bhajan Lyrics" ईश्वर के प्रति अनन्य प्रेम और पूर्ण शरणागति का जीवंत उदाहरण है। सनातन धर्म में संकीर्तन और प्रभु नाम का जाप कलयुग का परम साधन बताया गया है। इस भजन के प्रत्येक शब्द में जीवात्मा का अपनी मूल परम सत्ता (परमात्मा) से मिलने का गहरा अनुराग छुपा हुआ है।

भजन का मुख्य संदेश यही है कि संसार के समस्त कार्यों को करते हुए भी यदि मनुष्य का मन निरंतर ईश्वर के चरणों में लीन रहे, तो वह संसार सागर से सहज ही पार उतर जाता है। यह भजन साधक के अंतर्मन को झंकृत कर उसमें भक्ति रूपी अमृत का संचार करता है।

🔍 विशेष महत्त्व और लाभ

श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार, भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि जो भक्त निरंतर मेरा नाम संकीर्तन करते हैं, वे सदा मुझमें ही निवास करते हैं। यह भजन साधक के मन को चंचलता से मुक्त कर आध्यात्मिक साधना की ओर प्रेरित करता है।

सनातन संस्कृति के विभिन्न व्रत, उपवास और त्यौहारों की सही तिथियों के लिए सनातन कैलेंडर २०२६ तथा दैनिक पंचांग का अवलोकन अवश्य करें। इस भक्ति भजन के नियमित संकीर्तन से घर की नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है, मन शांत और प्रसन्न रहता है तथा पारिवारिक क्लेश दूर होकर शांति का उदय होता है।

🕒 साधना एवं गायन विधि

भजन संकीर्तन के लिए प्रातःकाल अथवा सायं संध्या का समय सर्वोत्तम है। एक शांत स्थान पर पूर्वाभिमुख बैठकर, भगवान की प्रतिमा के सम्मुख धूप-दीप प्रज्वलित करें और तन्मयता से संकीर्तन करें।

❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

भजन संकीर्तन का मुख्य उद्देश्य क्या है?

भजन संकीर्तन का मुख्य उद्देश्य मन को संसार की व्यर्थ की चिंताओं से हटाकर ईश्वर के ध्यान में लगाना और आत्मिक आनंद की प्राप्ति करना है।

भजनों को गाने की सही विधि क्या है?

भजनों को गाने के लिए राग-सुर से अधिक शुद्ध भाव और प्रेमपूर्ण हृदय की आवश्यकता होती है। मन में पूर्ण श्रद्धा रखकर शांत चित्त से संकीर्तन करें।

क्या सामूहिक भजन संकीर्तन अधिक फलदायी होता है?

हाँ, शास्त्रों के अनुसार सामूहिक संकीर्तन से दिव्य स्पंदन (Vibrations) उत्पन्न होते हैं, जिससे वहां उपस्थित सभी लोगों का मन शुद्ध होता है और सामाजिक एकता बढ़ती है।

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विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 04 Sep 2026

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