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श्री नृसिंह अष्टकम(Sri Nrisimha Ashtakam) - Bhaktilok

106 पाठकों ने पढ़ा | लेखक: Deepak Kumar Bind
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मूल पाठ एवं पवित्र संकीर्तन

शुद्ध उच्चारण और भक्ति भाव के साथ स्मरण करें

 श्री नृसिंह अष्टकम(Sri Nrisimha Ashtakam) :- 

श्री नृसिंह अष्टकम(Sri Nrisimha Ashtakam) - Bhaktilok

सनातन संस्कृति के विभिन्न व्रत, उपवास और त्यौहारों की सही तिथियों के लिए सनातन कैलेंडर २०२६ तथा दैनिक पंचांग का अवलोकन अवश्य करें।

 श्री नृसिंह अष्टकम(Sri Nrisimha Ashtakam) :- 

ध्यायामि नरसिम्हक्यं ब्रह्म वेदन्तगोचारं ।

भवाब्धि तरनोपयं संख चाकर धरं परम् || १ ||

 

नीलं रामं चा परिभूय कृपा रसेन स्तम्भे स्वसक्ति मनघं विनिधाय देव ।

प्रह्लाद रक्षण विधि यति कृपा ते श्री नरसिंह परिपालय मम च भक्तं || २ ||

 

इन्द्रादि देव निकरस्य कीर्त कोटि प्रत्युप्त रत्न प्रति बिम्बित पद पद्म ।

कल्पान्त कला घन गर्जन तुल्य नाद श्री नरसिंह परिपालय मम च भक्तं || ३ ||

 

प्रह्लाद पोष प्रलयर्क समान वक्त्र हूं -कर निर्जिता निसाचर वृन्द नाद ।

श्री -नारद मुनि संघ सुगियमाना श्री नरसिंह परिपालय मम च भक्तं || ४ ||

 

रत्रिन चरद्रि जतरत परिस्रंस्य मन रक्तं निपीय परिकल्पित सान्तर मल ।

विद्रावित -अखिल सुरो उग्र नरसिंह रूपं श्री नरसिंह परिपालय मम चा भक्तं || ५ ||

 

योगीन्द्र, योग परिरक्सक, देव देव दिनार्थि हरि विभव अगम गीयमान ।

मां वीक्ष्य दिनं असरण्यं अगन्य -शिलं श्री नरसिंह परिपालय मम चा भक्तं || ६ ||

 

प्रह्लाद सोक विनिवरण भद्र सिंह नकतन चरेन्द्र मद खण्डन वीर सिंह ।

इन्द्रादि देवजना संगनुत पद पद्म श्री नरसिंह परिपालय मम चा भक्तं || ७ ||

 

ज्ञानेन केचित् अवलम्ब्य पदंभुजं थेय, केचित् सुकर्म निकरेण परे चा भक्त्य ।

मुक्तिं गतः खलु जनः कृपय मुरारे श्री नरसिंह परिपालय मम चा भक्तं || ८ ||

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🙏 विस्तृत अर्थ और भावार्थ

यह अत्यंत ही पावन भक्ति रस से परिपूर्ण भजन " श्री नृसिंह अष्टकम(Sri Nrisimha Ashtakam) - Bhaktilok" ईश्वर के प्रति अनन्य प्रेम और पूर्ण शरणागति का जीवंत उदाहरण है। सनातन धर्म में संकीर्तन और प्रभु नाम का जाप कलयुग का परम साधन बताया गया है। इस भजन के प्रत्येक शब्द में जीवात्मा का अपनी मूल परम सत्ता (परमात्मा) से मिलने का गहरा अनुराग छुपा हुआ है।

भजन का मुख्य संदेश यही है कि संसार के समस्त कार्यों को करते हुए भी यदि मनुष्य का मन निरंतर ईश्वर के चरणों में लीन रहे, तो वह संसार सागर से सहज ही पार उतर जाता है। यह भजन साधक के अंतर्मन को झंकृत कर उसमें भक्ति रूपी अमृत का संचार करता है।

🔍 विशेष महत्त्व और लाभ

श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार, भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि जो भक्त निरंतर मेरा नाम संकीर्तन करते हैं, वे सदा मुझमें ही निवास करते हैं। यह भजन साधक के मन को चंचलता से मुक्त कर आध्यात्मिक साधना की ओर प्रेरित करता है।

सनातन संस्कृति के विभिन्न व्रत, उपवास और त्यौहारों की सही तिथियों के लिए सनातन कैलेंडर २०२६ तथा दैनिक पंचांग का अवलोकन अवश्य करें। इस भक्ति भजन के नियमित संकीर्तन से घर की नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होती है, मन शांत और प्रसन्न रहता है तथा पारिवारिक क्लेश दूर होकर शांति का उदय होता है।

🕒 साधना एवं गायन विधि

भजन संकीर्तन के लिए प्रातःकाल अथवा सायं संध्या का समय सर्वोत्तम है। एक शांत स्थान पर पूर्वाभिमुख बैठकर, भगवान की प्रतिमा के सम्मुख धूप-दीप प्रज्वलित करें और तन्मयता से संकीर्तन करें।

❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

भजन संकीर्तन का मुख्य उद्देश्य क्या है?

भजन संकीर्तन का मुख्य उद्देश्य मन को संसार की व्यर्थ की चिंताओं से हटाकर ईश्वर के ध्यान में लगाना और आत्मिक आनंद की प्राप्ति करना है।

भजनों को गाने की सही विधि क्या है?

भजनों को गाने के लिए राग-सुर से अधिक शुद्ध भाव और प्रेमपूर्ण हृदय की आवश्यकता होती है। मन में पूर्ण श्रद्धा रखकर शांत चित्त से संकीर्तन करें।

क्या सामूहिक भजन संकीर्तन अधिक फलदायी होता है?

हाँ, शास्त्रों के अनुसार सामूहिक संकीर्तन से दिव्य स्पंदन (Vibrations) उत्पन्न होते हैं, जिससे वहां उपस्थित सभी लोगों का मन शुद्ध होता है और सामाजिक एकता बढ़ती है।

विश्वसनीय धार्मिक एवं आध्यात्मिक जानकारी

यह सामग्री भक्तिलोक संपादकीय टीम द्वारा उपलब्ध धार्मिक स्रोतों, प्रकाशित संदर्भों और परंपरागत पाठों की तुलना के आधार पर तैयार एवं समीक्षा की गई है। जहाँ पाठ के विभिन्न संस्करण उपलब्ध हैं, वहाँ संबंधित संस्करण या स्रोत का उल्लेख किया जाता है।

समीक्षित एवं सत्यापित अंतिम अद्यतन: 01 Sep 2026

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